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विश्व तपेदिक दिवस : पति व बेटी बीमार, सिलाई कर पत्नी संभाल रही घर की कमान
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क्षय रोग से पीड़ित किशोरी, साथ में उसकी मां।
- फोटो : CITY OFFICE
कौशल कुमार ओझा
प्रिंस नगर की महिला ममता देवी (बदला हुआ नाम) की संघर्ष की कहानी प्रेरक है। खासकर उन लोगों के लिए जो बीमारी एवं आर्थिक तंगी से हारकर टूट और बिखर जाते हैं। मजदूर पति, जवान बेटे-बेटियों को टीबी होने के बाद भी ममता ने हार नहीं मानी। स्वयं सिलाई कर पति व बच्चों की बीमारी, घर खर्च की जिम्मेदारी संभाली तो बच्चों की शिक्षा में भी लगातार मददगार बनी हुई हैं। टीबी की बीमारी से उबर चुके बच्चे भी अब ट्यूशन पढ़ाकर घर खर्च में मां का हाथ बंटाने लगे हैं।
करीब 25 वर्ष पहले बिहार से मजदूरी करने आए ममता देवी (बदला हुआ नाम) के पति यहीं के हो गए। रिक्शा चलाकर परिवार की गाड़ी चलाते रहे। तीन बेटी एवं दो बेटे हुए। किराये के एक कमरे में पूरा परिवार रहता है। भरपेट भोजन भले ही कभी-कभार नहीं मिला, लेकिन बच्चों की शिक्षा से उन्होंने कभी समझौता नहीं किया। बड़ी बेटी एमकॉम कर रही है। दूसरी बेटी पालीटेक्निक अंतिम वर्ष और एक बेटा पालीटेक्निक प्रथम वर्ष का छात्र है। छोटी बेटी एवं बेटा भी पढ़ाई कर रहे हैं।
ममता के पति करीब दो साल से टीबी से बीमार हैं। एक ही कमरे का मकान है। सभी उसी में रहते-सोते हैं तो धीरे-धीरे टीबी रोग ने बच्चों को भी अपनी चपेट में ले लिया। बड़ी बेटी के बाद बेटा भी टीबी से पीड़ित हो गया। पति व एक बेटी अभी भी टीबी ग्रस्त हैं। दो बच्चे इस रोग से बाहर निकल चुके हैं। इसके बावजूद ममता ने हार नहीं मानी। सिलाई कर प्रति माह 5-6 हजार रुपये की कमाई करने लगीं। इससे कमरे का किराया एवं घर खर्च का कुछ खर्च निकल आता है। बच्चों ने भी पढ़ते हुए ट्यूशन पढ़ाकर मां का सहयोग शुरू कर दिया।
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पिता की मृत्यु, बेटी पीड़ित
महानगर के संकल्प विहार की एक किशोरी टीबी से पीड़ित है। उसके घर की हालत ठीक नहीं है। करीब एक महीने पहले उसके पिता की टीबी की बीमारी से मृत्यु हो चुकी है। मथुरा में उनका उपचार चल रहा था। अब 12 वर्षीय किशोरी टीबी की चपेट में आ गई है। स्वास्थ्य विभाग से दवा एवं अन्य चीजें उपलब्ध कराई जा रही है।
टीबी के 189 नए रोगी चिन्हित
9 से 22 मार्च 2022 के बीच आयोजित एक्टिव केस फाइंडिंग अभियान में 189 नए रोगी चिन्हित किए गए हैं। अभियान के तहत 8.45 लाख लोगों की स्क्रीनिंग का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। नौ लाख से अधिक लोगों की स्क्रीनिंग के बाद 189 रोगी सामने आए हैं।
पिछले छह साल में टीबी की स्थिति
वर्ष 0 से 18 वर्ष 18 वर्ष से अधिक कुल संख्या
2017 1003 4909 5909
2018 1813 8561 10374
2019 2356 11504 13860
2020 1673 8155 9828
2021 2255 10697 12952
2022 491 2165 2656
1001 क्षय रोगियों को अधिकारी एवं संस्था ने लिया है गोद
जिलाधिकारी - 05, मुख्य विकास अधिकारी - 05, अपर जिलाधिकारी शहर - 05, एमओटीसी - 22 - 220, मुख्य चिकित्सा अधिकारी - 10, जिला क्षय रोग अधिकारी 10, बीडीओ-12- 120, डॉ. नीता वार्ष्णेय -10, डॉ. पवन वार्ष्णेय - 20, डॉ. जीके सिंह - 10, डॉ. प्रदीप बंसल - 10, डॉ. चितरंजन सिंह - 10, डॉ. अरविंद हरि गुप्ता - 5, डॉ. प्रवीण वार्ष्णेय, 20, लक्ष्मी वेलफेयर सोसाइटी - 201, दुर्बल वर्ग उत्थान समिति - 60, साईं एजूकेशन एंड वेलफेयर सोसाइटी - 60, उम्मीद प्रोजेक्ट - 60, आनंद ग्रीन फाउंडेशन - 10, आईएमए अध्यक्ष - 20, आईएमए सचिव -20, आईएमए ट्रेजरार - 20, पीडीए अध्यक्ष - 25, पीडीए सचिव - 25, रोटरी क्लब - 20, मिथराज हॉस्पिटल - 10, वरुण ट्रॉमा सेंटर - 10
