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ऐसा है सिर्फ एक खेरेश्वर धाम, जहां भगवान श्रीकृष्ण ने किया है विश्राम
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ब्रज की देहरी पर स्थित अलीगढ़ पौराणिक कथा और कहानियों से भी जुड़ा हुआ है। साक्षात भगवान श्री कृष्ण के चरण अलीगढ़ की धरती पर पड़ चुके हैं। लोधा क्षेत्र में स्थित सिद्धपीठ खेरेश्वर धाम में भगवान श्री कृष्ण अपने बड़े भाई बलराम के साथ आए हुए थे। साथ ही पांडव के साथ उन्होंने खेरेश्वर धाम स्थित शिव मंदिर पर हवन भी किया था। इसलिए पश्चिमी यूपी में खेरेश्वर धाम की मान्यता है और यहां कई प्रांतों के श्रद्धालु भगवान भोलेनाथ और श्री बांके बिहारी जी के स्वरूप का दर्शन करने के लिए आते हैं। स्वामी हरिदास जी की कर्म स्थली के रूप में भी खेरेश्वर धाम जाना जाता है।
अलीगढ़-पलवल मार्ग पर लोधा क्षेत्र में खेरेश्वर धाम मंदिर स्थित है। रेलवे स्टेशन और गांधीपार्क बस स्टैंड से खेरेश्वर धाम की दूरी करीब 13 किलोमीटर है। यहां भगवान शिव शिवलिंग के रूप में विराजमान हैं। ऐसा बताया जाता है कि द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण अपने बड़े भाई बलराम जी के साथ गंगा स्नान करने जा रहे थे। रास्ते में खेरेश्वरधाम उस समय एक टीले के रूप में था। यहां पर दोनों भाईयों ने कुछ देर विश्राम किया फिर भगवान भोलेनाथ के शिवलिंग की उपासना करने लगे। तभी गांव वालों ने बताया की यहां उलसूर नामक राक्षस का बहुत बड़ा आतंक है। उसे कोलासुर नाम से जाना जाता था। इस पर बलरामजी ने कोलासूर राक्षस को ललकारा। दोनों में भयंकर युद्ध हुआ। अंत में बलरामजी ने अपने हल से कोल्हापुर राक्षस का वध कर दिया। उस हल को आगे लेकर बढ़े तो हरदुआगंज में एक तालाब में उस हल को धोया। इससे हरदुआगंज का नाम हलदुआ पड़ गया। यहां हल धुलने के बाद फिर दोनों भाइयों ने गंगा में जाकर स्नान किया। भगवान श्री कृष्ण खेरेश्वर धाम में रुके थे, इसलिए धीरे धीरे खेरेश्वर धाम की पौराणिक मान्यता होने पर वहां भक्तों का आना शुरू हो गया। ऐसा भी बताया जाता है कि भगवान श्री कृष्ण ने पांडवों के साथ आकर उन्होंने शिवलिंग की पूजा की थी और हवन किया था। इसीलिए यह मंदिर सिद्धपीठ के रूप में प्रसिद्ध हो गया। आज अलीगढ़ जिले के साथ ही दिल्ली, गाजियाबाद, नोएडा समेत दूसरे राज्यों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु भगवान भोलेनाथ के दर्शन करने के लिए यहां आते हैं। सावन मास में प्रत्येक सोमवार को मंदिर में विशाल मेला भी लगता है।
स्वामी हरिदास से भी है जुड़ाव
प्रसिद्ध संगीतकार स्वामी हरिदास से खेरेश्वर धाम का जुड़ाव रहा है। खेरेश्वर धाम के एकदम निकट हरिदासपुर गांव है। ऐसा बताया जाता है कि खेरेश्वर धाम मे कुछ वक्त स्वामी हरिदास जी ने व्यतीत किया था। इसलिए यहां पर श्री बांके बिहारी जी की छवि की तरह स्वरूप भी स्थापित हैं। स्वामी हरिदास जी की पत्नी का समाधि स्थल यहां बना हुआ है।
