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जब दबिश के बाद कोर्ट में सरेंडर कर गया था विकास दुबे
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कानपुर देहात के शिवली में तैनात रहे इंस्पेक्टर एनपी सिंह।
- फोटो : CITY OFFICE
अभिषेक शर्मा
बात 22 बरस पुरानी है। मगर, कानपुर देहात के अपराधी विकास दुबे गैंग की इस जघन्य वारदात ने उस पूरे घटनाक्रम को ताजा कर दिया है। उस समय भी राजनीतिक सरपरस्ती में विकास दुबे अपराध करता था। यह कहना है वर्ष 2009 में यूपी पुलिस से बतौर इंस्पेक्टर सेवानिवृत्त हुए एनपी सिंह का, जिन्होंने अपने डेढ़ माह के शिवली कोतवाली काल में विकास दुबे को खूब दौड़ाया था और मजबूरन वह कोर्ट में सरेंडर कर गया था।
मूल रूप से मडराक के गांव मईनाथ निवासी एनपी सिंह वर्तमान में आगरा रोड एडीए कालोनी में रहते हैं। वे बताते हैं कि वर्ष 1998 से 2001 तक वह कानपुर देहात में तैनात रहे। इसी बीच शिवली कोतवाली में तैनात एसएसआई विजेंद्र सिंह जब पुलिस टीम के साथ विकास दुबे के घर दबिश देने गए तो विकास ने उनके साथ मारपीट कर दी। पुलिस टीम विजेंद्र सिंह को अकेले छोड़कर भाग आई। बाद में एसएसआई ने पुलिस मजामत का मुकदमा दर्ज किया गया।
इस घटना पर कानपुर रेंज के डीआईजी एलपी मिश्रा ने अगस्त 1998 को एनपी सिंह को शिवली कोतवाल बनाकर भेजा और हिदायत दी कि विकास दुबे बहुत गुंडई करता फिर रहा है। उसे सही करना है। कुछ दिन तक विकास को मुखबिरों की मदद से उसके विषय में जानकारी की गई। कुछ दिन बीतने पर फिर तत्कालीन कानपुर सांसद श्याम विहारी मिश्रा ने खुद को विकास से खतरा बताकर अधिकारियों से शिकायत की तो डीआईजी ने फिर एनपी सिंह को सख्ती के निर्देश दिए। इस पर एनपी सिंह ने थाने में 35-40 पुलिसकर्मियों को एकत्रित कर विकास दुबे के घर दबिश का प्लान बनाया। आधे पुलिसकर्मी तो यह कहकर पीछे हटने लगे कि वह बदतमीजी करा देगा। एनपी सिंह ने जैसे तैसे पुलिस टीम को समझाया और रात में विकास के घर दबिश दी। इस दबिश के दौरान विकास तो बाउंड्री से घर के पीछे भाग गया, मगर उसके पिता व भाई को पुलिस पकड़कर थाने ले आई।
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सुबह इलाके के एक विधायक ने थाने आकर उन दोनों को छोड़ने की वकालत की, मगर बात नहीं बनी और उनसे कह दिया गया कि विकास को ले आओ, इन्हें ले जाओ। देर रात तक अधिकारियों से वार्ता के बाद यह सहमति बनी कि सुबह विकास कोर्ट में सरेंडर कर देगा इन्हें घर जाने दिया जाए। इस पर इसके पिता व भाई को छोड़ा गया और अगले दिन विकास कोर्ट में सरेंडर कर गया। मगर इस घटना के बाद एनपी सिंह सिर्फ डेढ़ महीने ही शिवली रहे और वहां से उन्हें अकबरपुर पोस्ट कर दिया गया।
इसके बाद वे विकास के किस्से सुनते रहे। 2001 में जब वह कन्नौज के गुरसहायगंज इंस्पेक्टर तैनात हुए, तब उन्हें पता चला कि विकास ने श्रम संविदा बोर्ड के अध्यक्ष मनोज शुक्ला की हत्या कर दी है। इसके बाद उस क्षेत्र वे वह आगरा जोन में आ गए। मगर आज इस घटना की सुन उन्हें वह घटना याद आ गई।
