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नोटबंदी के बाद तो पड़ोसी भी मदद नहीं करते
अमर उजाला ब्यूूराे
Updated Tue, 13 Dec 2016 01:18 AM IST
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If the neighbors do not help after Notbandi
- फोटो : Rupesh
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साहब नोटबंदी के बाद पड़ोसी भी मद्द नहीं करते। फीस न दे पाने के कारण यूकेजी में पढ़ने वाले बेटे को स्कूल से निकाल दिया गया है। पांचवीं में पढ़ रही बेटी पर भी फीस भरने का दबाव बनाया जा रहा है। दुर्घटना में पति की टूटी टांग के इलाज के लिए पैसा नहीं है।
घर के बर्तन-भाड़े यहां तक कि मेरे जेवर तक बिक चुके हैं। पहले प्रधानजी की पहल पर आसपास के लोग इलाज समेत अन्य जरूरतों के लिए पैसा दे दिया करते थे। पर हाय रे नोटबंदी, इसके बाद वे खुद ही पाई पाई के मोहताज हैं। हमारी मद्द कहां से करेंगे।
यह व्यथा है अवंतीबाई वाली गली सारसौल निवासी 38 वर्षीय टेंपो चालक सोनू अग्रवाल की पत्नी प्रीति अग्रवाल की। उन्होंने बताया कि उसके पति टेंपो चलाते थे। हम लोग अवंतीबाई वाली गली सारसौल में किराये पर रहते थे। 21 मार्च 2016 को उनका विनीत मोटर्स के पास एक्सीडेंट हो गया। दुर्घटना में उनके दायें पैर में फ्रैक्चर हो गया।
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हमने उनका मेडिकल में इलाज कराया। इलाज में घर की जमा पूंजी, बर्तन भाड़े यहां तक कि मेरे जेवर भी बिक गए। करीब ढाई लाख रुपया खर्च होने के बाद भी पति की हालत जस की तस है। भूखों मरने की नौबत के बीच ग्राम प्रधान सारसौल सामने आए और उन्होंने आसपास के लोगों से चंदा करके घर के राशन पानी से लेकर इलाज तक में मद्द की, लेकिन नोटबंदी के बाद यह सुविधा भी छिन गई।
किसी के कहने पर उम्मीद एक किरण संस्था के दफ्तर गई थी। उन लोगों ने हमें खाने पीने का सामान दिला दिया है, लेकिन पति का इलाज अभी भी चुनौती बना हुआ है। रिश्तेदार व अड़ोसी पड़ोसी आते हैं। अपनत्व दिखाते हैं और चलते बनते हैं। मद्द कोई नहीं करता।
करें भी कैसे उनके सामने भी तो बैंक से रुपये न निकलने के कारण आर्थिक संकट है।
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घर के बर्तन-भाड़े यहां तक कि मेरे जेवर तक बिक चुके हैं। पहले प्रधानजी की पहल पर आसपास के लोग इलाज समेत अन्य जरूरतों के लिए पैसा दे दिया करते थे। पर हाय रे नोटबंदी, इसके बाद वे खुद ही पाई पाई के मोहताज हैं। हमारी मद्द कहां से करेंगे।
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यह व्यथा है अवंतीबाई वाली गली सारसौल निवासी 38 वर्षीय टेंपो चालक सोनू अग्रवाल की पत्नी प्रीति अग्रवाल की। उन्होंने बताया कि उसके पति टेंपो चलाते थे। हम लोग अवंतीबाई वाली गली सारसौल में किराये पर रहते थे। 21 मार्च 2016 को उनका विनीत मोटर्स के पास एक्सीडेंट हो गया। दुर्घटना में उनके दायें पैर में फ्रैक्चर हो गया।
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हमने उनका मेडिकल में इलाज कराया। इलाज में घर की जमा पूंजी, बर्तन भाड़े यहां तक कि मेरे जेवर भी बिक गए। करीब ढाई लाख रुपया खर्च होने के बाद भी पति की हालत जस की तस है। भूखों मरने की नौबत के बीच ग्राम प्रधान सारसौल सामने आए और उन्होंने आसपास के लोगों से चंदा करके घर के राशन पानी से लेकर इलाज तक में मद्द की, लेकिन नोटबंदी के बाद यह सुविधा भी छिन गई।
किसी के कहने पर उम्मीद एक किरण संस्था के दफ्तर गई थी। उन लोगों ने हमें खाने पीने का सामान दिला दिया है, लेकिन पति का इलाज अभी भी चुनौती बना हुआ है। रिश्तेदार व अड़ोसी पड़ोसी आते हैं। अपनत्व दिखाते हैं और चलते बनते हैं। मद्द कोई नहीं करता।
करें भी कैसे उनके सामने भी तो बैंक से रुपये न निकलने के कारण आर्थिक संकट है।