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आस्था का उमड़ता है सैलाब
सावन की शुरुआत होते ही खेरेश्वर धाम मंदिर में आस्था का सैलाब उमड़ पड़ता है, क्योंकि भगवान भोलेनाथ यहां शिवलिंग के रूप में विराजमान हैं। सिद्धपीठ के रूप में भी यह स्थान प्रसिद्ध हैं। इसलिए हजारों की संख्या में श्रद्धालु शिवलिंग पर जल अर्पित करने के लिए आते हैं। वैसे तो सावन के सोमवार को अधिकांश शिव मंदिरों में भक्तों का सैलाब उमड़ता है, मगर खेरेश्वर धाम में पूरे सावन भर आस्था उमड़ती हुई दिखाई देती है। हर-हर बम-बम के जयकारों से पूरा मंदिर गूंजता रहता है।
दाऊ मेला में दिखती है ब्रज की संस्कृति
खेरेश्वर धाम मंदिर में प्रत्येक वर्ष दाऊ मेले का भी आयोजन होता है। सावन के बाद मेले की शुरुआत हो जाती है। इस मेले में ब्रज की संस्कृति की झलक देखने को मिलती है। करीब एक महीने यह मेला लगता है। इसमें कुश्ती, कबड्डी आदि खेल प्रतियोगिताओं के साथ ही श्रीकृष्ण लीला समेत कई धार्मिक आयोजन होते हैं। ग्रामीण अंचल के लोग बड़ी संख्या में इस मेले का आनंद उठाते हैं।
इनका कहना है ....
खेरेश्वरधाम मंदिर में पिछले 30 वर्षों से पूजा-अर्चना करने आ रहे हैं। बाबा ने कभी भी निराश नहीं किया है, जो मांगा उससे कहीं अधिक बढ़कर मिला है। - उमेश पाठक, भक्त
आज भी वृंदावन से गोसाईं परिवार स्वामी हरिदास जी की धर्मपत्नी की समाधि स्थल पर आता है और वहां पर उन्हें पुष्प अर्पित करता है। स्वामी हरिदास जी महान संगीतकार थे और उनके शिष्य तानसेन अकबर के दरबार में नवरत्नों में से एक थे। सावन को देखते हुए इस बार भी भक्तों के लिए मंदिर पर खास व्यवस्था की गई है। सेवादार भक्तों की सेवा के लिए उपलब्ध रहेंगे। - ठा. सत्यपाल सिंह, अध्यक्ष, खेरेश्वर धाम मंदिर समिति।
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अलीगढ़-पलवल मार्ग पर लोधा क्षेत्र में खेरेश्वर धाम मंदिर स्थित है। रेलवे स्टेशन और गांधीपार्क बस स्टैंड से खेरेश्वर धाम की दूरी करीब 13 किलोमीटर है। यहां भगवान शिव शिवलिंग के रूप में विराजमान हैं। ऐसा बताया जाता है कि द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण अपने बड़े भाई बलराम जी के साथ गंगा स्नान करने जा रहे थे। रास्ते में खेरेश्वरधाम उस समय एक टीले के रूप में था। यहां पर दोनों भाईयों ने कुछ देर विश्राम किया फिर भगवान भोलेनाथ के शिवलिंग की उपासना करने लगे। तभी गांव वालों ने बताया की यहां उलसूर नामक राक्षस का बहुत बड़ा आतंक है। उसे कोलासुर नाम से जाना जाता था। इस पर बलरामजी ने कोलासूर राक्षस को ललकारा। दोनों में भयंकर युद्ध हुआ। अंत में बलरामजी ने अपने हल से कोल्हापुर राक्षस का वध कर दिया। उस हल को आगे लेकर बढ़े तो हरदुआगंज में एक तालाब में उस हल को धोया। इससे हरदुआगंज का नाम हलदुआ पड़ गया। यहां हल धुलने के बाद फिर दोनों भाइयों ने गंगा