{"_id":"598a1f4f4f1c1b5a058b4962","slug":"151502224207-allahabad-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"थीसिस में चोरी की तो बच पाना मुश्किल","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
थीसिस में चोरी की तो बच पाना मुश्किल
Updated Wed, 09 Aug 2017 02:00 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
संशोधित
000000000000000
थीसिस में चोरी की तो बच पाना मुश्किल
0 शोधार्थियों के रिसर्च आर्टिकल, थीसिस पर नजर रखेगा ‘उर्कुंड’
0 नए सत्र में इविवि के हर शिक्षक का किया जाएगा रजिस्ट्रेशन
अमर उजाला ब्यूरो
इलाहाबाद। कॉपी-पेस्ट करके पीएचडी की डिग्री हासिल करने की शिकायतें अक्सर सामने आती हैं लेकिन अब ऐसा करने वालों की खैर नहीं। रिसर्च आर्टिकल और थीसिस में चोरी में अब आसानी से पकड़ ली जाएगी। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) शोधगंगा प्रोजेक्ट के तहत इनफ्लिबनेड नाम एजेंसी के माध्यम से ऐसा सॉफ्टवेयर तैयार कराया है, जो रिसर्च ऑर्टिकल एवं थीसिस में चोरी किए गए कंटेंट को आसानी ने पकड़ लेता है। ‘उर्कुंड’ नाम का यह साफ्टवेयर इलाहाबाद विश्वविद्यालय को भी उपलब्ध कराया गया है। इसे शत प्रतिशत लागू करने के लिए सभी शिक्षकों का रजिस्ट्रेशन किया जा रहा है ताकि उनके तहत शोध कर रहे विद्यार्थियों के रिसर्च ऑर्टिकल एवं थीसिस की जांच कराई जा सके।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय में इस प्रोजेक्ट का समन्वयक पुस्तकालयाध्यक्ष डॉ. बीके सिंह को बनाया गया है। अब तक 60 फीसदी शिक्षकों का रजिस्ट्रेशन किया जा चुका है। सत्र 2017-18 शतप्रतिशत शिक्षकों का रजिस्ट्रेशन किए जाने का लक्ष्य है। डॉ. बीके सिंह के मुताबिक संबंधित शिक्षक अपने शोधार्थी की ओर से तैयार किए गए रिसर्च ऑर्टिकल एवं थीसिस के कंटेंट को ‘उर्कुंड’ सॉफ्टवेयर पर मेल करेंगे। दो घंटे में स्कैन करने के बाद साफ्टवेयर बना देगा कि इसमें कितना फीसदी कंटेंट शोधार्थी का है और कितना फीसदी कंटेंट दूसरी जगह से लिया गया है।
इसके साथ ही सॉफ्टवेयर बता देगा कि चोरी किया गया कंटेंट कहां से लिया गया है। अगर 20 फीसदी तक कंटेंट किसी दूसरी जगह से लिया गया है तो चल जाएगा लेकिन इससे अधिक कंटेंट की चोरी पर संबंधित शोधार्थी को अपने रिसर्च ऑर्टिकल या थीसिस में बदलाव करना पड़ेगा। अगर शोधार्थी बदलाव नहीं करता है और बाद में मामला पकड़ जाता है तो इस पर उसकी पीएचडी की डिग्री और प्रमोशन तक निरस्त हो सकता है। उन्होंने बताया कि इविवि में इस पर काम शुरू हो चुका है। सत्र 2017-18 में इसे शतप्रतिशत लागू किए जाने का लक्ष्य है। इसके लिए जागरूकता कार्यक्रम भी आयोजित किए जा रहे हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
000000000000000
थीसिस में चोरी की तो बच पाना मुश्किल
0 शोधार्थियों के रिसर्च आर्टिकल, थीसिस पर नजर रखेगा ‘उर्कुंड’
0 नए सत्र में इविवि के हर शिक्षक का किया जाएगा रजिस्ट्रेशन
अमर उजाला ब्यूरो
इलाहाबाद। कॉपी-पेस्ट करके पीएचडी की डिग्री हासिल करने की शिकायतें अक्सर सामने आती हैं लेकिन अब ऐसा करने वालों की खैर नहीं। रिसर्च आर्टिकल और थीसिस में चोरी में अब आसानी से पकड़ ली जाएगी। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) शोधगंगा प्रोजेक्ट के तहत इनफ्लिबनेड नाम एजेंसी के माध्यम से ऐसा सॉफ्टवेयर तैयार कराया है, जो रिसर्च ऑर्टिकल एवं थीसिस में चोरी किए गए कंटेंट को आसानी ने पकड़ लेता है। ‘उर्कुंड’ नाम का यह साफ्टवेयर इलाहाबाद विश्वविद्यालय को भी उपलब्ध कराया गया है। इसे शत प्रतिशत लागू करने के लिए सभी शिक्षकों का रजिस्ट्रेशन किया जा रहा है ताकि उनके तहत शोध कर रहे विद्यार्थियों के रिसर्च ऑर्टिकल एवं थीसिस की जांच कराई जा सके।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय में इस प्रोजेक्ट का समन्वयक पुस्तकालयाध्यक्ष डॉ. बीके सिंह को बनाया गया है। अब तक 60 फीसदी शिक्षकों का रजिस्ट्रेशन किया जा चुका है। सत्र 2017-18 शतप्रतिशत शिक्षकों का रजिस्ट्रेशन किए जाने का लक्ष्य है। डॉ. बीके सिंह के मुताबिक संबंधित शिक्षक अपने शोधार्थी की ओर से तैयार किए गए रिसर्च ऑर्टिकल एवं थीसिस के कंटेंट को ‘उर्कुंड’ सॉफ्टवेयर पर मेल करेंगे। दो घंटे में स्कैन करने के बाद साफ्टवेयर बना देगा कि इसमें कितना फीसदी कंटेंट शोधार्थी का है और कितना फीसदी कंटेंट दूसरी जगह से लिया गया है।
विज्ञापन
इसके साथ ही सॉफ्टवेयर बता देगा कि चोरी किया गया कंटेंट कहां से लिया गया है। अगर 20 फीसदी तक कंटेंट किसी दूसरी जगह से लिया गया है तो चल जाएगा लेकिन इससे अधिक कंटेंट की चोरी पर संबंधित शोधार्थी को अपने रिसर्च ऑर्टिकल या थीसिस में बदलाव करना पड़ेगा। अगर शोधार्थी बदलाव नहीं करता है और बाद में मामला पकड़ जाता है तो इस पर उसकी पीएचडी की डिग्री और प्रमोशन तक निरस्त हो सकता है। उन्होंने बताया कि इविवि में इस पर काम शुरू हो चुका है। सत्र 2017-18 में इसे शतप्रतिशत लागू किए जाने का लक्ष्य है। इसके लिए जागरूकता कार्यक्रम भी आयोजित किए जा रहे हैं।
विज्ञापन