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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Aligarh News ›   Sacrifice big , not too small on duty

बलिदान बड़ा, पर फर्ज भी छोटा नहीं

Tue, 07 Jun 2016 01:40 AM IST
अनुज शर्मा
अनुज शर्मा Updated Tue, 07 Jun 2016 01:40 AM IST
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मथुरा के जवाहर बाग को कब्जा मुक्त कराने के दौरान पुलिस के दो अधिकारी शहीद हो गए। एसपी सिटी मुकुल द्विवेदी और एसओ फरह संतोष यादव ने बड़ा बलिदान दिया है। जिस फर्ज के लिए दोनों अधिकारियों ने शहादत दी वह फर्ज भी कोई छोटा नहीं है।
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शासन में बैठे उच्चाधिकारी अरबों की कीमत वाली करीब 300 एकड़ सरकारी जमीन को नक्सली मानसिकता वाले लोगों से छुड़ा लेने को पुलिस की बहादुरी और बड़ी कामयाबी मान रहे हैं। वहीं चर्चित नीली डायरी की फारेंसिक जांच भी हो सकती है। वह मुख्य आरोपी रामवृक्ष यादव की है इसमें अभी संदेह है।
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शासन के एक प्रमुख सचिव स्तर के अधिकारी का कहना था कि किससे कहां चूक हुई यह तो जो भी अधिकारी जांच कर रहे हैं वह अपनी रिपोर्ट में देंगे, लेकिन नक्सलवादियों (कथित सत्याग्रही) ने जिस तरह से पुलिस के खिलाफ अपनी मोर्चा बंदी कर रखी थी। जिन हथियारों का इस्तेमाल किया गया उसका मुकाबला करते हुए 300 एकड़ जमीन को कब्जा मुक्त कराकर उनको खदेड़ देना पुलिस की बहादुरी काम है। इन अधिकारी का कहना था कि जिन दो परिवारों के वीर शहीद हुए हैं उन परिवारों का दुख -दर्द समझा जा सकता है। लेकिन जो जिस पेशे में होता है उस पेशे का जोखिम उठाते हुए ड्यूटी पूरी करना ही देश धर्म है।
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 घटना स्थल का मौका मुआयना करने वाले अधिकारियों में शामिल यह अधिकारी हिचकते हुए कहते हैं कि सत्याग्रहियों के वेश में छिपे नक्सलियों का निशाना पुलिस थी। एसपी सिटी और थानेदार पर जब हमला हुआ उस समय वहां कोई अन्य पुलिस कर्मी होता तो वह भी शिकार होता। सूत्रों का यह भी कहना है कि शासन को इस बात का एहसास है कि आमने-सामने की मुठभेड़ में एसपी सिटी और एसओ फरह नक्सलियों का निशाना बन  रहे थे उस समय पुलिस कर्मी उनको छोड़कर भाग खड़े हुए थे। घटना और उसकी जांच से जुडे़ सभी अधिकारी इस तथ्य को स्वीकार तो कर रहे हैं लेकिन आफ द रिकार्ड।
नक्सली घोषित हो सकते हैं कथित सत्याग्रही
अलीगढ़। जवाहर बाग में रहने वालों की मुसीबतें और भी बढ़ने जा रही हैं। उनके खिलाफ वह कार्रवाई होने की तैयारी की जा रही है जो नक्सलवादियों पर होती है। शासन और प्रशासनिक अधिकारी बाग में रहने वाले किसी भी महिला या पुरुष की इस बात पर भरोसा नहीं कर रहे कि उसे रामवृक्ष यादव ने जबरिया रोके रखा था। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार जांच से जुड़ी सभी अधिकारियों की एक राय है कि तीन हजार लोगों को जबरिया बंधक बनाकर तो नहीं रखा जा सकता। सरगना की राय में उनकी भी सहमति थी। यदि कोई बंधक होता तो पुलिस से मुठभेड़ के दौरान पुलिस के सामने नहीं उसके साथ होता। 

जांच के सवाल पर कमिश्नर का नो कमेंट
अलीगढ़। जांच में अभी तक क्या पाया? जांच के बिन्दु क्या हैं ? जांच को लेकर क्या धारणा है ? जवाहर बाग और उसकी जांच से जुड़े किसी भी तरह के सवाल पर जांच अधिकारी चंद्रकांत का उत्तर ‘नो कमेंट’ है। खूब टटोलने पर उनका बस इतना ही कहना था कि 15 दिन में जांच पूरी की जानी है। इसे तय समय में पूरा कर लिया जाएगा। घटना से जुड़े सभी पक्षों को सुनने के लिए वह दो से तीन दिन मथुरा में बैठेंगे। कोई भी मामले से जुड़ी जानकारी उनसे बेहिचक साझा कर सकता है।
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