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जिंदा रहना है तो तरकीब बहुत सारी रखो
अलीगढ़।
Updated Fri, 19 Feb 2016 01:43 AM IST
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मुशायरे की शुरूआत नातिया कलाम के साथ हुई। मुशायरे में आए नामचीन शायरों में से एक राहत इंदौरी ने कहा कि ‘आंख में पानी रखो, होठों पे चिंगारी रखो, जिंदा रहना है तो तरकीब बहुत सारी रखो’। इसे सुनकर सुनने वालों ने जमकर दाद दी। अपने जाने पहचाने अंदाज में जब राहत ने पढ़ा कि ‘चरागों को उछाला जा रहा है, हवा पर रौब डाला जा रहा है’ तो सुनने वालों तक उनकी बात पहुंची। इसे श्रोताओं ने तालियों के साथ जाहिर भी किया। राहत ने एक के बाद एक शानदार शेर पढ़कर मुशायरा लूट लिया।
अंजुम रहबर ने पढ़ा कि ‘मेरा हर शेर तेरे जजबात से अच्छा होगा, मेरा हर दिन तेरी मुस्कुराहट से अच्छा होगा, अपने जीते जी जी लेना ऐ जालिम, मेरा निकला जनाजा भी तेरी बारात से अच्छा होगा’। इसे खूब वाहवाही मिली। जौहर कानपुरी ने शेर पढ़ा कि ‘दिल दुखा कर आजमा कर या रुला कर छोड़ना, हमने सीखा ही नहीं अपना बना कर छोड़ना’ शबीना अदीब ने कहा कि हमेशा एक दूसरे के हक में दुआ करेंगे ये तय हुआ था, मिले कि बिछड़े मगर तुम्ही से वफा करेंगे ये तय हुआ था, रहो कहीं तुम रहें कहीं हम, मगर मोहब्वत न होगी ये कम, जो ये खता है तो उम्र भर ये खता करेंगे ये तय हुआ था। इसे सुनकर श्रोता झूम उठे।
इकबाल शायर ने जब शेर पढ़ा कि ‘न मौसमों की कोई खुशी, न गई ऋतों का मलाल है,मेरे बाद मेरी तलाश में न ख्वाब है न ख्याल है’ तो सुनने वालों ने जमकर दाद दी। मंजर भोपाली ने शेर पढ़ा कि ‘हमारे दिल पे जो जख्मों का बाब रखा है, इसी में वक्त का सारा हिसाब रखा है’। इसे सुनकर दर्शक झूम उठे। जमकर तालियों के साथ दाद दी।
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मुशायरे के संयोजक डॉ. मुदस्सिर थे। देर रात तक सुनने वाले शायरी का लुत्फ लेते रहे। यह और बात थी कि प्रशासन की ज्यादा सख्ती और टोका टाकी के चलते कोहिनूर पंडाल से ज्यादा भीड़ पंडाल के बाहर रही। पंडाल के अंदर ज्यादातर सीटें खाली पड़ी रहीं। इस बात की शायरी के शौकीनों ने निंदा भी की। मुसलिम यूथ आर्गेनाइजेशन के आमिर रशीद ने कहा कि वह मुशायरे में जाने वाले थे लेकिन पिछली कुछ नाइटों में हुई लोगों के साथ अभद्रता और मारपीट के चलते उन्होंने मुशायरे में न जाने का फैसला किया। ऐसा ही फैसला कुछ अन्य संगठनों और सम्मानीय लोगों का रहा।
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अंजुम रहबर ने पढ़ा कि ‘मेरा हर शेर तेरे जजबात से अच्छा होगा, मेरा हर दिन तेरी मुस्कुराहट से अच्छा होगा, अपने जीते जी जी लेना ऐ जालिम, मेरा निकला जनाजा भी तेरी बारात से अच्छा होगा’। इसे खूब वाहवाही मिली। जौहर कानपुरी ने शेर पढ़ा कि ‘दिल दुखा कर आजमा कर या रुला कर छोड़ना, हमने सीखा ही नहीं अपना बना कर छोड़ना’ शबीना अदीब ने कहा कि हमेशा एक दूसरे के हक में दुआ करेंगे ये तय हुआ था, मिले कि बिछड़े मगर तुम्ही से वफा करेंगे ये तय हुआ था, रहो कहीं तुम रहें कहीं हम, मगर मोहब्वत न होगी ये कम, जो ये खता है तो उम्र भर ये खता करेंगे ये तय हुआ था। इसे सुनकर श्रोता झूम उठे।
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इकबाल शायर ने जब शेर पढ़ा कि ‘न मौसमों की कोई खुशी, न गई ऋतों का मलाल है,मेरे बाद मेरी तलाश में न ख्वाब है न ख्याल है’ तो सुनने वालों ने जमकर दाद दी। मंजर भोपाली ने शेर पढ़ा कि ‘हमारे दिल पे जो जख्मों का बाब रखा है, इसी में वक्त का सारा हिसाब रखा है’। इसे सुनकर दर्शक झूम उठे। जमकर तालियों के साथ दाद दी।
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मुशायरे के संयोजक डॉ. मुदस्सिर थे। देर रात तक सुनने वाले शायरी का लुत्फ लेते रहे। यह और बात थी कि प्रशासन की ज्यादा सख्ती और टोका टाकी के चलते कोहिनूर पंडाल से ज्यादा भीड़ पंडाल के बाहर रही। पंडाल के अंदर ज्यादातर सीटें खाली पड़ी रहीं। इस बात की शायरी के शौकीनों ने निंदा भी की। मुसलिम यूथ आर्गेनाइजेशन के आमिर रशीद ने कहा कि वह मुशायरे में जाने वाले थे लेकिन पिछली कुछ नाइटों में हुई लोगों के साथ अभद्रता और मारपीट के चलते उन्होंने मुशायरे में न जाने का फैसला किया। ऐसा ही फैसला कुछ अन्य संगठनों और सम्मानीय लोगों का रहा।