{"_id":"6a5945329ea99fd840044acb","slug":"the-wait-for-justice-drags-on-with-date-after-date-being-postponed-aligarh-news-c-2-gur1004-1021723-2026-07-17","type":"story","status":"publish","title_hn":"Aligarh News: तारीख पर तारीख बढ़ा रही न्याय का इंतजार","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Aligarh News: तारीख पर तारीख बढ़ा रही न्याय का इंतजार
विज्ञापन
प्रतीकात्मक फोटो
- फोटो : Archive
न्याय में देरी न्याय से वंचित होने के समान है... न्याय व्यवस्था का यह सिद्धांत आज भी पूरी तरह प्रासंगिक है। इसके बावजूद अदालतों में मुकदमों के निस्तारण में होने वाली देरी से न्याय का इंतजार लगातार बढ़ रहा है। अलीगढ़ जिला न्यायालय में वर्तमान में विभिन्न श्रेणियों के करीब 1.80 लाख आपराधिक मामले लंबित हैं। इनमें लगभग 80 प्रतिशत मामले एक वर्ष से अधिक पुराने हैं।
यह न केवल न्याय व्यवस्था के सामने गंभीर चुनौती है, बल्कि वादकारियों के लिए भी चिंता का विषय बना हुआ है। विश्व आपराधिक न्याय दिवस (17 जुलाई) पर अमर उजाला ने इस मुद्दे पर विधि विशेषज्ञों से बातचीत की। विधि विशेषज्ञों का कहना है कि लंबित मामलों की बढ़ती संख्या के पीछे कई कारण हैं। इनमें समय पर साक्ष्य उपलब्ध न होना या उन्हें अदालत में प्रस्तुत करने में देरी, गवाहों का सुनवाई के दौरान अनुपस्थित रहना, बार-बार स्थगन (तारीख) मिलना और न्यायालयों पर बढ़ता कार्यभार प्रमुख हैं।
उनका मानना है कि बार और बेंच के बेहतर समन्वय, आधुनिक तकनीक के प्रभावी उपयोग तथा सभी पक्षों की सामाजिक जिम्मेदारी से मामलों के शीघ्र निस्तारण का रास्ता आसान हो सकता है। उनका कहना है कि त्वरित और सुलभ न्याय ही न्यायपालिका में आमजन के विश्वास को और मजबूत करेगा।
विज्ञापन
-समय के साथ न्याय व्यवस्था के आयाम बदल रहे हैं। अब न्यायिक कार्यवाही पुलिस पर आश्रित अधिक हो गई है। आईपीसी-सीआरपीसी बदलने के नाम पर कुछ बदला नहीं गया। इस बदलाव से गफलत बढ़ गई है। हमने जो कानून सीखा था, वह बेकार हो गया। इसमें सरकार की मंशा भी न्याय के प्रति कटिबद्ध नजर नहीं आती। - चंद्रशेखर दीक्षित, वरिष्ठ अधिवक्ता
- न्याय में देरी के कई कारण हैं, सबसे बड़ा कारण अभियुक्तों का अपने प्रयासों से आरोप पत्र दाखिल न होने देना व पत्रावली कमिट न होने देना है। इस दौरान प्रयास होते हैं कि गवाह पक्षद्रोही हो जाएं। फिर गवाही रोकने व ट्रायल में देरी के प्रयास होते हैं। ऐसा जिले के चर्चित शराब कांड में हो रहा है। कमजोर पुलिस पैरोकारी व तामीला भी बड़ा कारण है। - चौधरी जितेंद्र सिंह, पूर्व डीजीसी अपराध
- बार व बेंच दोनों को प्रयास करना होगा, तभी न्याय जल्द सुलभ होगा। सामाजिक न्याय के लिए हम लोग हैं। हमारा यह पक्ष खराब होता है तो बात गलत है। बार व बेंच में मासिक बातचीत का समन्वय बने। बैठकर चर्चा करें, सोचें कि क्या सही होगा। सिर्फ धंधा पानी वकालत का पेशा नहीं। दृष्टिकोण यह भी हो कि हम दे क्या रहे हैं। - रामबाबू शर्मा, वरिष्ठ अधिवक्ता
