अब गाय नहीं पाल रहे मुसलमान
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अब गाय नहीं पाल रहे मुसलमान
दीपक शर्मा
अलीगढ़। बीफ के नाम पर हो रहे बवाल के चलते पिछले कुछ महीनों में पशु तस्करों को रोकने के नाम पर हुई हिंसा, मारपीट, उपद्रव आदि की घटनाओं के बाद एक अलग प्रकार का माहौल बना। इसकी चरम परिण्ीति दादरी के गांव बिसाहड़ा में देखने को मिली।
इन सभी बातों का प्रत्यक्ष असर यह देखने को मिला कि जो मुसलमान पशु पालक और काश्तकार सदियों से दूध और खेती आदि के लिए गोवंश को पाल रहे थे, अब वह उसे नहीं रख रहे हैं। अमर उजाला ने शहर और आसपास के कुछ ऐसे पशु पालकों से बात की जो कुछ दिन पहले तक दूध के लिए गाय पाल रहे थे लेकिन ताजा बने माहौल के चलते उन्होंने अपने पशु हिंदू भाइयों और परिचितों को दान कर दिए। बेचे क्यों नहीं? इस सवाल पर कुछ ने कहा कि जिस पशु ने सालों साल उनकी औलादों को दूध पिलाया हो उसे बेचते कैसे? अब हालत यह है कि इन मुसलमान परिवारों में बच्चों के लिए गाय का दूध नहीं है।
‘इस्लाम धर्म में भी जानवरों की देखभाल और उन्हें पालने की बड़ी अहमियत है। लेकिन जिस तरीके से देश में घटनाएं हो रही हैं उसको देखते हुए अब गाय पालने का शौक मुसलमानों के दिल में ही रह गया है। डर लगता है कि कहीं कोई अप्रिय घटना न हो जाए’ - हाजी कयामुद्दीन मजाहरी, काजी पाड़ा
‘मेरा बच्चा अख्तर अली कहता है कि अब्बू दूध अच्छा नहीं लगता है। एक गाय ले आएं गाय का दूध बहुत फायदा करेगा और सबकी जरूरत भी पूरी हो जाएगी। लेकिन दादरी वाले कांड के बाद अब लगता है कि अब गाय न खरीदूं’ - मो. अली, जंगलगढ़ी
‘हम संयुक्त परिवार में रहते हैं। बीमारियों से बचाव के लिए मेरी मां ने मुझसे कहा कि एक गाय ले आओ बकरियों के साथ पल जाएगी लेकिन देश के माहौल को देखते हुए गाय लाने का सपना ही रह गया’ - मुश्ताक अहमद, काला महल, ऊपरकोट
‘गाय थी लेकिन हिंदू दोस्त को दे दी। अब तो सिर्फ बच्चों को तसल्ली देता हूं कि जब भी माहौल अच्छा होगा गाय ले आऊंगा। गाय को लेकर राजनीति नहीं होनी चाहिए। सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखने पर ध्यान दिया जाना चाहिए।’ - जमीरउ्द्दीन, जयगंज