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शख्सियत: अलीगढ़ के नायाब हीरे, जिन पर है शहरवासियों को नाज
Mon, 23 Jan 2023 04:43 AM IST
चमन शर्मा
इकराम वारिस
इकराम वारिस
Published by: चमन शर्मा
Updated Mon, 23 Jan 2023 04:43 AM IST
सार
अलीगढ़ के कुछ नायाब हीरे हैं, जिन्होंने पूरे देश में ही नहीं विश्व में अपनी पहचान बनाई। अलीगढ़ से दो-दो मुख्यमंत्री मिले, तो कई स्वतंत्रता सैनानियों ने अंग्रेजों से लोहा लिया।
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अशोक सिंघल
- फोटो : साेशल मीडिया
विस्तार
अशोक सिंघल, मलखान सिंह, मोहनलाल गौतम, चंद्रभानु, कल्याण सिंह, अब्दुल सत्तार, शहरयार अलीगढ़ के नायाब हीरे हैं। इन पर शहरवासियों को नाज है। इन्होंने अलीगढ़ को पूरे देश ही नहीं विश्व में पहचान दिलाई। इन सभी शख्सियतों कभी भुलाया नहीं जा सकता है।
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राम मंदिर आंदोलन को धार थी अशोक सिंघल ने
अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण को लेकर लोगों की भूमिका की बात कही जाए, लेकिन बिना अशोक सिंघल का नाम लिए बगैर इसकी राम मंदिर आंदोलन की कहानी पूर्ण नहीं हो सकती। वास्तव में उन्होंने राम मंदिर आंदोलन में जो धार दी थी, उसी परिणाम है कि राम मंदिर निर्माण कार्य प्रगति पर है। विश्व हिंदू परिषद का अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष रहते हुए अशोक सिंघल ने राम मंदिर के मुद्दे को घर-घर पहुंचाया। अशोक सिंघल अतरौली के बिजौली गांव के थे। उनका जन्म 15 सितंबर 1926 को आगरा में हुआ था। उनके पिता सरकारी सेवा में थे। अशोक सिंघल 1942 में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े। उन्होंने 1950 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से इंजीनियरिंग पूरी की। नौकरी के बदले समाज सेवा का मार्ग चुना। आगे चलकर आरएसएस के प्रचारक बन गए। वह आजीवन अविवाहित रहे। 1984 में दिल्ली के विज्ञान भवन में धर्म संसद का आयोजन किया गया था। यहीं पर राम जन्मभूमि आंदोलन की रणनीति तय की गई। अशोक सिंघल ने पूरी योजना के साथ कार सेवकों को अपने साथ जोड़ना शुरू किया।
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अंग्रेजों को मल्ल युद्ध की तरह पटकनी दी मलखान सिंह ने
ठाकुर मलखान सिंह ने देश को आजाद कराने के लिए अंग्रेजों से लंबे समय तक लड़ाई लड़ी। जब देश आजाद हो गया, तब वह विधानसभा सदस्य बने। इसके बाद मंत्री भी बने। ठाकुर मलखान सिंह का जन्म 24 नवंबर 1889 को अकराबाद के गांव हसौना जगमोहनपुर में हुआ था। अकराबाद की भूमि 1857 के वीर शहीदों से रक्त-रंजित हो चुकी थी। युवावस्था से ही उनके मन में देशभक्ति की भावना हिलोरे मार रही थी। उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस एवं प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के लिए काम किया। उनकी प्रारंभिक शिक्षा गवर्नमेंट हाईस्कूल में हुई थी। इलाहाबाद के अमेरिकन क्त्रिस्श्चियन कॉलेज से बीएससी की उपाधि हासिल की। आगरा विश्वविद्यालय से एलएलबी की पढ़ाई की। भारत छोड़ो आंदोलन, असहयोग आंदोलन और सत्याग्रह आंदोलन के दौरान बेहद सक्रिय रहे और जेल भी गए। आजादी के बाद अलीगढ़ कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष चुने गए। आजादी के बाद 1952 में विधायक निर्वाचित हुए। उनके नाम पर अलीगढ़ में मलखान सिंह जिला चिकित्सालय है। 24 जनवरी 1962 को उनकी मृत्यु हुई।
जेल की कोठरी में दस साल से ज्यादा समय बताया मोहनलाल गौतम ने
