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व्हाइट फंगस की आहट से मेडिकल कॉलेज चौकन्ना, अलर्ट जारी
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ब्लैक फंगस के बाद अब व्हाइट फंगस की आहट से अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय का जेएन मेडिकल कॉलेज चौकन्ना हो गया है। इस संबंध में मेडिकल स्टाफ को अलर्ट जारी कर दिया गया है। हालांकि मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल प्रोफेसर शाहिद अली सिद्दीकी कहते हैं कि ब्लैक फंगस की तुलना में व्हाइट फंगस कम खतरनाक है।
वह बहुत ज्यादा घातक नहीं है। ब्लैक फंगस खतरनाक है। जेएन मेडिकल कॉलेज में अब ब्लैक फंगस के 11 मरीजों का उपचार चल रहा है। अभी तक किसी भी मरीज की आंख निकालने की स्थिति नहीं आई है। उम्मीद है कि सभी मरीज जल्दी स्वस्थ हो जाएंगे।
प्रिंसिपल प्रोफेसर शाहिद अली सिद्दीकी कहते हैं कि ब्लैक फंगस प्रभावित इलाके के टिशू में रक्त के प्रवाह को रोक देता है। जिससे वह हिस्सा काला पड़ने लगता है। इसके चलते ही इसको ब्लैक फंगस का नाम दिया गया है।
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ब्लैक फंगस हजारों वर्षों से मनुष्य के बीच में है, लेकिन कोविड-19 महामारी के नियंत्रण के दौरान मरीजों को ऑक्सीजन देने के क्रम में कुछ अशुद्धियों के चलते ब्लैक फंगस के मामले सामने आने शुरू हुए। इसके अलावा स्टेरॉयड और अन्य कारणों से भी ब्लैक फंगस के मामले सामने आए।
इसके विपरीत व्हाइट फंगस में ब्लड का प्रवाह नहीं रुकता है। यह एक प्रकार से प्रभावित क्षेत्र को मवाद युक्त करने का काम करता है। इसका तेजी से उपचार किया जा सकता है। इसीलिए यह ब्लैक फंगस की तुलना में कम खतरनाक है।
- जेएन मेडिकल कॉलेज में व्हाइट फंगस का अभी कोई भी मामला नहीं है। हम पूरी तरह से तैयार हैं। ब्लैक फंगस के 11 मामले जेएन मेडिकल कॉलेज में हैं। इन सभी का इलाज अच्छी तरह चल रहा है। सभी तेजी से रिकवरी कर रहे हैं। जल्द ही इनके स्वस्थ हो जाने की उम्मीद है। - प्रोफेसर शाहिद अली सिद्दीकी, प्रिंसिपल, जेएन मेडिकल कॉलेज
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वह बहुत ज्यादा घातक नहीं है। ब्लैक फंगस खतरनाक है। जेएन मेडिकल कॉलेज में अब ब्लैक फंगस के 11 मरीजों का उपचार चल रहा है। अभी तक किसी भी मरीज की आंख निकालने की स्थिति नहीं आई है। उम्मीद है कि सभी मरीज जल्दी स्वस्थ हो जाएंगे।
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प्रिंसिपल प्रोफेसर शाहिद अली सिद्दीकी कहते हैं कि ब्लैक फंगस प्रभावित इलाके के टिशू में रक्त के प्रवाह को रोक देता है। जिससे वह हिस्सा काला पड़ने लगता है। इसके चलते ही इसको ब्लैक फंगस का नाम दिया गया है।
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ब्लैक फंगस हजारों वर्षों से मनुष्य के बीच में है, लेकिन कोविड-19 महामारी के नियंत्रण के दौरान मरीजों को ऑक्सीजन देने के क्रम में कुछ अशुद्धियों के चलते ब्लैक फंगस के मामले सामने आने शुरू हुए। इसके अलावा स्टेरॉयड और अन्य कारणों से भी ब्लैक फंगस के मामले सामने आए।
इसके विपरीत व्हाइट फंगस में ब्लड का प्रवाह नहीं रुकता है। यह एक प्रकार से प्रभावित क्षेत्र को मवाद युक्त करने का काम करता है। इसका तेजी से उपचार किया जा सकता है। इसीलिए यह ब्लैक फंगस की तुलना में कम खतरनाक है।
- जेएन मेडिकल कॉलेज में व्हाइट फंगस का अभी कोई भी मामला नहीं है। हम पूरी तरह से तैयार हैं। ब्लैक फंगस के 11 मामले जेएन मेडिकल कॉलेज में हैं। इन सभी का इलाज अच्छी तरह चल रहा है। सभी तेजी से रिकवरी कर रहे हैं। जल्द ही इनके स्वस्थ हो जाने की उम्मीद है। - प्रोफेसर शाहिद अली सिद्दीकी, प्रिंसिपल, जेएन मेडिकल कॉलेज