- अलीगढ़ में 1.80 लाख आपराधिक मामले लंबित हैं। ये केवल संख्या नहीं हैं, बल्कि नागरिकों की न्याय पाने की प्रतीक्षा, आर्थिक, सामाजिक और मानसिक पीड़ा का भी प्रतिबिंब हैं। पक्षकारों का समय, धन और ऊर्जा नष्ट होती है। गवाहों की स्मृति कमजोर पड़ती है, साक्ष्य प्रभावित होते हैं। न्यायिक प्रक्रिया की प्रभावशीलता पर भी प्रश्नचिह्न लगते हैं। - प्रताप सिंह राघव, वरिष्ठ अधिवक्ता
विज्ञापन
यह न केवल न्याय व्यवस्था के सामने गंभीर चुनौती है, बल्कि वादकारियों के लिए भी चिंता का विषय बना हुआ है। विश्व आपराधिक न्याय दिवस (17 जुलाई) पर अमर उजाला ने इस मुद्दे पर विधि विशेषज्ञों से बातचीत की। विधि विशेषज्ञों का कहना है कि लंबित मामलों की बढ़ती संख्या के पीछे कई कारण हैं। इनमें समय पर साक्ष्य उपलब्ध न होना या उन्हें अदालत में प्रस्तुत करने में देरी, गवाहों का सुनवाई के दौरान अनुपस्थित रहना, बार-बार स्थगन (तारीख) मिलना और न्यायालयों पर बढ़ता कार्यभार प्रमुख हैं।
विज्ञापन
उनका मानना है कि बार और बेंच के बेहतर समन्वय, आधुनिक तकनीक के प्रभावी उपयोग तथा सभी पक्षों की सामाजिक जिम्मेदारी से मामलों के शीघ्र निस्तारण का रास्ता आसान हो सकता है। उनका कहना है कि त्वरित और सुलभ न्याय ही न्यायपालिका में आमजन के विश्वास को और मजबूत करेगा।
विज्ञापन
-समय के साथ न्याय व्यवस्था के आयाम बदल रहे हैं। अब न्यायिक कार्यवाही पुलिस पर आश्रित अधिक हो गई है। आईपीसी-सीआरपीसी बदलने के नाम पर कुछ बदला नहीं गया। इस बदलाव से गफलत बढ़ गई है। हमने जो कानून सीखा था, वह बेकार हो गया। इसमें सरकार की मंशा भी न्याय के प्रति कटिबद्ध नजर नहीं आती। - चंद्रशेखर दीक्षित, वरिष्ठ अधिवक्ता
- न्याय में देरी के कई कारण हैं, सबसे बड़ा कारण अभियुक्तों का अपने प्रयासों से आरोप पत्र दाखिल न होने देना व पत्रावली कमिट न होने देना है। इस दौरान प्रयास होते हैं कि गवाह पक्षद्रोही हो जाएं। फिर गवाही रोकने व ट्रायल में देरी के प्रयास होते हैं। ऐसा जिले के चर्चित शराब कांड में हो रहा है। कमजोर पुलिस पैरोकारी व तामीला भी बड़ा कारण है। - चौधरी जितेंद्र सिंह, पूर्व डीजीसी अपराध
- बार व बेंच दोनों को प्रयास करना होगा, तभी न्याय जल्द सुलभ होगा। सामाजिक न्याय के लिए हम लोग हैं। हमारा यह पक्ष खराब होता है तो बात गलत है। बार व बेंच में मासिक बातचीत का समन्वय बने। बैठकर चर्चा करें, सोचें कि क्या सही होगा। सिर्फ धंधा पानी वकालत का पेशा नहीं। दृष्टिकोण यह भी हो कि हम दे क्या रहे हैं। - रामबाबू शर्मा, वरिष्ठ अधिवक्ता
- अलीगढ़ में 1.80 लाख आपराधिक मामले लंबित हैं। ये केवल संख्या नहीं हैं, बल्कि नागरिकों की न्याय पाने की प्रतीक्षा, आर्थिक, सामाजिक और मानसिक पीड़ा का भी प्रतिबिंब हैं। पक्षकारों का समय, धन और ऊर्जा नष्ट होती है। गवाहों की स्मृति कमजोर पड़ती है, साक्ष्य प्रभावित होते हैं। न्यायिक प्रक्रिया की प्रभावशीलता पर भी प्रश्नचिह्न लगते हैं। - प्रताप सिंह राघव, वरिष्ठ अधिवक्ता