जेल की कोठरी में दस साल से ज्यादा समय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मोहनलाल गौतम ने बिताया। वह अपने जीवन काल में सात बार जेल गए। स्वतंत्रता के बाद प्रदेश सरकार में मंत्री बने। पंतनगर में कृषि विश्वविद्यालय की स्थापना में उसका महत्वपूर्ण योगदान था। मोहनलाल गौतम का जन्म 1902 में जनपद के वीरपुरा ग्राम में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा अलीगढ़ में हुई थी। 1921 में असहयोग आंदोलन के समय पढ़ाई छोड़ दी और शाहजहांपुर और हरदोई में राष्ट्रीय आंदोलन में भाग लिया। 1922 में लाहौर में लाला लाजपत राय द्वारा स्थापित नेशनल कॉलेज में भर्ती हो गए और बीए ऑनर्स की उपाधि ली। काकोरी कांड एवं जालियांबाग में भाषण देने के लिए भी बंदी बनाए गए थे। असहयोग आंदोलन, खिलाफत आंदोलन, नमक सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा आंदोलन, लगान बंदी आंदोलन, जमींदारी उन्मूलन के मामले में काफी सक्रिय रहे। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उनको नजरबंद किया गया। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद संविधान सभा के सदस्य बने। 1937, 1952, 1957 व 1962 में उत्तर प्रदेश विधान सभा के सदस्य चुने गए। 1952 से 1954 तक उत्तर प्रदेश में स्वायत शासन विभाग के मंत्री और 1956 से 1960 तक सहकारिता, कृषि व पशुपालन मंत्री रहे। वह महात्मा गांधी से बेहद प्रभावित थे। उनकी पुत्री शीला गौतम चार बार अलीगढ़ की सांसद निर्वाचित हुईं। व्यवसायिक क्षेत्र में भी वैश्विक स्तर पर पहचान बनाई। जिला महिला अस्पताल का नाम उन्हीं के नाम से है, जो मोहनलाल गौतम जिला महिला चिकित्सालय से जाना जाता है। वर्ष 1977 में उनकी मृत्यु हुई।
दो बार संभाली चंद्रभानु ने मुख्यमंत्री की कुर्सी
अलीगढ़ जिले ने उत्तर प्रदेश को दो मुख्यमंत्री दिए हैं। इनमें कल्याण सिंह हैं और दूसरे चंद्रभानु गुप्त हैं। 14 जुलाई 1902 को अतरौली के बिजौली गांव में जन्मे चंद्रभानु गुप्त के परदादा नील का व्यापार करते थे। जर्मनी में नील बनना शुरू हुआ तो बिजौली का नील व्यवसाय भी प्रभावित हुआ। 10 वर्ष की आयु में 1912 में चंद्रभानु गुप्त अपने मौसेरे भाई डॉ. प्यारेलाल के साथ लखीमपुर आ गए। डॉ. प्यारेलाल के साथ ही चंद्रभानु गुप्ता वर्ष 1916 में कांग्रेस सम्मेलन में शामिल हुए। यहीं पर लोकमान्य तिलक से उनकी मुलाकात हुई। वर्ष 1921 में चंद्रभानु गुप्ता ने इंटर की पढ़ाई करने के बाद वह असहयोग आंदोलन में कूद गए। वर्ष 1925 में एमए, एलएलबी के बाद चंद्रभानु गुप्त ने वकालत शुरू कर दी। काकोरी कांड के क्रांतिकारियों के वह अधिवक्ता बने। नमक सत्याग्रह में बंदी बनाए गए। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। वर्ष 1937 के आम चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में लखनऊ नगर से विजयी हुए। 1940 में व्यक्तिगत सत्याग्रह और 1942 में करो या मरो के दौरान भी जेल गए। 1946 में लखनऊ नगर से विधान सभा सदस्य निर्वाचित हुए। पंत मंत्रिमंडल में सभासचिव नियुक्त किया गया। 1947 में रसद और पूर्ति मंत्री बने। 1952 के विधान सभा चुनाव में लखनऊ नगर के पूर्व क्षेत्र से विजयी हुए। पंत मंत्रिमंडल में पुन: मंत्री बने। एक दिसंबर 1960 को चंद्रभानु गुप्त निर्विरोध मुख्यमंत्री बनें। 1962 के आम चुनाव में रानीखेत क्षेत्र से निर्वाचित हुए और फिर मुख्यमंत्री बने।
राम मंदिर आंदोलन के अगुआ थे कल्याण सिंह
अलीगढ़। पूर्व राज्यपाल और मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को राम मंदिर आंदोलन का अगुआ कहा जाता है। वह दो बार प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। 5 जनवरी 1932 को अतरौली तहसील के मढ़ौली गांव में एक साधारण किसान परिवार में जन्मे कल्याण सिंह ने उच्च शिक्षा हासिल करकेअतरौली के एक इंटर कॉलेज में अध्यापक बन गए। 