ज्यादातर टीबी के मरीज गरीब बस्तियों से निकलते हैं। नशे की गिरफ्त में आए लोग भी टीबी की चपेट में आते हैं। समय पर जांच नहीं कराते। खांसी-बुखार होने पर दुकानदार से दवा लेकर खा लेते हैं। झोलाछाप के पास जाकर इलाज कराते हैं। - जीतेंद्र कुमार, एलटी, राष्ट्रीय क्षय रोग उन्मूलन कार्यक्रम।
टीबी के लिए सामाजिक-आर्थिक स्थिति भी जिम्मेदार है। बचपन में टीबी रोग का टीका नहीं लगवाने, जागरुकता की कमी, पौष्टिक भोजन न मिलना और रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने की वजह से बहुत सारे लोग टीबी की चपेट में आते हैं। - डॉ. विभव वार्ष्णेय, बाल रोग विशेषज्ञ।
एक्टिव केस फाइंडिंग अभियान के तहत 9.43 लाख लोगों की स्क्रीनिंग की गई, जिसमें 189 टीबी रोगी सामने आए हैं। टीबी रोगियों को पौष्टिक भोजन के लिए 500 रुपये प्रति माह दिए जाते हैं। 12 ब्लाकों में कुल 22 टीबी यूनिट है। 35 माइक्रोस्कोपिक सेंटर हैं। क्षय रोगियों की तमाम सुविधाएं नि:शुल्क दी जाती हैं। - डॉ. अनुपम भास्कर, जिला क्षय रोग अधिकारी।
किसी व्यक्ति को दो सप्ताह से अधिक समय तक खांसी रहे, बुखार रहता हो तथा शाम को बढ़ जाता हो। सीने में दर्द, खांसी के साथ खून आना, भूख न लगना, वजन घटना आदि टीबी रोग के लक्षण हैं। लक्षण हो तो तुरंत चिकित्सक से संपर्क कर जांच कराएं। - सत्येंद्र कुमार, जिला समन्वयक।
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प्रिंस नगर की महिला ममता देवी (बदला हुआ नाम) की संघर्ष की कहानी प्रेरक है। खासकर उन लोगों के लिए जो बीमारी एवं आर्थिक तंगी से हारकर टूट और बिखर जाते हैं। मजदूर पति, जवान बेटे-बेटियों को टीबी होने के बाद भी ममता ने हार नहीं मानी। स्वयं सिलाई कर पति व बच्चों की बीमारी, घर खर्च की जिम्मेदारी संभाली तो बच्चों की शिक्षा में भी लगातार मददगार बनी हुई हैं। टीबी की बीमारी से उबर चुके बच्चे भी अब ट्यूशन पढ़ाकर घर खर्च में मां का हाथ बंटाने लगे हैं।
करीब 25 वर्ष पहले बिहार से मजदूरी करने आए ममता देवी (बदला हुआ नाम) के पति यहीं के हो गए। रिक्शा चलाकर परिवार की गाड़ी चलाते रहे। तीन बेटी एवं दो बेटे हुए। किराये के एक कमरे में पूरा परिवार रहता है। भरपेट भोजन भले ही कभी-कभार नहीं मिला, लेकिन बच्चों की शिक्षा से उन्होंने कभी समझौता नहीं किया। बड़ी बेटी एमकॉम कर रही है। दूसरी बेटी पालीटेक्निक अंतिम वर्ष और एक बेटा पालीटेक्निक प्रथम वर्ष का छात्र है। छोटी बेटी एवं बेटा भी पढ़ाई कर रहे हैं।
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ममता के पति करीब दो साल से टीबी से बीमार हैं। एक ही कमरे का मकान है। सभी उसी में रहते-सोते हैं तो धीरे-धीरे टीबी रोग ने बच्चों को भी अपनी चपेट में ले लिया। बड़ी बेटी के बाद बेटा भी टीबी से पीड़ित हो गया। पति व एक बेटी अभी भी टीबी ग्रस्त हैं। दो बच्चे इस रोग से बाहर निकल चुके हैं। इसके बावजूद ममता ने हार नहीं मानी। सिलाई कर प्रति माह 5-6 हजार रुपये की कमाई करने लगीं। इससे कमरे का किराया एवं घर खर्च का कुछ खर्च निकल आता है। बच्चों ने भी पढ़ते हुए ट्यूशन पढ़ाकर मां का सहयोग शुरू कर दिया।
