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हिंदी हैं हमः अपनों को रखना है करीब तो सात संदर पार भी हिंदी जरूरीः सुरभि
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सुरभि अपने पति विवेक व बेटे सार्थक के साथ
- फोटो : KHAR
पंकज रावत
खैर। हिंदी पर जितना नाज हम सभी देशवासियों को है, उतना ही सात समंदर पार बसे भारतीयों को भी है। उनकी रगों में हिंदी बसी है। अमेरिका में धर्म शाखाओं में हिंदी भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी पहचान बनती जा रही है। वहां पर भी धार्मिक आयोजनों पर नमस्ते और जय राम बोलते हैं। इस हकीकत से रूबरू कराया खैर के गांव जरारा की सुरभि शर्मा ने।
अमेरिका में रह रहीं सुरभि शर्मा ने अमर उजाला के हिंदी हैं हम अभियान के बारे में इंटरनेट पढ़ा। उन्होंने अभियान की खूब प्रशंसा की। अपनी निजी जिंदगी में हिंदी की अहमियत पर बेटे सार्थक का किस्सा साझा किया। उन्होंने बताया कि उनके पिता शिवनंदन शर्मा दिल्ली में एमटीएनएल में डीजीएम पद से सेवानिवृत्त हुए तब वह छह माह की थीं। तभी पापा गांव से दिल्ली ले गए थे। प्रारंभिक पढ़ाई के बाद जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय से बी फार्मा के बाद एमबीए किया। वर्ष 2007 में विवेक शर्मा निवासी वसुंधरा गाजियाबाद के साथ शादी हुई। जो अब अमेरिका के प्रांत कैलिफोर्निया की राजधानी सैक्रामेंटो में एक्सेंचर कंपनी में टीम लीडर हैं।
सुरभि वर्ष 2014 में अपने बेटे के साथ अमेरिका में बस गईं। उस वक्त बड़ा बेटा सार्थक पांच वर्ष का था। दिल्ली में उसका स्कूल शुरू नहीं हुआ था। घर में हिंदी का माहौल मिला, लेकिन अमेरिका पहुंचने के बाद स्कूल शुरू हुआ तो मातृभाषा उसकी जुबान से जुदा होने लगी। ये सिलसिला आगे बढ़ता उससे पहले ही उसको घर पर हिंदी पढ़ानी शुरू कर दी। सुरभि ने बताया कि वह रोजाना एक घंटा बेटे को हिंदी पढ़ाती हैं। हर सोमवार उनकी सोसाइटी में स्वयंसेवक सेवा के तहत धर्म शाखा होती है। जिसमें डेढ़ घंटे की कक्षा में हिंदी के अलावा भारतीय संस्कृति, महात्मा गांधी, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद सहित भारतीय महापुरुषों के बारे में बताया जाता है।
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सूर्य नमस्कार, 24 अवतारों की कथा, गीता, रामायण, महाभारत आदि धर्मशास्त्र से भी अवगत कराया जाता है। मंदिरों में रामलीला व सांस्कृतिक कार्यक्रम भी हिंदी में होते हैं। जो भी भारतीय अमेरिका में रह रहे हैं, सभी चाहते हैं कि उनका बच्चा हिंदी बोल सके ताकि वह अपनी मूल संस्कृति से जुड़ा रहे। हिंदी केवल भाषा ही नहीं बल्कि दादा दादी, नाना नानी, मामा मामी आदि परिवार वालों से संवाद का माध्यम भी है। हिंदी नहीं बोलने से अपनों से दूरियां बढ़ती हैं। अपनों को करीब रखना है तो हिंदी जरूरी है।
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खैर। हिंदी पर जितना नाज हम सभी देशवासियों को है, उतना ही सात समंदर पार बसे भारतीयों को भी है। उनकी रगों में हिंदी बसी है। अमेरिका में धर्म शाखाओं में हिंदी भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी पहचान बनती जा रही है। वहां पर भी धार्मिक आयोजनों पर नमस्ते और जय राम बोलते हैं। इस हकीकत से रूबरू कराया खैर के गांव जरारा की सुरभि शर्मा ने।
अमेरिका में रह रहीं सुरभि शर्मा ने अमर उजाला के हिंदी हैं हम अभियान के बारे में इंटरनेट पढ़ा। उन्होंने अभियान की खूब प्रशंसा की। अपनी निजी जिंदगी में हिंदी की अहमियत पर बेटे सार्थक का किस्सा साझा किया। उन्होंने बताया कि उनके पिता शिवनंदन शर्मा दिल्ली में एमटीएनएल में डीजीएम पद से सेवानिवृत्त हुए तब वह छह माह की थीं। तभी पापा गांव से दिल्ली ले गए थे। प्रारंभिक पढ़ाई के बाद जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय से बी फार्मा के बाद एमबीए किया। वर्ष 2007 में विवेक शर्मा निवासी वसुंधरा गाजियाबाद के साथ शादी हुई। जो अब अमेरिका के प्रांत कैलिफोर्निया की राजधानी सैक्रामेंटो में एक्सेंचर कंपनी में टीम लीडर हैं।
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सुरभि वर्ष 2014 में अपने बेटे के साथ अमेरिका में बस गईं। उस वक्त बड़ा बेटा सार्थक पांच वर्ष का था। दिल्ली में उसका स्कूल शुरू नहीं हुआ था। घर में हिंदी का माहौल मिला, लेकिन अमेरिका पहुंचने के बाद स्कूल शुरू हुआ तो मातृभाषा उसकी जुबान से जुदा होने लगी। ये सिलसिला आगे बढ़ता उससे पहले ही उसको घर पर हिंदी पढ़ानी शुरू कर दी। सुरभि ने बताया कि वह रोजाना एक घंटा बेटे को हिंदी पढ़ाती हैं। हर सोमवार उनकी सोसाइटी में स्वयंसेवक सेवा के तहत धर्म शाखा होती है। जिसमें डेढ़ घंटे की कक्षा में हिंदी के अलावा भारतीय संस्कृति, महात्मा गांधी, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद सहित भारतीय महापुरुषों के बारे में बताया जाता है।
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सूर्य नमस्कार, 24 अवतारों की कथा, गीता, रामायण, महाभारत आदि धर्मशास्त्र से भी अवगत कराया जाता है। मंदिरों में रामलीला व सांस्कृतिक कार्यक्रम भी हिंदी में होते हैं। जो भी भारतीय अमेरिका में रह रहे हैं, सभी चाहते हैं कि उनका बच्चा हिंदी बोल सके ताकि वह अपनी मूल संस्कृति से जुड़ा रहे। हिंदी केवल भाषा ही नहीं बल्कि दादा दादी, नाना नानी, मामा मामी आदि परिवार वालों से संवाद का माध्यम भी है। हिंदी नहीं बोलने से अपनों से दूरियां बढ़ती हैं। अपनों को करीब रखना है तो हिंदी जरूरी है।