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खैर में 45 साल तक लगातार रहे जाट विधायक

Sun, 14 Nov 2021 02:12 AM IST
अलीगढ़ ब्यूरो अमर उजाला/अलीगढ़
अमर उजाला/अलीगढ़ Published by: अलीगढ़ ब्यूरो Updated Sun, 14 Nov 2021 02:12 AM IST
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Khair 38 vidhan sabha 2022
अभिषेक शर्मा
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आजादी के बाद 1957 में अस्तित्व में आई टप्पल और अब खैर विधानसभा सीट पर जाट बहुल होने के कारण चौधरियों का कब्जा रहा है। इसी वजह से इसे जिले का दूसरा जाटलैंड भी कहा जाता है। लेकिन बसपा के सोशल इंजीनियरिंग फार्मूले ने चौधराहट पर ब्रेक लगाया और 2002 में बसपा के टिकट पर चुनाव लड़े ब्राह्मण नेता प्रमोद गौड़ ने जीत दर्ज की। हालांकि, 2007 में रालोद के चौ. सत्यपाल सिंह के सामने वे चुनाव हार गए। अनुसूचित जाति के लिए सीट आरक्षित होने के बाद से दो बार से अनुसूचित जाति के विधायक जीतकर विधानसभा पहुंच रहे हैं।
आजादी के बाद हुए चुनाव पर गौर करें तो खैर, चंडौस, टप्पल व जवां का इलाका एक विधानसभा का हिस्सा था और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मोहनलाल गौतम यहां से विधायक थे। 1957 में इसे अलग टप्पल सीट का दर्जा मिला और टप्पल क्षेत्र के गांव मालव के रहने वाले कांग्रेस नेता के चौ. देवदत्त सिंह विधयक बने। अगले चुनाव में उन्हें क्षेत्र के गांव खेड़ा किशनगढ़ के दूसरे जाट नेता चौ. महेंद्र सिंह ने निर्दल चुनाव लड़कर हरा दिया। इसके बाद इस सीट पर चौ. महेंद्र सिंह व स्यारौल के जाट नेता चौ. प्यारेलाल में वर्चस्व की जंग होती रही। 1967 में प्यारेलाल कांग्रेस से, 1969 में महेंद्र सिंह बीकेडी से, फिर 1974 में प्यारेलाल कांग्रेस से और अगली बार जेएनपी से चुनाव जीते। प्यारेलाल के पार्टी छोड़ जाने के कारण 1980 में कांग्रेस ने शिवराज सिंह को टिकट दिया और वे चुनाव जीते।
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1985 में चौ.चरण सिंह ने इलाके के उभरते नेता जगवीर सिंह को लोकदल से चुनाव लड़ाया और उन्होंने जीत दर्ज की। दूसरी बार वह जनता दल से चुनाव जीते। इसके बाद बीजेपी से महेंद्र सिंह ने 1991 में पहली बार जीत दर्ज की। मगर 1993 में जगवीर सिंह ने जनता दल से सीट कब्जाई। 1996 में बीजेपी ने चौ.चरण सिंह की बेटी ज्ञानवती को चुनाव लड़ाया और वे जीतीं। इसके बाद बसपा से प्रमोद गौड़, फिर रालोद से सत्यपाल सिंह, उसके बाद भगवती प्रसाद सूर्यवंशी और अब अनूप प्रधान बीजेपी से विधायक हैं।
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पार्टी संग अपनी छवि पर जीतते रहे यहां विधायक
राजनीतिक जानकार कहते हैं कि इस सीट पर जाटों के बीच चौ.चरण सिंह का प्रभाव रहा। इस वजह से शुरुआत में कांग्रेस, फिर बीकेडी, जेएनपी और हाल के दिनों में रालोद के विधायक रहे। मगर, यहां पार्टी के साथ-साथ निजी व्यवहार, संबंध और लोगों के बीच गहरी पैठ रखने वाले नेता विधायक बने हैं। मतलब लोगों के बीच जिसके बेहतर रिश्ते, उसका वर्चस्व रहा है।

सिर्फ प्यारेलाल और जगवीर सिंह बने दोबारा विधायक
इस सीट पर 1974 व 1977 में चौ.प्यारेलाल व 1985 व 1989 में जगवीर सिंह दोबारा विधायक बने हैं। इसके अलावा किसी विधायक को दूसरी बार जीत का स्वाद नहीं मिला है।
1952 में कांग्रेस से मोहनलाल गौतम (टप्पल, खैर, चंडौस, जवां संयुक्त विधानसभा क्षेत्र)
1957 में कांग्रेस से चौ. देवदत्त सिंह (टप्पल विधानसभा क्षेत्र बना)
1962 में निर्दल चौ. महेंद्र सिंह
1967 में कांग्रेस से चौ. प्यारेलाल (खैर विधानसभा क्षेत्र बना)
1969 में भारतीय क्रांति दल से चौ. महेंद्र सिंह
1974 में कांग्रेस से चौ. प्यारेलाल
1977 में जेएनपी से चौ. प्यारेलाल
1980 में कांग्रेस से चौ. शिवराज सिंह
1985 में लोकदल से चौ. जगवीर सिंह
1989 में जनता दल से चौ. जगवीर सिंह
1991 में बीजेपी से चौ. महेंद्र सिंह
1993 में जनता दल से चौ. जगवीर सिंह
1996 में भाजपा से ज्ञानवती सिंह पुत्री चौ. चरण सिंह
2002 में बसपा से प्रमोद गौड़
2007 में रालोद से चौ. सत्यपाल सिंह
2012 में रालोद से भगवती प्रसाद सूर्यवंशी
2017 में भाजपा से अनूप प्रधान
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