Monitor Lizard: नालों से घरों में पहुंच रही विषखपरिया, मारने-पकड़ने पर है सजा, जहरीली होती या नहीं, जानें यहां
विषखपरिया वन्यजीव संरक्षण अधिनियम-1972 के अंतर्गत अनुसूची-I में संरक्षण प्राप्त है। विषखपरिया का शिकार, व्यापार एवं खरीद-फरोख्त प्रतिबंधित है। इसको पकड़ना, इसके अंग रखना या इसका व्यापार करना गैरकानूनी है। पकड़े जाने पर तीन से सात वर्ष तक का कारावास हो सकता है।
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गर्मी के इस मौसम में रोजाना अलीगढ़ जिले में दो से तीन विषखपरिया पकड़ीं जा रही हैं। सीवर, नाले-नालियों और कूड़े के ढेरों से निकल कर इनके बच्चे रिहायशी इलाकों में इधर-उधर घूम रहे हैं, जिससे लोगों में दहशत फैल रही है। वन विभाग ने बीते एक महीने में 60 विषखपरिया पकड़ कर जंगल में छोड़ी है। यह सभी रिहायशी इलाकों में निकले थे, जिसकी लोगों ने शिकायत की थी, इसके बाद विभाग ने इनको सुरक्षित पकड़ा।
लोगों में यह अंधविश्वास है कि यह बहुत जहरीला होता है और इसके काटने से मौत हो सकती है, लेकिन हकीकत में इसमें किसी तरह की कोई विष ग्रंथि नहीं होती, इसलिए यह विषहीन है। अगर आपके आसपास किसी जगह पर यह निकले तो इसको मारें नहीं, बल्कि वन विभाग की टीम को सूचना दें, क्योंकि इसकी जान लेने पर तीन से सात साल की जेल हो सकती है।
इसको विषखोपड़ा, गोह या मॉनिटर लिजार्ड भी कहते हैं। यह एक सरीसृप है, जिसके दांत आरी जैसे मुड़े होते हैं, इसलिए काटने से गहरा घाव हो सकता है और ज्यादा खून बह सकता है। यह कीड़े-मकोड़े और चूहों जैसे छोटे जीवों को खाता है, इसलिए इसके मुंह और नाखूनों में बैक्टीरिया होते हैं, जिससे काटने पर संक्रमण हो सकता है। आमतौर पर यह ग्रामीण इलाकों और घरों के आसपास चूहे, सांप और कीड़े-मकौड़े खाकर पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित करते हैं, लेकिन अब यह रोजाना आबादी में भी पहुंच रहे हैं।
अलीगढ़ के रेंजर गौरव सिंह बताते हैं कि विषखपरिया वन्यजीव संरक्षण अधिनियम-1972 के अंतर्गत अनुसूची-I में संरक्षण प्राप्त है। बाघ और हाथी आदि संरक्षित वन्यजीव भी इसी श्रेणी में हैं। विषखपरिया का शिकार, व्यापार एवं खरीद-फरोख्त प्रतिबंधित है। इसको पकड़ना, इसके अंग रखना या इसका व्यापार करना गैरकानूनी है। पकड़े जाने पर तीन से सात वर्ष तक का कारावास हो सकता है। अपराध की प्रकृति के अनुसार गैर-जमानती कार्रवाई तक का सामना करना पड़ सकता है। देश में पाए जाने वाले बंगाल मॉनिटर, यलो मॉनिटर, डेसर्ट मॉनिटर और एशियन वाटर मॉनिटर को कानूनी संरक्षण प्राप्त है। जब भी इनके निकलने की कोई सूचना मिलती है तो विभागीय टीम रेस्क्यू कर उन्हें जंगल में छोड़ती है।
अलीगढ़ में एशियाई वाटर मॉनिटर
अलीगढ़ के गर्म और आर्द्र क्षेत्रों में में एशियाई वाटर मॉनिटर रहते हैं, जो अप्रैल से अक्टूबर के बीच प्रजनन करते हैं। मादाएं एक महीने बाद सड़े हुए तनों या नम मिट्टी में अंडे देती हैं। अंडों का इनक्यूबेशन छह से सात महीने का होता है। जिसके बाद अप्रैल-मई में बच्चे बाहर निकलते हैं, जो गर्मी में सक्रिय रहते हैं। यह जमीन और पानी दोनों जगह रह सकते हैं। बड़े होने पर 10 फीट तक लंबे हो सकते हैं।
नाले बने ठिकाने, यहीं से आबादी में घुस रहे
तेजी से खत्म हुए जंगल और पेड़ों के अंधाधुंध कटान से यह शहरी इलाकों की ओर आ रहे हैं। आवास की कमी और भोजन की तलाश आबादी में इनके आने का मुख्य कारण है। अलीगढ़ के अधिकांश इलाकों में गहरे खुले नाले और सीवर सिस्टम इनके प्राकृतिक आवास बन गए हैं। इन नालों में इन्हें आसानी से चूहें, मेंढक, सड़ा हुआ मांस और कचरा खाने के लिए मिल जाता है। इन्हीं नालों से यह घरों के बाथरूम, बेसमेंट या कूलर-पाइप में छिपकर अंदर तक पहुंच जाते हैं। इसलिए इन दिनों इनके बच्चे कई जगह मिल रहे हैं।