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बात 22 बरस पुरानी है। मगर, कानपुर देहात के अपराधी विकास दुबे गैंग की इस जघन्य वारदात ने उस पूरे घटनाक्रम को ताजा कर दिया है। उस समय भी राजनीतिक सरपरस्ती में विकास दुबे अपराध करता था। यह कहना है वर्ष 2009 में यूपी पुलिस से बतौर इंस्पेक्टर सेवानिवृत्त हुए एनपी सिंह का, जिन्होंने अपने डेढ़ माह के शिवली कोतवाली काल में विकास दुबे को खूब दौड़ाया था और मजबूरन वह कोर्ट में सरेंडर कर गया था।
मूल रूप से मडराक के गांव मईनाथ निवासी एनपी सिंह वर्तमान में आगरा रोड एडीए कालोनी में रहते हैं। वे बताते हैं कि वर्ष 1998 से 2001 तक वह कानपुर देहात में तैनात रहे। इसी बीच शिवली कोतवाली में तैनात एसएसआई विजेंद्र सिंह जब पुलिस टीम के साथ विकास दुबे के घर दबिश देने गए तो विकास ने उनके साथ मारपीट कर दी। पुलिस टीम विजेंद्र सिंह को अकेले छोड़कर भाग आई। बाद में एसएसआई ने पुलिस मजामत का मुकदमा दर्ज किया गया।
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इस घटना पर कानपुर रेंज के डीआईजी एलपी मिश्रा ने अगस्त 1998 को एनपी सिंह को शिवली कोतवाल बनाकर भेजा और हिदायत दी कि विकास दुबे बहुत गुंडई करता फिर रहा है। उसे सही करना है। कुछ दिन तक विकास को मुखबिरों की मदद से उसके विषय में जानकारी की गई। कुछ दिन बीतने पर फिर तत्कालीन कानपुर सांसद श्याम विहारी मिश्रा ने खुद को विकास से खतरा बताकर अधिकारियों से शिकायत की तो डीआईजी ने फिर एनपी सिंह को सख्ती के निर्देश दिए। इस पर एनपी सिंह ने थाने में 35-40 पुलिसकर्मियों को एकत्रित कर विकास दुबे के घर दबिश का प्लान बनाया। आधे पुलिसकर्मी तो यह कहकर पीछे हटने लगे कि वह बदतमीजी करा देगा। एनपी सिंह ने जैसे तैसे पुलिस टीम को समझाया और रात में विकास के घर दबिश दी। इस दबिश के दौरान विकास तो बाउंड्री से घर के पीछे भाग गया, मगर उसके पिता व भाई को पुलिस पकड़कर थाने ले आई।
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सुबह इलाके के एक विधायक ने थाने आकर उन दोनों को छोड़ने की वकालत की, मगर बात नहीं बनी और उनसे कह दिया गया कि विकास को ले आओ, इन्हें ले जाओ। देर रात तक अधिकारियों से वार्ता के बाद यह सहमति बनी कि सुबह विकास कोर्ट में सरेंडर कर देगा इन्हें घर जाने दिया जाए। इस पर इसके पिता व भाई को छोड़ा गया और अगले दिन विकास कोर्ट में सरेंडर कर गया। मगर इस घटना के बाद एनपी सिंह सिर्फ डेढ़ महीने ही शिवली रहे और वहां से उन्हें अकबरपुर पोस्ट कर दिया गया।
इसके बाद वे विकास के किस्से सुनते रहे। 2001 में जब वह कन्नौज के गुरसहायगंज इंस्पेक्टर तैनात हुए, तब उन्हें पता चला कि विकास ने श्रम संविदा बोर्ड के अध्यक्ष मनोज शुक्ला की हत्या कर दी है। इसके बाद उस क्षेत्र वे वह आगरा जोन में आ गए। मगर आज इस घटना की सुन उन्हें वह घटना याद आ गई।