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शिक्षा की सजा.. बेहोशी और बदहवासी
मनोज माहेश्वरी
Updated Thu, 21 Apr 2016 01:48 AM IST
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शिक्षा
- फोटो : महीपाल सिंह
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जनपद में परिषदीय स्कूलों की शिक्षा पर सालाना लगभग पौने तीन अरब खर्च किए जाते हैं। तरह-तरह की सुविधाओं के दावे भी किए जाते हैं। लेकिन स्कूलों की दशा कुछ और ही कहानी कह रही है। बानगी के तौर पर शहर के कुछ विद्यालयों को लिया जा सकता है जिनकी दशा बद से बदतर है। शहर के बीचोबीच बेगपुर स्थित प्राइमरी स्कूल संख्या 60 में पढ़ने वाले बच्चों को देखकर लगता है कि वह शिक्षा के नाम पर छह घंटे की सजा भुगत रहे हैं।
भीषण गर्मी है। पारा 42 के पार पहुंच गया है। दिन भर गरम हवाएं चलती हैं। इसके बावजूद परिषदीय स्कूल में न बिजली है और न पानी। किराए की कोठरी में चल रहे इस विद्यालय में बच्चे आते पढ़ने के लिए , लेकिन भीषण गर्मी में कई घंटे तक परेशान रहते हैं।
कोठरीनुमा कमरों में यह बच्चे गर्मी में बिलबिलाते रहते हैं। स्कूल में लगे पंखे शोपीस बने हुए हैं। विद्यालय की छत जीर्णशीर्ण अवस्था में है। यहां बच्चों को मिड डे मील तो मिलता है, पर पानी पीने के लिए उन्हें स्कूल से बाहर जाना पड़ता है। विद्यालय में शौचालय तक नहीं है। कई दशक हो गए, लेकिन विद्यालय का नया भवन नहीं बना है। कई बार नेता और अधिकारी आश्वासन दे चुके हैं, पर स्थिति यथावत है।
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ये स्कूल कई दशक से एक पुराने मकान की दो कोठरियों में चल रहा हैै। कमरों की छत से कई बार प्लास्टर गिर चुका है। यहां हमेशा हादसे की आशंका रहती है। अभी 92 बच्चे शिक्षाग्रहण कर रहे हैं। यहां पंखे तो लगे हैं, पर कई साल से विद्यालय में बिजली संयोजन नहीं है। यहां पानी की भी व्यवस्था नहीं है। बच्चे मिड डे मील खाने के बाद स्कूल परिसर से बाहर इंडिया मार्क टू नल पर पानी पीने जाते हैं।
स्कूल के प्रभारी हेडमास्टर कहते हैं कि गर्मियों में अक्सर बच्चे बेहोश हो चुके हैं। कोठरीनुमा कमरों में जगह कम है। गर्मी दूर भगाने के लिए बच्चे किताब-कॉपियों से हवा करते हैं। यहां के प्रभारी हेडमास्टर अजयपाल सिंह का कहना है कि कई साल से स्कूल में बिजली नहीं है। इस विद्यालय को किसी और या नए भवन में शिफ्ट करने की मांग की जा चुकी है लेकिन कोई सुनवाई नहीं। यही दशा शहर के लगभग 20 स्कूलों की है।
शहर में करीब दो दर्जन स्कूल किराए के मकानों में चल रहे हैं। मकान मालिक खुद नहीं चाहते है कि इन भवनों की स्थिति सुधरे। उनकी मंशा रहती है कि जल्दी विभाग इन्हें खाली कर दे, ताकि वह इस पर कब्जा कर लें। विभाग भूमि खरीद कर नहीं देता और शहरी क्षेत्र में इस समय जमीन नहीं है। यदि दूसरी जगह इन विद्यालयों को शिफ्ट करा दें तो दूरी बढ़ जाएगी। ऐसे में बच्चों की संख्या घट जाएगी। इसलिए बच्चों को इस तरह की समस्याओं से जूझना पड़ रहा है।
-छोटेलाल खंड शिक्षा अधिकारी (नगर)
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भीषण गर्मी है। पारा 42 के पार पहुंच गया है। दिन भर गरम हवाएं चलती हैं। इसके बावजूद परिषदीय स्कूल में न बिजली है और न पानी। किराए की कोठरी में चल रहे इस विद्यालय में बच्चे आते पढ़ने के लिए , लेकिन भीषण गर्मी में कई घंटे तक परेशान रहते हैं।
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कोठरीनुमा कमरों में यह बच्चे गर्मी में बिलबिलाते रहते हैं। स्कूल में लगे पंखे शोपीस बने हुए हैं। विद्यालय की छत जीर्णशीर्ण अवस्था में है। यहां बच्चों को मिड डे मील तो मिलता है, पर पानी पीने के लिए उन्हें स्कूल से बाहर जाना पड़ता है। विद्यालय में शौचालय तक नहीं है। कई दशक हो गए, लेकिन विद्यालय का नया भवन नहीं बना है। कई बार नेता और अधिकारी आश्वासन दे चुके हैं, पर स्थिति यथावत है।
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ये स्कूल कई दशक से एक पुराने मकान की दो कोठरियों में चल रहा हैै। कमरों की छत से कई बार प्लास्टर गिर चुका है। यहां हमेशा हादसे की आशंका रहती है। अभी 92 बच्चे शिक्षाग्रहण कर रहे हैं। यहां पंखे तो लगे हैं, पर कई साल से विद्यालय में बिजली संयोजन नहीं है। यहां पानी की भी व्यवस्था नहीं है। बच्चे मिड डे मील खाने के बाद स्कूल परिसर से बाहर इंडिया मार्क टू नल पर पानी पीने जाते हैं।
स्कूल के प्रभारी हेडमास्टर कहते हैं कि गर्मियों में अक्सर बच्चे बेहोश हो चुके हैं। कोठरीनुमा कमरों में जगह कम है। गर्मी दूर भगाने के लिए बच्चे किताब-कॉपियों से हवा करते हैं। यहां के प्रभारी हेडमास्टर अजयपाल सिंह का कहना है कि कई साल से स्कूल में बिजली नहीं है। इस विद्यालय को किसी और या नए भवन में शिफ्ट करने की मांग की जा चुकी है लेकिन कोई सुनवाई नहीं। यही दशा शहर के लगभग 20 स्कूलों की है।
शहर में करीब दो दर्जन स्कूल किराए के मकानों में चल रहे हैं। मकान मालिक खुद नहीं चाहते है कि इन भवनों की स्थिति सुधरे। उनकी मंशा रहती है कि जल्दी विभाग इन्हें खाली कर दे, ताकि वह इस पर कब्जा कर लें। विभाग भूमि खरीद कर नहीं देता और शहरी क्षेत्र में इस समय जमीन नहीं है। यदि दूसरी जगह इन विद्यालयों को शिफ्ट करा दें तो दूरी बढ़ जाएगी। ऐसे में बच्चों की संख्या घट जाएगी। इसलिए बच्चों को इस तरह की समस्याओं से जूझना पड़ रहा है।
-छोटेलाल खंड शिक्षा अधिकारी (नगर)