1967 में पहली बार अतरौली से विधायक बने और 1980 तक लगातार विधान सभा सदस्य रहे। आपातकाल के दौरान 21 महीने तक अलीगढ़ और बनारस के जेल में रहे। रामंदिर आंदोलन में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। वर्ष 1991 में भाजपा की सरकार बनी और कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने। बाबरी विध्वंस की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए 9 दिसंबर 1992 को मुख्यमंत्री पद छोड़ दिया। वह देश में हिंदुत्ववादी चेहरा के रूप में उभरे। 1997 से 1999 तक दूसरी बार मुख्यमंत्री रहे। 1999 में मतभेद होने पर भाजपा को छोड़कर राष्टीय क्रांति पार्टी का गठन किया। 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी के कहने पर भाजपा में पुन: वापसी हुई। वर्ष 2004 में बुलंदशहर लोकसभा चुनाव से जीतकर पहली बार संसद में पहुंचे। यथोचित सम्मान नहीं मिलने से आहत कल्याण सिंह ने 2009 में दूसरी बार भाजपा को छोड़कर सपा के मुलायम सिंह यादव के करीब पहुंचे। उसी वर्ष एटा से निर्दलीय निर्वाचित होकर दूसरी बार सांसद बने। 2013 में कल्याण सिंह पुन: भाजपा में वापसी हुई। नरेंद्र मोदी के कहने पर 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान उत्तर प्रदेश में भाजपा का चुनाव प्रचार किया। वह राजस्थान के राज्यपाल भी बनाए गए। 21 अगस्त 2021 को स्वर्ण सिधार गए।
अलीगढ़ के होकर रह गए काजी अब्दुल सत्तार
उर्दू साहित्य में प्रो. काजी अब्दुल सत्तार का एक ऊंचा मुकाम रहा। 8 फरवरी 1933 को सीतापुर के गांव मछरेटा के जमींदार परिवार में जन्मे काजी अब्दुुल सत्तार जब अलीगढ़ आए तो इसी शहर के होकर रह गए। लखनऊ से एमए करने के बाद शोध करने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय आए। वर्ष 1957 में विश्वविद्यालय से उर्दू शायरी में कुनूतियत विषय पर शोध पूर्ण किया। वह 1967 में प्रवक्ता और 1981 में प्रोफेसर बन गए। 13 वर्ष की आयु में अब्दुल सत्तार ने पहली कहानी अंधाश् लिखी, जो 1946 में लखनऊ के जवाब में प्रकाशित हुई। उनका पहला उपन्यास शिकस्त की आवाज है। इसके अलावा पीतल का घंटा, शब गंजीदा, मज्जू भैया, सलाहउद्दीन अयूबी, बादल, दारा शिकोह, गालिब, हजरत जान, खालिद बिन वलीद, ताजम सुल्तान, आखिरी कहानी आदि कहानी व उपन्यास लिखे। उनकी रचनाएं और उपन्यास पाकिस्तान सहित दूसरे देशों में भी बेहद लोकप्रिय हुई। 41 वर्ष की उम्र में पद्मश्री हासिल करने वाले वह उर्दू के पहले साहित्यकार थे। उनका 19 अक्तूबर 2018 को इंतकाल हो गया।
शायरी के शहजादे शहरयार
अलीगढ़। शहरयार अपने नाम के मुताबिक यारों के यार थे। वह शायरी के शहजादे थे। 16 जून 1936 को बरेली में जन्मे अखलाक मोहम्मद खान ने वर्ष 1948 में अपने भाई के साथ अलीगढ़ आ गए थे। अखलाक मोहम्मद का विश्वविद्यालय के सिटी स्कूल में दाखिला कराया गया। इसके बाद उन्होंने स्नातक और परास्नातक के बाद विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में शिक्षक हो गए। वह शायरी भी करने लगे। उन्होंने अपना तखल्लुस शहरयार रखा। उनकी शायरी और गीत आज भी लोगों की जुबान पर है। दिल चीज क्या है। आप मेरी जान लीजिए, सीने में जलन आंखों में तूफान सा क्यों है और इन आंखों की मस्ती के मस्ताने हजारों हैं, को आज भी लोग सुनते हैं। उन्होंने गमन और आहिस्ता-आहिस्ता आदि कुछ फिल्मों में गीत लिखे, लेकिन लोकप्रियता 1981 में बनी फिल्म उमराव जान से मिली। फिल्मी दुनिया उन्हें रास नहीं आई। इसलिए वह नहीं गए। उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार भी सम्मानित किया गया। 13 फरवरी 2012 को शहरयार दुनिया को अलविदा कह गए।
राम मंदिर आंदोलन के अगुआ थे कल्याण सिंह
