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Potato: पेट भरने वाली फसल ही नहीं, विज्ञान और शोध की नई प्रयोगशाला बना आलू, बढ़ रही नई किस्मों की खेती

Sat, 30 May 2026 05:15 PM IST
Chaman Kumar Sharma आशीष निगम, अमर उजाला, अलीगढ़
आशीष निगम, अमर उजाला, अलीगढ़ Published by: Chaman Kumar Sharma Updated Sat, 30 May 2026 05:15 PM IST
सार

संयुक्त राष्ट्र (यूएन) और खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के अनुसार, आलू दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण खाद्य फसलों में से एक है। वैश्विक खाद्य सुरक्षा, पोषण और गरीबी उन्मूलन में आलू की महत्वपूर्ण भूमिका को उजागर करने के लिए हर साल 30 मई को दुनिया भर में अंतरराष्ट्रीय आलू दिवस मनाया जाता है।

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Potato, the new laboratory for science and research
आलू की कुफरी नीलकंठ किस्म - फोटो : संवाद

विस्तार

आलू अब सिर्फ पेट भरने वाली फसल नहीं, बल्कि विज्ञान और शोध की नई प्रयोगशाला भी बन चुका है। बदलती खानपान की जरूरतों और स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता के बीच वैज्ञानिक ऐसी किस्में विकसित कर रहे हैं, जो बेहतर पोषण के साथ प्रोसेसिंग उद्योग की जरूरतों को भी पूरा कर सकें। इसी कड़ी में सीपीआरआई शिमला और देहरादून में विकसित कुफरी नीलकंठ, कुफरी सूर्या और चिप्सोना-1 जैसी किस्में उत्तर प्रदेश की आलू बेल्ट में तेजी से अपना दायरा बढ़ा रही हैं।

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अकेले अलीगढ़ जिले में ही आलू के कुल रकबा 31.5 हजार में से दो हजार में नई किस्मों की पैदावार हुई है। इसी तरह, आगरा, हाथरस, मेरठ, सहारनपुर, कन्नौज, फिरोजाबाद, एटा और मैनपुरी जिले में भी इनका रकबा बढ़ा है। एक हेक्टेयर में 250 से 300 क्विंटल तक आलू निकला है। इसके बीज का भाव 2040 से 2905 रुपये प्रति क्विंटल तक है। यह भाव कंद के आकार पर भी निर्भर करता है। भाव अच्छा होने के कारण किसान बीज भी पैदा कर रहे हैं।
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दरअसल संयुक्त राष्ट्र (यूएन) और खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के अनुसार, आलू दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण खाद्य फसलों में से एक है। वैश्विक खाद्य सुरक्षा, पोषण और गरीबी उन्मूलन में आलू की महत्वपूर्ण भूमिका को उजागर करने के लिए हर साल 30 मई को दुनिया भर में अंतरराष्ट्रीय आलू दिवस मनाया जाता है। लखनऊ स्थित केंद्रीय औषधि अनुसंधान संस्थान (सीडीआरआई) सहित कई प्रयोगशालाओं में आलू की इन नई किस्मों पर परीक्षण हुए हैं जिनके मुताबिक सामान्य आलू की तुलना में नई किस्मों में कम शर्करा और बेहतर गुणवत्ता है। शायद यह भी एक वजह है कि चिप्स और प्रोसेसिंग उद्योग इन्हें हाथोंहाथ ले रहे हैं।

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तीनों किस्मों की खासियत
1. कुफरी नीलकंठ : इस किस्म में शर्करा और स्टार्च का स्तर अपेक्षाकृत कम होता है। इसमें एंथोसायनिन जैसे एंटीऑक्सीडेंट प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं, जो स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माने जाते हैं। स्वास्थ्य के प्रति जागरूक उपभोक्ताओं के बीच इसकी मांग बढ़ रही है।
2. कुफरी सूर्या : सीपीआरआई के अनुसार इस किस्म की संरचना सामान्य आलू से अलग है। इसे बेहतर पोषण और संतुलित शर्करा प्रभाव वाली किस्मों में शामिल किया जाता है। किसानों को इसकी उपज भी अच्छी मिल रही है।
3. चिप्सोना-1 : इसमें शुष्क पदार्थ (ड्राई मैटर) अधिक और शर्करा कम होती है। यही कारण है कि चिप्स और प्रोसेस्ड उत्पाद बनाने वाली कंपनियां इसे प्राथमिकता देती हैं। इससे तैयार उत्पाद का रंग और गुणवत्ता बेहतर रहती है।

इन किस्मों का ग्लाइसेमिक प्रभाव सामान्य आलू की तुलना में कम है, इसलिए इन्हें मधुमेह रोगियों के लिए अपेक्षाकृत बेहतर विकल्प माना जा रहा है। अधिक पौष्टिक, रोग प्रतिरोधी और बदलती जलवायु परिस्थितियों के अनुकूल नई किस्मों पर काम किया जा रहा है। -आरएल प्रसाद, उप निदेशक, राज्य बीज प्रमाणन संस्थान
प्रदेश की आलू बेल्ट में नई किस्मों की पैदावार काफी चर्चित हो रही है। इसका बड़ा लाभ आलू के रकबा में वृद्धि होना है। -सुनील कुमार, जिला उद्यान अधिकारी, अलीगढ़
कुफरी नीलकंठ की एनसीआर और दिल्ली में मांग बढ़ रही है। किसानों में अभी इसके प्रति जागरूकता कम है, जबकि बेहतर कीमत मिल सकती है। इस रबी सीजन में कुफरी सूर्या की हिस्सेदारी करीब 20 फीसदी रही। - जितेंद्र अवस्थी, आलू निर्यातक

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