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आजादी के उल्लास के साथ ही उभर आता है देश के विभाजन का दर्दः जोगिंदर कौर
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जोगिंदर कौर।
- फोटो : CITY OFFICE
स्वतंत्रता दिवस के उल्लास के साथ ही पंजाबी क्वार्टर नई बस्ती में रहने वाले कुछ परिवारों के लिए यह अवसर हल्की सी खलिश भी दिल में लेकर आता है। यह वह परिवार हैं जिन्होंने विभाजन की विभीषिका को झेला है। 1947 में भारत और पाकिस्तान के विभाजन के बाद यहां पर शरणार्थी बनकर आए थे। कुछ परिवार के लोगों का कहना है कि उनके पूर्वज पाकिस्तान में जमींदार थे। लेकिन यहां पर आकर पूरा कुनबा दो कमरों में ही सिमट गया।
पंजाबी कॉलोनी में रहने वाली 95 वर्षीय जोगिंदर कौर शहर में एकमात्र जीवित महिला हैं, जिन्होंने भारत और पाकिस्तान का विभाजन अपनी आंखों से देखा है। वह कहती हैं कि उन्हें आज भी सब कुछ बहुत अच्छी तरह याद है। स्कूल के बाद उनकी कॉलेज की पढ़ाई शुरू होने वाली थी। उनके पिता का करांची में कपास का बहुत बड़ा व्यापार था।
इलाके की नामचीन हवेली में उनका परिवार रहता था। फिर अचानक हालात खराब होने शुरू हो गए। बात यहां तक बिगड़ गई कि एक दूसरे के समुदाय की महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार होने लगा। उनके मामा फ़ौज में थे। फौज के ट्रक में वह उनको बचा कर किसी तरीके से अमृतसर तक लेकर आए। परिवार का सारा रुपया, पैसा, सोना, चांदी सब छूट गया। रब की मेहर रही कि बस सही सलामत परिवार यहां पर आ गया। आज सुकून इस बात का है कि दो पीढ़ियों ने बहुत कुछ संभाल लिया है। लेकिन एक अफसोस भी दिल में रह जाता है कि अगर वही दिन रहे होते तो आज अलग मुकाम होता। जब जब आजादी के दिन लोग जश्न मना रहे होते हैं, तब तब उन्हें अपने परिवार का बिखरना याद आ जाता है।
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पंजाबी कॉलोनी में रहने वाली 95 वर्षीय जोगिंदर कौर शहर में एकमात्र जीवित महिला हैं, जिन्होंने भारत और पाकिस्तान का विभाजन अपनी आंखों से देखा है। वह कहती हैं कि उन्हें आज भी सब कुछ बहुत अच्छी तरह याद है। स्कूल के बाद उनकी कॉलेज की पढ़ाई शुरू होने वाली थी। उनके पिता का करांची में कपास का बहुत बड़ा व्यापार था।
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इलाके की नामचीन हवेली में उनका परिवार रहता था। फिर अचानक हालात खराब होने शुरू हो गए। बात यहां तक बिगड़ गई कि एक दूसरे के समुदाय की महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार होने लगा। उनके मामा फ़ौज में थे। फौज के ट्रक में वह उनको बचा कर किसी तरीके से अमृतसर तक लेकर आए। परिवार का सारा रुपया, पैसा, सोना, चांदी सब छूट गया। रब की मेहर रही कि बस सही सलामत परिवार यहां पर आ गया। आज सुकून इस बात का है कि दो पीढ़ियों ने बहुत कुछ संभाल लिया है। लेकिन एक अफसोस भी दिल में रह जाता है कि अगर वही दिन रहे होते तो आज अलग मुकाम होता। जब जब आजादी के दिन लोग जश्न मना रहे होते हैं, तब तब उन्हें अपने परिवार का बिखरना याद आ जाता है।
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