अलीगढ़। पूर्व राज्यपाल और मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को राम मंदिर आंदोलन का अगुआ कहा जाता है। वह दो बार प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। 5 जनवरी 1932 को अतरौली तहसील के मढ़ौली गांव में एक साधारण किसान परिवार में जन्मे कल्याण सिंह ने उच्च शिक्षा हासिल करकेअतरौली के एक इंटर कॉलेज में अध्यापक बन गए। 1967 में पहली बार अतरौली से विधायक बने और 1980 तक लगातार विधान सभा सदस्य रहे। आपातकाल के दौरान 21 महीने तक अलीगढ़ और बनारस के जेल में रहे। रामंदिर आंदोलन में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। वर्ष 1991 में भाजपा की सरकार बनी और कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने। बाबरी विध्वंस की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए 9 दिसंबर 1992 को मुख्यमंत्री पद छोड़ दिया। वह देश में हिंदुत्ववादी चेहरा के रूप में उभरे। 1997 से 1999 तक दूसरी बार मुख्यमंत्री रहे। 1999 में मतभेद होने पर भाजपा को छोड़कर राष्टीय क्रांति पार्टी का गठन किया। 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी के कहने पर भाजपा में पुन: वापसी हुई। वर्ष 2004 में बुलंदशहर लोकसभा चुनाव से जीतकर पहली बार संसद में पहुंचे। यथोचित सम्मान नहीं मिलने से आहत कल्याण सिंह ने 2009 में दूसरी बार भाजपा को छोड़कर सपा के मुलायम सिंह यादव के करीब पहुंचे। उसी वर्ष एटा से निर्दलीय निर्वाचित होकर दूसरी बार सांसद बने। 2013 में कल्याण सिंह पुन: भाजपा में वापसी हुई। नरेंद्र मोदी के कहने पर 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान उत्तर प्रदेश में भाजपा का चुनाव प्रचार किया। वह राजस्थान के राज्यपाल भी बनाए गए। 21 अगस्त 2021 को स्वर्ण सिधार गए।
अलीगढ़ के होकर रह गए काजी अब्दुल सत्तार
उर्दू साहित्य में प्रो. काजी अब्दुल सत्तार का एक ऊंचा मुकाम रहा। 8 फरवरी 1933 को सीतापुर के गांव मछरेटा के जमींदार परिवार में जन्मे काजी अब्दुुल सत्तार जब अलीगढ़ आए तो इसी शहर के होकर रह गए। लखनऊ से एमए करने के बाद शोध करने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय आए। वर्ष 1957 में विश्वविद्यालय से उर्दू शायरी में कुनूतियत विषय पर शोध पूर्ण किया। वह 1967 में प्रवक्ता और 1981 में प्रोफेसर बन गए। 13 वर्ष की आयु में अब्दुल सत्तार ने पहली कहानी अंधाश् लिखी, जो 1946 में लखनऊ के जवाब में प्रकाशित हुई। उनका पहला उपन्यास शिकस्त की आवाज है। इसके अलावा पीतल का घंटा, शब गंजीदा, मज्जू भैया, सलाहउद्दीन अयूबी, बादल, दारा शिकोह, गालिब, हजरत जान, खालिद बिन वलीद, ताजम सुल्तान, आखिरी कहानी आदि कहानी व उपन्यास लिखे। उनकी रचनाएं और उपन्यास पाकिस्तान सहित दूसरे देशों में भी बेहद लोकप्रिय हुई। 41 वर्ष की उम्र में पद्मश्री हासिल करने वाले वह उर्दू के पहले साहित्यकार थे। उनका 19 अक्तूबर 2018 को इंतकाल हो गया।
शायरी के शहजादे शहरयार
अलीगढ़। शहरयार अपने नाम के मुताबिक यारों के यार थे। वह शायरी के शहजादे थे। 16 जून 1936 को बरेली में जन्मे अखलाक मोहम्मद खान ने वर्ष 1948 में अपने भाई के साथ अलीगढ़ आ गए थे। अखलाक मोहम्मद का विश्वविद्यालय के सिटी स्कूल में दाखिला कराया गया। इसके बाद उन्होंने स्नातक और परास्नातक के बाद विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में शिक्षक हो गए। वह शायरी भी करने लगे। उन्होंने अपना तखल्लुस शहरयार रखा। उनकी शायरी और गीत आज भी लोगों की जुबान पर है। दिल चीज क्या है। आप मेरी जान लीजिए, सीने में जलन आंखों में तूफान सा क्यों है और इन आंखों की मस्ती के मस्ताने हजारों हैं, को आज भी लोग सुनते हैं। उन्होंने गमन और आहिस्ता-आहिस्ता आदि कुछ फिल्मों में गीत लिखे, लेकिन लोकप्रियता 1981 में बनी फिल्म उमराव जान से मिली। फिल्मी दुनिया उन्हें रास नहीं आई। इसलिए वह नहीं गए। उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार भी सम्मानित किया गया। 13 फरवरी 2012 को शहरयार दुनिया को अलविदा कह गए।