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पिता की मृत्यु, बेटी पीड़ित
महानगर के संकल्प विहार की एक किशोरी टीबी से पीड़ित है। उसके घर की हालत ठीक नहीं है। करीब एक महीने पहले उसके पिता की टीबी की बीमारी से मृत्यु हो चुकी है। मथुरा में उनका उपचार चल रहा था। अब 12 वर्षीय किशोरी टीबी की चपेट में आ गई है। स्वास्थ्य विभाग से दवा एवं अन्य चीजें उपलब्ध कराई जा रही है।
टीबी के 189 नए रोगी चिन्हित
9 से 22 मार्च 2022 के बीच आयोजित एक्टिव केस फाइंडिंग अभियान में 189 नए रोगी चिन्हित किए गए हैं। अभियान के तहत 8.45 लाख लोगों की स्क्रीनिंग का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। नौ लाख से अधिक लोगों की स्क्रीनिंग के बाद 189 रोगी सामने आए हैं।
पिछले छह साल में टीबी की स्थिति
वर्ष 0 से 18 वर्ष 18 वर्ष से अधिक कुल संख्या
2017 1003 4909 5909
2018 1813 8561 10374
2019 2356 11504 13860
2020 1673 8155 9828
2021 2255 10697 12952
2022 491 2165 2656
1001 क्षय रोगियों को अधिकारी एवं संस्था ने लिया है गोद
जिलाधिकारी - 05, मुख्य विकास अधिकारी - 05, अपर जिलाधिकारी शहर - 05, एमओटीसी - 22 - 220, मुख्य चिकित्सा अधिकारी - 10, जिला क्षय रोग अधिकारी 10, बीडीओ-12- 120, डॉ. नीता वार्ष्णेय -10, डॉ. पवन वार्ष्णेय - 20, डॉ. जीके सिंह - 10, डॉ. प्रदीप बंसल - 10, डॉ. चितरंजन सिंह - 10, डॉ. अरविंद हरि गुप्ता - 5, डॉ. प्रवीण वार्ष्णेय, 20, लक्ष्मी वेलफेयर सोसाइटी - 201, दुर्बल वर्ग उत्थान समिति - 60, साईं एजूकेशन एंड वेलफेयर सोसाइटी - 60, उम्मीद प्रोजेक्ट - 60, आनंद ग्रीन फाउंडेशन - 10, आईएमए अध्यक्ष - 20, आईएमए सचिव -20, आईएमए ट्रेजरार - 20, पीडीए अध्यक्ष - 25, पीडीए सचिव - 25, रोटरी क्लब - 20, मिथराज हॉस्पिटल - 10, वरुण ट्रॉमा सेंटर - 10
ज्यादातर टीबी के मरीज गरीब बस्तियों से निकलते हैं। नशे की गिरफ्त में आए लोग भी टीबी की चपेट में आते हैं। समय पर जांच नहीं कराते। खांसी-बुखार होने पर दुकानदार से दवा लेकर खा लेते हैं। झोलाछाप के पास जाकर इलाज कराते हैं। - जीतेंद्र कुमार, एलटी, राष्ट्रीय क्षय रोग उन्मूलन कार्यक्रम।
टीबी के लिए सामाजिक-आर्थिक स्थिति भी जिम्मेदार है। बचपन में टीबी रोग का टीका नहीं लगवाने, जागरुकता की कमी, पौष्टिक भोजन न मिलना और रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने की वजह से बहुत सारे लोग टीबी की चपेट में आते हैं। - डॉ. विभव वार्ष्णेय, बाल रोग विशेषज्ञ।
एक्टिव केस फाइंडिंग अभियान के तहत 9.43 लाख लोगों की स्क्रीनिंग की गई, जिसमें 189 टीबी रोगी सामने आए हैं। टीबी रोगियों को पौष्टिक भोजन के लिए 500 रुपये प्रति माह दिए जाते हैं। 12 ब्लाकों में कुल 22 टीबी यूनिट है। 35 माइक्रोस्कोपिक सेंटर हैं। क्षय रोगियों की तमाम सुविधाएं नि:शुल्क दी जाती हैं। - डॉ. अनुपम भास्कर, जिला क्षय रोग अधिकारी।
किसी व्यक्ति को दो सप्ताह से अधिक समय तक खांसी रहे, बुखार रहता हो तथा शाम को बढ़ जाता हो। सीने में दर्द, खांसी के साथ खून आना, भूख न लगना, वजन घटना आदि टीबी रोग के लक्षण हैं। लक्षण हो तो तुरंत चिकित्सक से संपर्क कर जांच कराएं। - सत्येंद्र कुमार, जिला समन्वयक।

डॉक्टर विभव वार्ष्णेय।- फोटो : CITY OFFICE

डॉक्टर अनुपम भास्कर।- फोटो : CITY OFFICE