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रंज और गम के माहौल में ताजिये हुए सुपुर्द ए खाक
अलीगढ़
Updated Sun, 25 Oct 2015 02:36 AM IST
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रंज और गम के माहौल में ताजिये हुए सुपुर्द ए खाक
अमर उजाला ब्यूरो
अलीगढ़। इमाम हुसैन की शहादत की याद में 10 मोहर्रम को ताजिया निकाले गए, मातम किया गया। अकीदत का इजहार करने वालों ने पैगंबर मोहम्मद के नवासे हजरत हुसैन की शहादत के गम में मातम किया और मर्सिया पढ़े। सभी के लबों पर ‘या हुसैन’ गूंज रहा था। करीब 1400 साल पहले आज ही के दिन कर्बला (इराक) के मैदान में यजीद की सेना के साथ लड़ते हुए हजरत हुसैन शहीद हो गए थे। शनिवार को एएमयू के बैतुल सलात से शुरू हुए इस जुलूस में हजरत हुसैन के प्रति लोगों ने अपनी मोहब्बत और अकीदत का इजहार किया साथ ही छुरियों और तलवारों से मातम किया। जुलूस सुबह करीब 11 बजे एएमयू बैतुल सलात से शुरू होकर शमशाद मार्केट, एसएसपी आवास, जेल रोड, नुमाइश मैदान, बन्ना देवी, फायर ब्रिगेड कॉलोनी, गूलर रोड, देहली गेट, खैर रोड होकर करबला पहुंचा। यहां पर गमगीन माहौल में ताजियों को सुपुर्द ए खाक किया गया। खास बात यह रही कि 10 मोहर्रम को आतंकवाद विरोधी दिवस के रूप में भी मनाया गया। जुलूस में मासूम बच्चे हाथों में महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू और देश के अन्य महापुरुषों के वाक्यों को लिखे तख्ती बैनर लेकर चल रहे थे।
जुलूस के दौरान मौलाना हसन मोहम्मद ने शमशाद मार्केट पर तकरीर करते हुए कहा कि हजरत हुसैन ने जुल्म और अत्याचारों के खिलाफ अपने 72 साथियों के साथ आवाज उठाई। यजीद की फौज ने इमाम हुसैन, 71 साथियों को मार दिया। इसमें छह महीने के अली अकबर भी शामिल थे। डॉ. वसी जाफरी ने जेल रोड पर तकरीर करते हुए कहा कि इराक की राजधानी बगदाद से 100 किलोमीटर दूर उत्तर- पूर्व में एक छोटा सा कस्बा है करबला। यहां पर तारीख ए इस्लाम की एक ऐसी नायाब जंग हुई, जिसने इस्लाम का रुख ही बदल दिया। इस करबला की बदौलत ही आज दुनिया के हर शहर में करबला नामक एक स्थान होता है जहां पर मुहर्रम मनाया जाता है। मौलाना असगर ऐजाज ने देहली गेट पर तकरीर करते हुए कहा कि हिजरी संवत के पहले महीने मुहर्रम की 10 तारीख को 10 मुहर्रम को मोहम्मद साहिब के नवासे हजरत हुसैन को इराक के करबला में उस समय के खलीफा यजीद बिन मुआविया के आदमियों ने कत्ल कर दिया था। इस दिन को ‘यौमे आशुरा’ भी कहा जाता है। करबला में मौलाना मंजर सादिक ने तकरीर करते हुए फरमाया कि करबला में एक तरफ 72 और दूसरी तरफ यजीद की 40,000 सैनिकों की सेना थी। 72 में मर्द, औरतें और 51 बच्चे शामिल थे। हजरत हुसैन की फौज में कई मासूम थे, जिन्होंने यह जंग लड़ी। हजरत हुसैन की फौज के कमांडर अब्बास इब्ने अली थे। उधर यजीद की फौज की कमान उमर इब्ने सअद के हाथों में थी। इस मौके पर कन्वीनर करबला शाहजमाल के मुतवल्ली मुख्तार जैदी, मुर्तजा जैदी, डॉ. इनायत अली, जुल्फिकार हुसैन, आबिद जैदी, डॉ. वसी जाफरी, नादिर नकवी, अहमर जैदी, इमरान जैदी, नासिर हुसैन, डॉ. काजिम आगा, डॉ. अहमद अब्बास, प्रो. परवेज कमर, डॉ. अली नवाज जैदी आदि मौजूद थे।
