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अपने विचार और कार्यों से अमर हो गए सर सैयद : सरदार गुरदेव सिंह
Tue, 13 Oct 2020 12:01 AM IST
राजेश सिंह
न्यूूज डेस्क, अमर उजाला, अलीगढ़।
न्यूूज डेस्क, अमर उजाला, अलीगढ़।
Published by: राजेश सिंह
Updated Tue, 13 Oct 2020 12:01 AM IST
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एएमयू
- फोटो : Amar Ujala
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के विधि संकाय की लॉ सोसाइटी द्वारा सर सैयद: दृष्टि एवं लक्ष्य विषय पर अंतरराष्ट्रीय वर्चुअल सम्मेलन का आयोजन किया गया। सम्मेलन में 14 राष्ट्रों के लोगों ने भाग लिया। मुख्य अतिथि इंजीनियर नदीम ए तरीन (व्यावसायी व समाजसेवी) ने कहा कि सर सैयद ने भारतीयों की सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक व बौद्धिक विकास के लिए एक अत्यंत दूरगामी दृष्टि अपनाई। उन्होंने लोगों को समझाया कि धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ वैज्ञानिक शिक्षा मनुष्य के विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है।
एएमयू के पूर्व छात्र एवं अध्यक्ष सिख शिक्षा समिति, सरदार गुरदेव सिंह, आईएएस (सेवानिवृत्त) ने कहा कि कोई भी व्यक्ति अमर नहीं होता, परंतु कुछ लोग अपने विचारों से अमर हो जाते हैं। सर सैयद उन्हीं कुछ लोगों में से एक हैं, जो अपने अभूतपूर्व कार्य से भारतीय इतिहास में अपनी एक अमिट छाप छोड़ गए हैं।
विधि संकाय के डीन तथा कांफ्रेंस के डायरेक्टर प्रो. शकील समदानी ने कहा कि सर सैयद ने एमएओ कालेज को किसी एक वर्ग के लिए सीमित नहीं किया। वह एक निडर व्यक्ति थे, जिसका जीता-जागता उदाहरण उनकी पुस्तक अस्बाब-ए-बगावत-ए-हिन्द है, जिसमें उन्होंने ब्रिटिश नीतियों की जमकर आलोचना की।
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प्रो. एम शाफे किदवई (अध्यक्ष, जन संचार विभाग) ने कहा कि 19वीं शताब्दी में जब भारत में सांस्कृतिक पुनर्जागरण का युग शुरू हुआ, तब सर सैयद भारत के पहले मुस्लिम बुद्धिजीवी थे जिन्होंने नागरिक अधिकार आंदोलन का सूत्रपात किया।
डा. लतीफा बिन आरिफा (अध्यक्ष, रिसर्च इनोवेशन इंटरप्रेरियोर एंड प्रोसट ग्रेजुएट यूनिट, अल ब्रेमी विश्वविद्यालय ओमान) ने कहा कि सर सैयद के व्यक्तित्व का सर्वाधिक महत्वपूर्ण दृष्टिकोण यह है कि उन्होंने जीवन में अपने धार्मिक आदर्शों को ध्यान में रखते हुए नए वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अपनाया। सम्मेलन में अतिथियों का स्वागत मोहम्मद नासिर तथा संचालन अब्दुल्ला समदानी ने किया।
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एएमयू के पूर्व छात्र एवं अध्यक्ष सिख शिक्षा समिति, सरदार गुरदेव सिंह, आईएएस (सेवानिवृत्त) ने कहा कि कोई भी व्यक्ति अमर नहीं होता, परंतु कुछ लोग अपने विचारों से अमर हो जाते हैं। सर सैयद उन्हीं कुछ लोगों में से एक हैं, जो अपने अभूतपूर्व कार्य से भारतीय इतिहास में अपनी एक अमिट छाप छोड़ गए हैं।
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विधि संकाय के डीन तथा कांफ्रेंस के डायरेक्टर प्रो. शकील समदानी ने कहा कि सर सैयद ने एमएओ कालेज को किसी एक वर्ग के लिए सीमित नहीं किया। वह एक निडर व्यक्ति थे, जिसका जीता-जागता उदाहरण उनकी पुस्तक अस्बाब-ए-बगावत-ए-हिन्द है, जिसमें उन्होंने ब्रिटिश नीतियों की जमकर आलोचना की।
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प्रो. एम शाफे किदवई (अध्यक्ष, जन संचार विभाग) ने कहा कि 19वीं शताब्दी में जब भारत में सांस्कृतिक पुनर्जागरण का युग शुरू हुआ, तब सर सैयद भारत के पहले मुस्लिम बुद्धिजीवी थे जिन्होंने नागरिक अधिकार आंदोलन का सूत्रपात किया।
डा. लतीफा बिन आरिफा (अध्यक्ष, रिसर्च इनोवेशन इंटरप्रेरियोर एंड प्रोसट ग्रेजुएट यूनिट, अल ब्रेमी विश्वविद्यालय ओमान) ने कहा कि सर सैयद के व्यक्तित्व का सर्वाधिक महत्वपूर्ण दृष्टिकोण यह है कि उन्होंने जीवन में अपने धार्मिक आदर्शों को ध्यान में रखते हुए नए वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अपनाया। सम्मेलन में अतिथियों का स्वागत मोहम्मद नासिर तथा संचालन अब्दुल्ला समदानी ने किया।