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सपा का इतिहास : 24 साल में एक से चार पर पहुंची सपा...2017 में एक भी नहीं बचा

Sat, 04 Dec 2021 12:46 AM IST
Aligarh Bureau अलीगढ़ ब्यूरो
Updated Sat, 04 Dec 2021 12:46 AM IST
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SP reached from one to four in 24 years... not a single one left in 2017
अभिषेक शर्मा
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वैसे तो यूपी के क्षत्रप दलों में शुमार समाजवादी पार्टी का 24 साल का इतिहास है। मगर इसके नेता मुलायम सिंह यादव का राजनीतिक सफर काफी पुराना है। सपा की स्थापना के पहले से उनका अलीगढ़ की सियासत में स्थान था। वे इगलास से राजनीति करने वाले सूबे के दिग्गज जाट नेताओं में शामिल चौ. राजेंद्र सिंह के बेहद करीबियों में शामिल थे। उनके सहयोग से 1977 में मुलायम सिंह यादव को प्रदेश में यादव चेहरे के रूप में रामनेरश यादव के सामने खड़ा करने के लिए सहकारिता मंत्री बनाया गया और 1984 में एमएलसी बनाकर विधान परिषद में लोकदल का नेता बनाया।
इस बीच गंगीरी (अब छर्रा) सीट से सियासत करने वाले बाबू सिंह का मुलायम सिंह यादव से गहरा नाता हुआ और 92 में समाजवादी पार्टी की स्थापना के बाद 93 में हुए पहले चुनाव में बाबू सिंह के बेटे वीरेश यादव को टिकट दिया गया। इस चुनाव को जीतकर उन्होंने अलीगढ़ में सपा का खाता खोला। हालांकि, मुस्लिम पिछड़ा गठजोड़ से पार्टी ने शहर की सीट पर भी दो बार जीत दर्ज की। मगर 2012 का एक चुनाव ऐसा रहा, जिसमें यूपी में पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने वाली सपा को चार सीटों पर जीत मिली। इसके बाद 2017 में मोदी लहर के चुनाव में जिले में एक भी सीट पर पार्टी खुद को बचा नहीं सकी।
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गंगीरी के बाद अतरौली सीट पर भी सपा ने खाता खोला
गंगा खादर का यादव बहुल सांकरा इलाका पहले गंगीरी क्षेत्र में था। इसी सीट से चौ.राजेंद्र सिंह के साथ रहकर सियासत करने वाले यादव नेता बाबू सिंह चुनाव लड़ते थे। 1989 में चौ. राजेंद्र सिंह के हारने और सियासत से दूरी के बाद जब मुलायम सिंह मुख्यमंत्री बने तो बाबू सिंह उनके साथ हो गए। कुछ समय बाद बाबू सिंह का लखनऊ में बीमारी के चलते देहांत हो गया। जब मुलायम सिंह यादव यहां उनके घर संवेदना व्यक्त करने आए तो वीरेश यादव को उन्होंने तैयारी करने का इशारा किया। 1993 में वीरेश को सपा के बैनरतले चुनाव लड़ाया और वे जीते। इसके बाद 1996 का चुनाव हार गए। मगर 2002 का चुनाव वीरेश ने जीता। 2012 के चुनाव में जब नए परिसीमन से चुनाव हुआ और यादव बहुल इलाका अतरौली में शामिल हो गया तो वीरेश ने अपनी सीट गंगीरी छोड़कर अतरौली बनाई। यहां दिग्गज नेता कल्याण सिंह की पुत्रवधु प्रेमलता वर्मा को हराकर सपा का खाता खोला। इसी चुनाव में जिले की गंगीरी से छर्रा बनी सीट पर ठा. राकेश सिंह मुस्लिम-पिछड़ा व ठाकुर गठजोड़ से, कोल सीट से जमीर उल्लाह मुस्लिम-पिछड़ा गठजोड़ से और शहर से जफर आलम भी इसी गठजोड़ से चुनाव जीते थे।
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शहर और गंगीरी सीट पर रहता था फोकस
2012 के पहले तक खुद सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह का फोकस जिले की गंगीरी व शहर सीट पर रहता था। यही वजह थी कि वे गंगीरी के आलमपुर चौराहा और शहर सीट के लिए नुमाइश मैदान में चुनावी सभा करने अवश्य आया करते थे। इसी का परिणाम रहा कि 1996 के चुनाव में उन्हें शहर से पहली बार कट्टर छवि वाले अब्दुल खालिक के रूप में विधायक मिला। दूसरा विधायक फिर 2007 के चुनाव में कट्टर छवि से उभरे नेता जमीरउल्लाह के रूप में इसी सीट से मिला। बता दें कि 2006 के दंगे में जमीरउल्लाह सपा में सक्रिय हुए और उनकी छवि ऐसी बनती चली गई कि पार्टी ने उन्हें महानगर अध्यक्ष, फिर मेयर प्रत्याशी तक बनाया। मेयर का चुनाव हारने पर उन्हें विधायक का टिकट दिया।

कई बार कटी, तब मिली राकेश को टिकट
गंगीरी से छर्रा बनी सीट पर 2012 के चुनाव में दो प्रबल दावेदार थे। इनमें एक मुलायम सिंह यादव के करीबी मुस्लिम नेता ख्वाजा हलीम और दूसरे अखिलेश यादव की युवा टीम के सदस्य युवा ठाकुर नेता राकेश सिंह। मुलायम सिंह ख्वाजा हलीम को चुनाव लड़ाना चाहते थे और अखिलेश राकेश पर दांव खेलना चाहते थे। इस जद्दोजहद का परिणाम यह रहा कि सात दिन में कई बार कभी ख्वाजा हलीम का तो कभी राकेश सिंह का टिकट फाइनल हुआ। यह विवाद खबरों की सुर्खियों में रहा। बाद में राकेश को ही पार्टी ने टिकट दिया और वे विधायक बने।
1992 में स्थापना के बाद से सपा का रिपोर्ट कार्ड (2017 तक का)
- 1993 : गंगीरी से वीरेश यादव जीते, बाकी सीटें हारे।
- 1996 : शहर से अब्दुल खालिक जीते, बाकी सीटें हारे।
- 2002 : गंगीरी से वीरेश यादव जीते, बाकी सीटें हारे।
- 2007 : शहर से जमीरउल्लाह जीते, बाकी सीटें हारे।
- 2012 : छर्रा से राकेश सिंह, अतरौली से वीरेश यादव, शहर से जफर आलम, कोल से जमीर उल्लाह जीते, तीन सीटें हारे।
- 2017 : सभी सीटें हारे।
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