में जाकर स्नान किया। भगवान श्री कृष्ण खेरेश्वर धाम में रुके थे, इसलिए धीरे धीरे खेरेश्वर धाम की पौराणिक मान्यता होने पर वहां भक्तों का आना शुरू हो गया। ऐसा भी बताया जाता है कि भगवान श्री कृष्ण ने पांडवों के साथ आकर उन्होंने शिवलिंग की पूजा की थी और हवन किया था। इसीलिए यह मंदिर सिद्धपीठ के रूप में प्रसिद्ध हो गया। आज अलीगढ़ जिले के साथ ही दिल्ली, गाजियाबाद, नोएडा समेत दूसरे राज्यों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु भगवान भोलेनाथ के दर्शन करने के लिए यहां आते हैं। सावन मास में प्रत्येक सोमवार को मंदिर में विशाल मेला भी लगता है।
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स्वामी हरिदास से भी है जुड़ाव
प्रसिद्ध संगीतकार स्वामी हरिदास से खेरेश्वर धाम का जुड़ाव रहा है। खेरेश्वर धाम के एकदम निकट हरिदासपुर गांव है। ऐसा बताया जाता है कि खेरेश्वर धाम मे कुछ वक्त स्वामी हरिदास जी ने व्यतीत किया था। इसलिए यहां पर श्री बांके बिहारी जी की छवि की तरह स्वरूप भी स्थापित हैं। स्वामी हरिदास जी की पत्नी का समाधि स्थल यहां बना हुआ है।
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आस्था का उमड़ता है सैलाब
सावन की शुरुआत होते ही खेरेश्वर धाम मंदिर में आस्था का सैलाब उमड़ पड़ता है, क्योंकि भगवान भोलेनाथ यहां शिवलिंग के रूप में विराजमान हैं। सिद्धपीठ के रूप में भी यह स्थान प्रसिद्ध हैं। इसलिए हजारों की संख्या में श्रद्धालु शिवलिंग पर जल अर्पित करने के लिए आते हैं। वैसे तो सावन के सोमवार को अधिकांश शिव मंदिरों में भक्तों का सैलाब उमड़ता है, मगर खेरेश्वर धाम में पूरे सावन भर आस्था उमड़ती हुई दिखाई देती है। हर-हर बम-बम के जयकारों से पूरा मंदिर गूंजता रहता है।
दाऊ मेला में दिखती है ब्रज की संस्कृति
खेरेश्वर धाम मंदिर में प्रत्येक वर्ष दाऊ मेले का भी आयोजन होता है। सावन के बाद मेले की शुरुआत हो जाती है। इस मेले में ब्रज की संस्कृति की झलक देखने को मिलती है। करीब एक महीने यह मेला लगता है। इसमें कुश्ती, कबड्डी आदि खेल प्रतियोगिताओं के साथ ही श्रीकृष्ण लीला समेत कई धार्मिक आयोजन होते हैं। ग्रामीण अंचल के लोग बड़ी संख्या में इस मेले का आनंद उठाते हैं।
इनका कहना है ....
खेरेश्वरधाम मंदिर में पिछले 30 वर्षों से पूजा-अर्चना करने आ रहे हैं। बाबा ने कभी भी निराश नहीं किया है, जो मांगा उससे कहीं अधिक बढ़कर मिला है। - उमेश पाठक, भक्त
आज भी वृंदावन से गोसाईं परिवार स्वामी हरिदास जी की धर्मपत्नी की समाधि स्थल पर आता है और वहां पर उन्हें पुष्प अर्पित करता है। स्वामी हरिदास जी महान संगीतकार थे और उनके शिष्य तानसेन अकबर के दरबार में नवरत्नों में से एक थे। सावन को देखते हुए इस बार भी भक्तों के लिए मंदिर पर खास व्यवस्था की गई है। सेवादार भक्तों की सेवा के लिए उपलब्ध रहेंगे। - ठा. सत्यपाल सिंह, अध्यक्ष, खेरेश्वर धाम मंदिर समिति।