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लड़ना नहीं, पढ़ना है का पैगाम दे गई ‘अलिफ’

Fri, 18 Nov 2016 01:58 AM IST
अमर उजाला, अलीगढ़
अमर उजाला, अलीगढ़ Updated Fri, 18 Nov 2016 01:58 AM IST
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No fight, giving Reading the message of 'Alif'
लड़ना नहीं, पढ़ना है का पैगाम दे गई ‘अलिफ’ - फोटो : dig vishal
कलम के बाद कैमरे से अपने सृजन को धार देने वाले फिल्मकार जैगम इमाम की चर्चित फिल्म ‘अलिफ’ का गुरुवार को एएमयू के ऐतिहासिक कैनेडी हाल में प्रदर्शन किया गया। दो घंटे की इस फीचर फिल्म को विद्यार्थियों व अन्य दर्शकों की जबरदस्त सराहना मिली।
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मदरसे में पढ़ने वाले एक मुसलिम बच्चे के  कान्वेंट स्कूल में पहुंच कर शिक्षा हासिल करने और उस दौरान होने वाली परेशानियों को इस फिल्म में बेहद भावनात्मक अंदाज में दिखाया गया है।
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इस दौरान सामाजिक रूढ़िवादिता, मानसिक द्वंद्व, पारिवारिक स्थितियों के साथ संघर्ष को भी बखूबी चित्रित किया गया है।
फिल्म में दिखाया गया है कि मदरसे में पढ़ने वाला यही बच्चा परिवार और अपनी इच्छा शक्ति के दम पर अपनी पढ़ाई को पूरा करता है और डाक्टर बनता है।शिक्षा के महत्व को दर्शाती इस फिल्म का मकसद साफ है कि लड़ना नहीं , पढ़ना है। फिल्मकार जैगम इमाम इससे पहले भी दोजख फिल्म में अपनी कला का जलवा दिखा चुके हैं। स्क्रीनिंग के समय स्वयं फिल्मकार जैगम इमाम, छात्रसंघ के सचिव नवील उस्मानी, यूनिवर्सिटी फिल्म क्लब के सेक्रेटरी शावेज खान, उसैद बिलाल, मुसैद जमां, प्रियंका, रश्मी आदि मौजूद थीं।
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यह है अलिफ की कहानी
बनारस में रहने वाले हकीम (दानिश हुसैन) की बहन (नीलिमा अजीम) पाकिस्तान से आती है और देखती है भाई हकीम का बेटा अली (मो. सउद) एक मदरसे में पढ़ रहा है। बहन अपने भाई हकीम को मश्वरा करती है कि अली की बेहतरी के लिए वह उसे मदरसे से निकाल कर किसी अच्छे स्कूल में दाखिला करवाए।
काफी जद्दोजेहद के बाद बहन भाई हकीम को इस बात के लिए मना लेती है। अली का अच्छे स्कूल में दाखिला होने पर मदरसे वाले खफा हो जाते हैं कि अगर सभी यूं चले गए तो मदरसों का क्या होगा? इस बीच बहन का भारत में रहने का वीजा भी खत्म हो रहा होता है।

अली की बेहतरी के लिए वह भारत में रहना चाहती है, लेकिन कानूनन अड़चन आ रही है। ऐेसे में एलआईयू वाला मश्वरा देता है कि बहन की फर्जी कब्र बना दो। कह देंगे कि इंतकाल हो गया। इसके बाद फिल्म कई रोचक मोड़ लेती है।

 
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