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यशपाल चौहान हत्याकांड : दोहरे हत्याकांड से लगा था भतीजी

Thu, 16 Jun 2022 01:30 AM IST
Aligarh Bureau अलीगढ़ ब्यूरो
Updated Thu, 16 Jun 2022 01:30 AM IST
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Yashpal Chauhan murder Case
जिस संयुक्त परिवार में भतीजी की शादी की तैयारियां चल रही थीं, शादी से ठीक नौ दिन पहले उस परिवार के मुखिया वरिष्ठ भाजपा नेता यशपाल सिंह चौहान व उनके छोटे भाई अनिल चौहान की हत्या हो गई। इस घटना ने एक तरफ जहां जिले को हिलाकर रख दिया, वहीं परिवार में शादी की खुशियों को ग्रहण लग गया। हालांकि परिवार ने शादी टालने पर विचार किया। मगर सामाजिक सहमति से तय हुआ कि चंद लोगों की मौजूदगी में शादी की औपचारिकताएं कर ली जाएं। तब जाकर यह तय हुआ। दोनों परिवारों के पांच-पांच लोगों की मौजूदगी में गांव बड़ागांव उखलाना में 12 मार्च 2011 को बेहद सामान्य तरीके से ये शादी की गई।
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अभियोजन पक्ष के अनुसार, यशपाल सिंह चार भाइयों में सबसे बड़े थे। उनसे छोटे दिव्यांग विक्रम सिंह (2019 में मृत), सतीश सिंह वादी मुकदमा, अनिल सिंह घटना में मृत थे। इनमें से विक्रम सिंह की बेटी गीता की शादी 12 मार्च को तय थी। बुलंदशहर से बरात आनी थी। शादी की तैयारियां चल रही थीं। खुद पीएसी के पास रहने वाले यशपाल सिंह पहले गांव पहुंचे। वहां से अपने परिवार के सदस्यों को लेकर भतीजी की शादी की खरीदारी के लिए रुपये निकालने बैंक गए थे। वहां से निकलते ही यह घटना हुई। इसके बाद शादी कैसे और किन हालात में हुई। यह बताते हुए परिजन सिसक उठते हैं।
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ऐसे रखी गई ठेके में रंजिश की नींव
ये किसी से छिपा नहीं है कि अपने राजनीतिक व सामाजिक रसूख के चलते यशपाल सिंह की पावर हाउस में गहरी पैठ थी। राजनीति के साथ-साथ पिछले लंबे समय से वे पावर हाउस में ठेकेदारी कर रहे थे। बड़े ठेकों पर उनकी पकड़ी मजबूत थी। परिवार के अन्य सभी सदस्य उन्होंने इसी काम में शामिल कर रखे थे। जब पुरानी 30/3 मेगावाट यूनिट बंद हुई और उसके स्क्रैप का ठेका उठा तो यशपाल सिंह ने यह ठेका 27 करोड़ रुपये में अपनी फर्म के नाम लिया। यशपाल सिंह के बेटे गौरव चौहान बताते हैं कि उस ठेके में छोटा सा शेयर लगाकर हत्या में सजा पा चुके दूसरे ठेकेदार अनिल सिंह व प्रमोद राघव ने साझेदारी की। उस समय कुछ वजहों से उस ठेके का पूरा भुगतान पावर हाउस को जमा नहीं हो पाया तो ठेके पर स्थगनादेश आ गया। दो माह यह स्थगनादेश लागू रहा। इस दौरान अनिल सिंह व प्रमोद राघव को लगा कि कहीं उनका रुपया इसी विवाद के चलते डूब न जाए तो उन्होंने अपना रुपया वापस लेकर ठेके से खुद को अलग कर लिया। मगर बाद में उनके पिता ने पूरा रुपया जमा कर ठेका शुरू कर दिया। जब काम चल पड़ा तो अनिल सिंह व प्रमोद सिंह को लगा कि अब इनसे कैसे लाभ लिया जाए तो ये फिर उसमें साझेदारी मांगने लगे और न देने पर जबरन हिस्से की डिमांड करने लगे। इसी बात का उनके पिता ने विरोध किया और बाद में इन लोगों ने साजिश रचकर इस सोच के साथ इस घटना को अंजाम दिया कि आने वाले समय में उनका वर्चस्व हो जाएगा।