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अमर उजाला ब्यूरो
अलीगढ़। इमाम हुसैन की शहादत की याद में 10 मोहर्रम को ताजिया निकाले गए, मातम किया गया। अकीदत का इजहार करने वालों ने पैगंबर मोहम्मद के नवासे हजरत हुसैन की शहादत के गम में मातम किया और मर्सिया पढ़े। सभी के लबों पर ‘या हुसैन’ गूंज रहा था। करीब 1400 साल पहले आज ही के दिन कर्बला (इराक) के मैदान में यजीद की सेना के साथ लड़ते हुए हजरत हुसैन शहीद हो गए थे। शनिवार को एएमयू के बैतुल सलात से शुरू हुए इस जुलूस में हजरत हुसैन के प्रति लोगों ने अपनी मोहब्बत और अकीदत का इजहार किया साथ ही छुरियों और तलवारों से मातम किया। जुलूस सुबह करीब 11 बजे एएमयू बैतुल सलात से शुरू होकर शमशाद मार्केट, एसएसपी आवास, जेल रोड, नुमाइश मैदान, बन्ना देवी, फायर ब्रिगेड कॉलोनी, गूलर रोड, देहली गेट, खैर रोड होकर करबला पहुंचा। यहां पर गमगीन माहौल में ताजियों को सुपुर्द ए खाक किया गया। खास बात यह रही कि 10 मोहर्रम को आतंकवाद विरोधी दिवस के रूप में भी मनाया गया। जुलूस में मासूम बच्चे हाथों में महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू और देश के अन्य महापुरुषों के वाक्यों को लिखे तख्ती बैनर लेकर चल रहे थे।
जुलूस के दौरान मौलाना हसन मोहम्मद ने शमशाद मार्केट पर तकरीर करते हुए कहा कि हजरत हुसैन ने जुल्म और अत्याचारों के खिलाफ अपने 72 साथियों के साथ आवाज उठाई। यजीद की फौज ने इमाम हुसैन, 71 साथियों को मार दिया। इसमें छह महीने के अली अकबर भी शामिल थे। डॉ. वसी जाफरी ने जेल रोड पर तकरीर करते हुए कहा कि इराक की राजधानी बगदाद से 100 किलोमीटर दूर उत्तर- पूर्व में एक छोटा सा कस्बा है करबला। यहां पर तारीख ए इस्लाम की एक ऐसी नायाब जंग हुई, जिसने इस्लाम का रुख ही बदल दिया। इस करबला की बदौलत ही आज दुनिया के हर शहर में करबला नामक एक स्थान होता है जहां पर मुहर्रम मनाया जाता है। मौलाना असगर ऐजाज ने देहली गेट पर तकरीर करते हुए कहा कि हिजरी संवत के पहले महीने मुहर्रम की 10 तारीख को 10 मुहर्रम को मोहम्मद साहिब के नवासे हजरत हुसैन को इराक के करबला में उस समय के खलीफा यजीद बिन मुआविया के आदमियों ने कत्ल कर दिया था। इस दिन को ‘यौमे आशुरा’ भी कहा जाता है। करबला में मौलाना मंजर सादिक ने तकरीर करते हुए फरमाया कि करबला में एक तरफ 72 और दूसरी तरफ यजीद की 40,000 सैनिकों की सेना थी। 72 में मर्द, औरतें और 51 बच्चे शामिल थे। हजरत हुसैन की फौज में कई मासूम थे, जिन्होंने यह जंग लड़ी। हजरत हुसैन की फौज के कमांडर अब्बास इब्ने अली थे। उधर यजीद की फौज की कमान उमर इब्ने सअद के हाथों में थी। इस मौके पर कन्वीनर करबला शाहजमाल के मुतवल्ली मुख्तार जैदी, मुर्तजा जैदी, डॉ. इनायत अली, जुल्फिकार हुसैन, आबिद जैदी, डॉ. वसी जाफरी, नादिर नकवी, अहमर जैदी, इमरान जैदी, नासिर हुसैन, डॉ. काजिम आगा, डॉ. अहमद अब्बास, प्रो. परवेज कमर, डॉ. अली नवाज जैदी आदि मौजूद थे।
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