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‘प्रेमांश’ में संवर रहा बचपन
अमर उजाला ब्यूरो/आशीष निगम
Updated Mon, 01 Feb 2016 01:27 AM IST
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बह आठ बजे के करीब अर्जुन (8 बी), अमन (7 बी), प्रदीप (9 बी), आकाश (7 सी), कन्हैया (7 सी), सूरज (7 सी) जब कृष्णा इंटरनेशनल स्कूल पहुंचते हैं, तो उनके चेहरों की चमक देखते ही बनती है। आर्थिक रूप से बेहद कमजोर घरों के ये बच्चे प्रीमियर नगर बैंक कालोनी स्थित ‘प्रेमांश’ के संचालक रिटायर्ड एसोसिएट प्रो. पीसी गुप्ता के साथ उनके ही घर पर रह कर पढ़ रहे हैं। इसके लिए कृष्णा इंटरनेशनल स्कूल को फीस भी वह अपनी जेब से देते हैं। बच्चों के खाने पीने से लेकर कपड़ों तक खर्च भी वही वहन करते हैं।
इसी घर में सुबह नौ से तीन बजे तक कक्षा एक से पांच तक के बच्चों की इंग्लिश मीडियम पाठशाला भी होती है। जिसमें फीस, किताबें, ड्रेस और जूते-मोजे तक सब कुछ फ्री मिलता है। हां, बेहद मामूली खर्च (सवा रुपये रोज) सिर्फ इसलिए लिया जाता है ताकि अभिभावकों को अपनी जिम्मेदारी का अहसास बना रहे।
इसके बाद दोपहर तीन बजे एमसीए और बीटेक करने वाले तकरीबन दो दर्जन युवा भी पैसों की कोई चिंता किए बिना ‘प्रेमांश’ में पहुंचते हैं और गणित के भारी भरकम सवालों का बोझ मन से उतार कर मुस्कराते हुए बाहर आते हैं। नि:स्वार्थ सेवाआें का सिलसिला यहीं नहीं रुकता। लड़कियों को सुकन्या योजना का फायदा दिलाना हो या किसी गरीब कन्या की शादी के लिए इंश्योरेंस करना हो। स्कूल के बच्चों को कोट पहनाना हो या फिर उनका सामूहिक जन्मदिन मनाना हो। यहां पर सब कुछ आनंद के साथ हो रहा है।
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खुद पीसी गुप्ता अपनी कहानी कुछ यूं बयां करते हैं कि- 5 अक्तूबर 1947 में मथुरा की तहसील मांट के गांव सुरीर में खचेरमल गुप्ता और द्रोपदी देवी के परिवार में उनका जन्म हुआ। चार बेटों और एक बेटी में वह सबसे छोटे हैं। स्कूल की शुरुआत हुई तो गणित से बहुत डरते रहे।
1966 में केआर कालेज मथुरा में बीए फाइनल (गणित और ज्योग्राफी) से किया तो गणित में फेल और ज्योग्राफी में कॉलेज टॉप किया। लेकिन एक सबजेक्ट में फेल होने से गोल्ड मेडल नहीं मिला। 1967 में बीए पास किया। घर वालों ने गणित में ही पढ़ाने की जिद पकड़ी तो आगरा काॅलेज आगरा आ गए।
आगरा आने के बाद हॉस्टल में पूरी-पूरी रात कमरा बंद कर पढ़ने, पिता जी के लिए भी कमरा नहीं खोलने, समझ नहीं आने पर क्लास में खड़े-खड़े पढ़ने के फैसले ने काॅलेज में गणित में टॉप कराया। 1969 में एमए की पढ़ाई पूरी की। 1969 में एसवी कॉलेज अलीगढ़ में मैथ पढ़ाने लगे। 1972 में एएमयू से एमए सांख्यिकी में यूनिवर्सिटी टॉप किया। 1982 में पीएचडी पूरी हुई।
30 जून 2008 में रिटायरमेंट हुआ और पहली जुलाई 2008 को प्रेमांश के नाम से स्कूल खोल दिया। हां, इस पूरे मिशन में बेटी सोनाली अग्रवाल, बेटे अभिषेक का बहुत साथ है। वह किसी न किसी बहाने से इन बच्चों की मदद करते रहते हैं जिससे मुझे बहुत ज्यादा परेशानी नहीं होती। पेंशन की पूरी रकम इसी काम में लग जाती है।
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इसी घर में सुबह नौ से तीन बजे तक कक्षा एक से पांच तक के बच्चों की इंग्लिश मीडियम पाठशाला भी होती है। जिसमें फीस, किताबें, ड्रेस और जूते-मोजे तक सब कुछ फ्री मिलता है। हां, बेहद मामूली खर्च (सवा रुपये रोज) सिर्फ इसलिए लिया जाता है ताकि अभिभावकों को अपनी जिम्मेदारी का अहसास बना रहे।
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इसके बाद दोपहर तीन बजे एमसीए और बीटेक करने वाले तकरीबन दो दर्जन युवा भी पैसों की कोई चिंता किए बिना ‘प्रेमांश’ में पहुंचते हैं और गणित के भारी भरकम सवालों का बोझ मन से उतार कर मुस्कराते हुए बाहर आते हैं। नि:स्वार्थ सेवाआें का सिलसिला यहीं नहीं रुकता। लड़कियों को सुकन्या योजना का फायदा दिलाना हो या किसी गरीब कन्या की शादी के लिए इंश्योरेंस करना हो। स्कूल के बच्चों को कोट पहनाना हो या फिर उनका सामूहिक जन्मदिन मनाना हो। यहां पर सब कुछ आनंद के साथ हो रहा है।
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खुद पीसी गुप्ता अपनी कहानी कुछ यूं बयां करते हैं कि- 5 अक्तूबर 1947 में मथुरा की तहसील मांट के गांव सुरीर में खचेरमल गुप्ता और द्रोपदी देवी के परिवार में उनका जन्म हुआ। चार बेटों और एक बेटी में वह सबसे छोटे हैं। स्कूल की शुरुआत हुई तो गणित से बहुत डरते रहे।
1966 में केआर कालेज मथुरा में बीए फाइनल (गणित और ज्योग्राफी) से किया तो गणित में फेल और ज्योग्राफी में कॉलेज टॉप किया। लेकिन एक सबजेक्ट में फेल होने से गोल्ड मेडल नहीं मिला। 1967 में बीए पास किया। घर वालों ने गणित में ही पढ़ाने की जिद पकड़ी तो आगरा काॅलेज आगरा आ गए।
आगरा आने के बाद हॉस्टल में पूरी-पूरी रात कमरा बंद कर पढ़ने, पिता जी के लिए भी कमरा नहीं खोलने, समझ नहीं आने पर क्लास में खड़े-खड़े पढ़ने के फैसले ने काॅलेज में गणित में टॉप कराया। 1969 में एमए की पढ़ाई पूरी की। 1969 में एसवी कॉलेज अलीगढ़ में मैथ पढ़ाने लगे। 1972 में एएमयू से एमए सांख्यिकी में यूनिवर्सिटी टॉप किया। 1982 में पीएचडी पूरी हुई।
30 जून 2008 में रिटायरमेंट हुआ और पहली जुलाई 2008 को प्रेमांश के नाम से स्कूल खोल दिया। हां, इस पूरे मिशन में बेटी सोनाली अग्रवाल, बेटे अभिषेक का बहुत साथ है। वह किसी न किसी बहाने से इन बच्चों की मदद करते रहते हैं जिससे मुझे बहुत ज्यादा परेशानी नहीं होती। पेंशन की पूरी रकम इसी काम में लग जाती है।