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अदालत ने माना हत्याकांड ठेकेदारी/व्यापारी प्रतिस्पर्धा में
अभियोजन अधिवक्ता डीजीसी फौजदारी धीरेंद्र सिंह तोमर के अनुसार, इस हत्याकांड में गवाही, साक्ष्यों के बाद जब 313 के तहत आरोपियों के बयान दर्ज हुए तो उनमें से पावर हाउस में कर्मचारी अजयपाल व केशव उर्फ कमलकांत को छोड़कर बाकी सभी ने एक बात स्वीकारी। सभी ने कहा कि वे पावर हाउस में ठेकेदारी करते हैं और उसी प्रतिस्पर्धा में उनके विरुद्ध झूठा मुकदमा दर्ज कराया गया है। इससे पहले गवाही में सबसे पहले गवाह घटना के वादी सतीश, दूसरे गवाह घायल संकेत व ड्राइवर शिवकुमार ने जो गवाही दी, वह आपस में तालमेल खा रही थी। तीनों ने ठेकेदारी की प्रतिस्पर्धा, ठेके में शामिल करने व रंगदारी मांगने की बात एक समान कही। अभियोजन पक्ष के अनुसार अदालत ने माना कि इसके बाद मुकदमा दर्ज होने की सही टाइमिंग, मेडिकल रिपोर्ट, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और सबसे आखिर में यह बात पाई गई कि तहरीर लेखक वादी ने किसी जल्दबाजी या किसी के कहने पर तहरीर नहीं लिखी है। तहरीर से साफ झलकता है कि बनावटी तहरीर नहीं है। इन सभी आधारों पर अदालत ने इसे ठेकेदारी/व्यापारिक प्रतिस्पर्धा में हत्याकांड होना माना और सभी को दोषी करार देकर सजा सुनाई है।
बचाव पक्ष की ये दलील नहीं हो पाईं अदालत में साबित
अभियोजन अधिवक्ता डीजीसी फौजदारी धीरेंद्र सिंह तोमर के अनुसार, बचाव पक्ष के अधिवक्ताओं में शामिल एम जकावत सुल्तान, चंद्रशेखर दीक्षित, संजीव शर्मा आदि की ओर से अपने अपने पक्ष रखे। सबसे पहला और महत्वपूर्ण पक्ष यह रखा कि पुलिस ने तहरीर, नक्शा नजरी, माल बरामदगी के आधार पर जो घटनास्थल दर्शाया है और उस घटनास्थल से टूटा चश्मा, खून, रायफल का एक टुकड़ा बरामद होना दर्शाया है, उसका कोई चश्मदीद गवाह नहीं है। उसकी वैज्ञानिक जांच रिपोर्ट भी नहीं पेश की है। ऐसे में कैसे मान लिया जाए कि घटनास्थल वही है। साथ में बैंक के दरवाजे पर घटना हुई, बाहर बाजार बताया गया। मगर न तो बैंक से और न बाजार से कोई पब्लिक का गवाह आया। पावर हाउस में सीआईएसएफ सुरक्षा रहती है। वहां से कोई पुलिस को सूचना देने वाला सामने नहीं आया। इसके अलावा मुकदमा लिखने के समय पर भी बचाव पक्ष ने अपना तर्क पेश किया। जो चश्मा टूटा मिला और जो रायफल का हिस्सा मिला, वे किसके थे, ये पुलिस ने नहीं बताया। मगर अदालत में ये तमाम दलीलें साबित नहीं हो सकीं।
जवां नहर बंद कराकर बरामद किए थे हथियार
