प्रयागराज: 132 साल साल पहले भी कैबिनेट की बैठक में हुए थे कई अहम फैसले
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कुंभ नगर में कैबिनेट की पहली बैठक मंगलवार को होने जा रही है। इस बैठक के साथ यहां 132 साल पुराना इतिहास एक बार फिर दोहराया जाएगा। नार्थ वेस्टर्न प्राविंसेज एंड अवध विधानमंडल की पहली बैठक आठ जनवरी 1887 को चंद्रशेखर आजाद पार्क स्थित थार्नहिल मेन मेमोरियल हॉल (पब्लिक लाइब्रेरी) में हुई थी। उसमें कार्यालय, पदाधिकारियों की नियुक्ति के अलावा जानवरों के खिलाफ क्रूरता संबंधी समेत कई बिल पास हुए थे।
इंडियन कौंसिल एक्ट 1861 के तहत बंबई, मद्रास तथा बंगाल प्रेसीडेंसी की स्थापना हुई थी लेकिन, उस समय अवध तथा पंजाब में कोई विधानमंडल नहीं था। उत्तर प्रदेश का क्षेत्र बंगाल प्रेसीडेंसी के अंतर्गत था। इंडियन नेशनल कांग्रेस के 1885 और 1886 के इलाहाबाद अधिवेशन में नार्थ वेस्टर्न प्राविंसेज और अवध को मिलाकर लेजिस्टेटिव कौंसिल के गठन की मांग की गई। इनमें भारतीयों का प्रतिनिधित्व भी सुनिश्चित करने की मांग की गई थी। महामना मदन मोहन मालवीय ने तो कह दिया था कि बिना प्रतिनिधित्व कोई टैक्स नहीं दिया जाएगा। इससे बने दबाव के बाद एक दिसंबर 1886 को कौंसिल का गठन हुआ। इसके बाद आठ जनवरी को 1887 को पब्लिक लाइब्रेरी (थार्नहिल मेन मेमोरियल हॉल) में पहली बैठक हुई।
1887 में हुईं थीं छह बैठकें
1887 में कौंसिल की कुल छह बैठकें हुईं थीं। पहली आठ जनवरी, दूसरी 19 फरवरी, तीसरी 19 मार्च, चौथी 16 अप्रैल, पांचवीं 23 अप्रैल तथा छठी 11 नवंबर को हुई थी। यही आखिरी बैठक भी रही और उसमें कौंसिल को भंग कर दिया गया। ये बैठकें पब्लिक लाइब्रेरी के अलावा मेयो हाल, मेयो सेंट्रल कालेज (इलाहाबाद विश्वविद्यालय का विज्ञान संकाय परिसर), गर्वनमेंट हाउस (मोतीलाल नेहरू मेडिकल कालेज) तथा गवर्नमेंट प्रेस में हुई थीं। एजी ऑफिस और पुलिस मुख्यालय उन दिनों कौंसिल के कार्यालय हुआ करते थे। इसके बाद 21 नवंबर को सर आकलैंड काल्विन को उत्तर पश्चिम प्रांत का नया लेफ्टिनेंट गवर्नर नियुक्त किया गया।
विधानमंडल में होते थे नौ सदस्य
नार्थ वेस्टर्न प्रांविसेज एवं अवध लेजिस्लेटिव कौंसिल में नौ सदस्य हुआ करते थे। इन्हें लेफ्टिनेंट गवर्नर नामित करता था। इनमें चार कार्यालयीन तथा पांच अकार्यालयी सदस्य होते थे। चार कार्यालयीन सदस्य वायसराय विधान परिषद के सदस्य जेडब्ल्यू क्विंंटन, स्थानीय सरकार के मुख्य सचिव जे.बुडबर्न, लखनऊ के कमिश्नर एमएएमसी कानथे तथा सरकार के विधि परामर्शी जीई नाक्स थे। वहीं जनप्रतिनिधि के तौर पर चयनित सदस्य गृह सरकार के प्रतिनिधि टी.कालिन, अवध के तालुकेदार राजा प्रताप नारायण सिंह, वायसराय विधान परिषद के सदस्य मुस्लिम प्रतिनिधि सर सैयद अहमद खान, गोरखपुर के जमींदार और मानद मजिस्ट्रेट राय बहादुर दुर्गा प्रसाद तथा अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता पंडित अयोध्या नाथ थे। हालांकि इनके ज्यादातर सदस्यों का चयन अंग्रेजी सरकार करती थी। इसलिए वे अंग्रेजों की बात ही करते थे। इसलिए उन दिनों कौंसिल को ‘सुनहरा स्वांग’ कहा गया। नौ सदस्यों में अयोध्या नाथ ही थे, जिन्होंने बैठक में हर प्रस्ताव पर अपनी बात रखी थी। इसलिए उन्हें पहला बागी सदस्य कहा गया था।
1887 की बैठकों में रखे गए प्रस्ताव
1887 में हुई विधानमंडल की बैठक में बिल ऑफ शार्टिंग द लैंग्वेज यूज्ड, एक्शन ऑफ द कौंसिल प्रस्ताव रखे गए। पहला गैर सरकारी विधायक ‘प्रिवेंशन ऑफ क्रूइल्टी टू एनिमल बिल’ पं.अयोध्या नाथ ने सदन के पटल पर रखा। हालांकि यह स्वीकृत नहीं हो सका।
116 वर्ष बाद 2003 में हुई थी बैठक
नार्थ वेस्टर्न प्राविंसेज एंड अवध विधानमंडल की पहली बैठक की स्मृति में आठ जनवरी 2003 को पब्लिक लाइब्रेरी परिसर में उत्तरशती समारोह का आयोजन हुआ। चूंकि, बैठक में करीब 600 सदस्यों को शामिल होना था, इसके विपरीत लाइब्रेरी के अध्ययन कक्ष (1887 में इसी में बैठक हुई थी) में इतने लोगों के बैठने की व्यवस्था नहीं थी। इसलिए हॉल के बाहर समारोह का आयोजन हुआ। साथ ही सदन भी बैठी, जिसमें कई बिंदुओं पर चर्चा हुई तो नेताओं ने एक दूसरे पर कटाक्ष भी किए। बैठक में तत्कालीन राज्यपाल विष्णुकांत शास्त्री, मुख्यमंत्री मायावती, विधानसभा अध्यक्ष केशरीनाथ त्रिपाठी, विधान परिषद के कार्यकारी सभापति कुंवर मानवेंद्र सिंह, कांग्रेस नेता प्रमोद तिवारी समेत अनेक मंत्रियों तथा विधायकों ने हिस्सा लिया था।