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निवर्तमान कार्यकारिणी की भूमिका पर उहापोह

Wed, 09 Aug 2017 02:00 AM IST
Updated Wed, 09 Aug 2017 02:00 AM IST
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निवर्तमान कार्यकारिणी की भूमिका पर उहापोह
निवर्तमान कार्यकारिणी की भूमिका पर उहापोह
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- महापौर और पार्षद संशय में, अफसर मौन
- गृहकर समेत अन्य फैसलों को बदलने के मुद्दे पर होगा टकराव
इलाहाबाद(ब्यूरो)। नगर निगम सदन का कार्यकाल मंगलवार को पूरा हो गया। 15 जुलाई को जारी शासनादेश के मुताबिक महापौर और पार्षद निवर्तमान हो गए। निगम परिसर में दिनभर गहमागहमी बनी रही। सलाहकार के रूप में कार्यकारिणी की भूमिका पर भी उहापोह बना हुआ है। महापौर संग 12 कार्यकारिणी संशय में हैं। अफसरों की चुप्पी से माहौल रहस्यमय बना है। माना जा रहा है कि अधिशाषी अधिकारी की भूमिका में नगर आयुक्त के कमान संभालते ही गृहकर समेत सदन के अन्य फैसलों को बदलने के मुद्दे पर टकराव होगा।
शासनादेश के मुताबिक स्थानीय निकायों में अब जनप्रतिनिधि नहीं अफसर कमान संभालेंगे। नगर निगम में सदन की पहली बैठक के दिन से जनप्रतिनिधियों का कार्यकाल समाप्त माना जाएगा। मंगलवार को निगम परिसर में गहमागहमी बनी रही। महापौर अभिलाषा गुप्ता नंदी भी अपने कार्यालय में शाम तक बैठीं। जनता और पार्षदों से मिलीं। कई पार्षदों ने भी अपने-अपने क्षेत्र के कार्य निपटाए। अफसर तो लखनऊ गए थे इसलिए सिर्फ पत्र ही भेजे गए।
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पार्षदों के बीच यह चर्चा रही कि सलाहकार की भूमिका में रहने वाली कार्यकारिणी की अध्यक्षता महापौर करेंगी या नगर आयुक्त। नियमावली के मुताबिक कार्यकारिणी में महापौर का पद पदेन होता है। इस कारण महापौर को किनारे कर कार्यकारिणी की भूमिका नगर आयुक्त तय करेंगे। जबकि महापौर अभिलाषा गुप्ता नंदी का कहना है कि नया चुनाव होने के बाद चुने गए मेयर को शपथ दिलाने के बाद उनकी भूमिका समाप्त होगी। वह कार्यकारिणी की पदेन सदस्य बनी रहेंगी। इस बारे में फिलहाल नगर निगम के अफसर चुप्पी साधे हैं। नगर आयुक्त समेत अन्य अफसर मीटिंग में लखनऊ गए हैं। शाम तक उनके फोन स्विच ऑफ रहे।
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इनसेट----
अब फैसले पर टिकी निगाहें
नगर निगम के कार्यकाल के बारे में जारी शासनादेश को हाईकोर्ट में कुछ लोगों ने याचिका दाखिल कर चुनौती दी है। इस बारे में कोर्ट ने शासन से जवाब तलब किया है। संभावना है कि इस याचिका पर 11 अगस्त को सुनवाई हो सकती है। इस याचिका के निस्तारण पर महापौर और पार्षदों की निगाह टिकी है।

बंधी आस
कई पार्षदों को उम्मीद है कि शासनादेश की त्रुटियों में सुधार हुआ तो स्थितियां बदल सकती हैं। बता दें कि प्रदेश में 14 नगर निगमों में 12 की कुर्सी पर भाजपा के महापौर काबिज हैं। ऐसे में शासन स्तर से निर्णय बदला जा सकता है।
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