अभियोजन अधिवक्ता के अनुसार, पुलिस ने अनिल व प्रमोद को जब गिरफ्तार किया तो उनसे हथियार बरामद नहीं हो सके। उन्होंने स्वीकारा कि भागते समय हथियार जवां नहर में फेंक दिए हैं। उस समय गोताखोरों की मदद से हथियार बरामद कराने का प्रयास किया। मगर सफलता नहीं मिली। बाद में इन दोनों को रिमांड पर लिया गया। इससे पहले पुलिस ने सिंचाई विभाग को पत्र लिखकर पावर हाउस के पावर प्लांट को पानी की आपूर्ति देने वाली नहर को बंद कराया। तब इन दोनों को मौके पर ले जाकर उनकी निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त तमंचा व पिस्टल आदि हथियार बरामद किए थे।
केशव का ड्यूटी पर होने का तथ्य नहीं हुआ साबित
अभियोजन अधिवक्ता के अनुसार, इस घटना में पावर हाउस के कर्मचारी केशव की गिरफ्तारी के बाद उसके परिवार की ओर से घटना के समय केशव के ड्यूटी पर होने की दलील दी। मगर चालक शिवकुमार ने केशव को मौके पर होना और पहचाना बताया। इस दलील पर पुलिस ने जांच की। मगर साबित नहीं हो सका और तथ्य आया कि ड्यूटी पर था, मगर लंच टाइम में केशव घटनास्थल पर आया था। अदालत में भी बचाव पक्ष के अधिवक्ता के अनुरोध उसके अधिकारी को बयान देने के लिए बुलाया। मगर वह भी लंच टाइम वाली बात साबित नहीं कर सके।
- मेरे पिता की हत्या जिस वक्त हुई, उस वक्त मैं मात्र 19 वर्ष का था। मगर मैंने अपने चाचा व अन्य की निगरानी में सब कुछ देखा। उसके बाद चाचा के साथ पैरोकारी शुरू की। आज तक अदालत में पैरोकारी करते थे। न्याय की पूरी उम्मीद थी। आज न्याय मिला है। मैं और मेरा परिवार इस निर्णय पर बेहद खुश हैं।-गौरव चौहान, पुत्र यशपाल सिंह चौहान
बचाव पक्ष करेगा हाईकोर्ट में अपील
इस फैसले को लेकर बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता एम जकावत सुल्तान व संजीव शर्मा कहते हैं कि हमारी ओर से दी गईं तमाम दलीलों को अदालत ने नजरंदाज किया है। फैसला स्वीकार है। मगर अब इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की जाएगी।
एक चश्मदीद की हो चुकी है हत्या
इस घटना में यशपाल सिंह चौहान का एक अन्य पारिवारिक भतीजा पुष्पेंद्र भी जख्मी हुआ था। वह भी चश्मदीद गवाह था। मगर इस घटना के कुछ वर्ष बाद गांव के बाहर बदमाशों ने उसकी हत्या कर दी। हालांकि शुरुआत में शोर मचा था कि इसी हत्या के क्रम में यह हत्या हुई है। मगर बाद में वह गांव से जुड़े एक अन्य विवाद में हत्या होना उजागर हुआ था।

एक तरफ खुशी का माहौल, दूसरी तरफ गम में डूबे परिवार
अलीगढ़। इस निर्णय के बाद एक तरफ यशपाल सिंह चौहान परिवार, समर्थकों में खुशी का माहौल देखने को मिला। मगर दोषी परिवारों में गम की स्थिति थी। चूंकि एक ही परिवार के चार व एक परिवार के दो सगे भाई, दो रिश्तेदार व एक अन्य को सजा हुई है। इसलिए ये सभी आपस में जुड़े हुए हैं। इन सभी के परिवार पावर हाउस परिसर में ही रहते हैं। इन परिवारों की महिलाएं व बच्चे भी दोपहर में दीवानी में मौजूद थे। जैसे ही निर्णय आया, उसके बाद से उनके चेहरों पर मायूसी छा गई। महिलाएं अपने आंसू नहीं रोक सकीं। आरोपी भी जेल जाते समय इस कदर अपने चेहरे छिपा रहे थे कि वे किसी को देख नहीं पा रहे थे। ब्यूरो
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