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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Aligarh News ›   Hindi Hain Hum : Aligarh SP city has attachment to mother tongue

#HindiHainHumः दिनकर की ‘बापू’ से प्रभावित होकर लिखी उजली मशाल

Fri, 14 Aug 2020 08:39 PM IST
Aligarh Bureau अलीगढ़ ब्यूरो
Updated Fri, 14 Aug 2020 08:39 PM IST
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Hindi Hain Hum : Aligarh SP city has attachment to mother tongue
अभिषेक। एसपी सिटी - फोटो : CITY OFFICE
अभिषेक शर्मा
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सीबीएसई के छात्र रहे आईपीएस अफसर एसपी सिटी अभिषेक को मातृभाषा से विशेष लगाव है। हाईस्कूल में उनको हिंदी में 83 फीसदी अंक मिले थे। इसके साथ ही उनकी दिलचस्पी हिंदी साहित्य की ओर बढ़ती गई। वह कहते हैं कि उच्च शिक्षा के लिए उन्हें इसी भाषा से प्रेरणा मिली, जब वह इसके साहित्य संसार से दो चार हुए। बोले.. हिंदी साहित्य जीवन और प्रेरणादायी रचनाओं से परिपूर्ण है। हिंदी के चिरपरिचित हस्ताक्षर प्रख्यात राष्ट्रीय कवि रामधारी सिंह दिनकर की अधिकांश रचनाएं उन्होंने पढ़ी हैं। परशुराम की प्रतिष्ठा, कुरुक्षेत्र, हुंकार आदि रचनाओं से उनका जीवन बेहद प्रभावित है। उच्च शिक्षा के दौर में उन्होंने जिंदगी की पहली कविता भी लिखी.. उजली मशाल जो दिनकर की चर्चित रचना बापू से प्रभावित है।
अमर उजाला फाउंडेशन के अभियान ‘हिंदी हैं हम’ के तहत आईपीएस अभिषेक ने बताया कि इंटरमीडिएट के बाद उन्होंने कालीकट से कंप्यूटर साइंस में बीटेक किया, बीटेक के बाद हैदराबाद में नौकरी की। इसी दरम्यान सिविल सर्विसेज की भी तैयारी शुरू कर दी। दूसरे प्रयास में रेलवे में आईपीआरएस में चयनित हुए। तीसरे प्रयास में वर्ष 2015 में आईपीएस चुने गए। पिता भारत भूषण झा कटिहार में प्रशासनिक सेवा में कार्यरत हैं। उन्होंने कहा कि हिंदी माध्यम बेहद सशक्त है। इसे कमजोर मानने वाले लोग अंग्रेजी माध्यम को बढ़ावा जरूर देते हों, लेकिन पढ़ाई की नींव मजबूत करने के लिए हिंदी का ज्ञान होना बहुत जरूरी है, क्योंकि बोलचाल और सामान्य जीवन में मिलने वाला व्यावहारिक ज्ञान जिंदगी में हमेशा काम आता है।
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हिंदी पुस्तक मेला, बोलचाल, पत्राचार में इसका प्रयोग अधिकाधिक हो। ऐसे ही कार्यक्रम भी होने चाहिए। उन्होंने कहा कि अमर उजाला समाचार पत्र समूह समय-समय पर सम सामयिक मुद्दों को बेहतर ढंग से जनता के बीच उठाता रहा है। आज हिंदी को महत्व देने की जरूरत है। जब फेसबुक से लेकर व्हाटसएप और दुनिया के सभी डिजिटल माध्यम अपने कारोबार को बढ़ाने के लिए हिंदी को पूरा सम्मान दे रहे हैं तो हमें भी अपनी मातृभाषा को मजबूत करना चाहिए।
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कविता- उजली मशाल
थी मही कांपती, अंग्रेजों के नित प्रचंड हुंकारों से,
थर-थर करती थी वसुधा, जिस साम्राज्य के अत्याचारों से,
सभ्यता स्वयं की श्रेष्ठ मान, जो फूले नहीं समाते थे,
पाखंड, भ्रांति से ग्रसित, स्वयं को प्रगति दूत बतलाते थे।
पाने सोने की चिड़िया को, ये व्यवसायों की आड़ लिए,
मुगलों को सम्मोहित करने, आए मैत्री का तार लिए,
किंतु प्रणय के छली, उन्हें विस्तार राज्य का करना था,
सत्तारूढ़ों में फूट डाल, राज्यों को उन्हें कुचलना था,
था सत्य निहित भी यही, वीरता रजवाड़ों के साथ गई,
बिखरा मुगलों का साम्राज्य और भारतमाता दास हुई।
जब हुआ अनय का नग्न-नाच, अंबर से एक किरण फूटी,
गांधी का रूप लिए समाज में एक नवीन लहर छूटी,
सत्य और अहिंसा का प्रतीक, गौरव का पूंजीभूत ज्वाल,
मैत्री, करुणा, विश्वास लिए, थी निकल पड़ी उजली मशाल।
ये गाथा जिसकी नींव निहित, शोषित अफ्रीकी देशों में,
वो देख रहा था मानवता का हनन, विरक्त निवेशों में,
मजदूर बंधुओं की ही क्या, व्यापारी भी अकुलाते थे,
निज को सभ्यता विहीन जान, अन्याय सहन कर जाते थे।
पर विशिष्टता गांधी की, शिक्षित थे पश्चिम शैली में,
मजदूरों के हित निकल पड़े, अग्रणी अहिंसा रैली में,
करुणा के प्रतिमूर्ति के, इस प्रथम युद्ध, पहले रण में,
कर विजय प्राप्त, बांधी सशक्त सुख-शान्ति डोर सबके मन में।
सन 1915 में, भारत रण का श्रीगणेश हुआ,
गांधी लौटे अफ्रीका से, पुलकित संपूर्ण स्वदेश हुआ,
चम्पारन, खेडा, गुजराती सब शांतिदूत के ऋणी हुए,
सत्य और अहिंसा की अद्भुत पूंजी को पाकर धनी हुए।
जिस साम्राज्य के शासन में, सूर्यास्त कभी न होता था,
धरती जलती अंगारों से , हर कृषक रात-दिन रोता था,
बापू ने सत्य-अहिंसा से उसकी आधारशिला तोड़ी,
असहयोग, सविनय अवज्ञा से बदहालों की हिम्मत जोड़ी।
अंग्रेजों के पाखंड और बर्बरता को दर्शाने को,
उनकी उदारता के असत्य की झलक हमें दिखलाने को,
अंग्रेजों का साम्राज्य मिटा आजादी हमें दिलाने को,
बापू निकले दो बूंद सुधा से जग की प्यास बुझाने को।
हो दांडी की यात्रा या हो भारत छोड़ो आंदोलन,
निर्दिष्ट पंथ पर तू निकला, पीछे-पीछे सब भारतगण,
हर बार तुझे दमने को गोरे शक्ति प्रदर्शन करते थे,
किन्तु नीति में निपुण, तुम्हारे पांव कभी न रुकते थे,
दे कदम-कदम पे मात, फिरंगी का घमंड तूने तोड़ा,
सो रही चेतना जागृत की व राष्ट्र एकसुत में जोड़ा।
हुआ देश आजाद अंतत: तेरे ही बलिदानों से,
दो वसन, एक सूखी लकड़ी से चले धैर्य के बाणों से,
जब सम्प्रदाय का व्याल उठा , डसने बंटती भारत मां को,
तब पिया हलाहल तूने ही, नूतन भारत के प्राणों से।
किन्तु मनुज के भाग्य भंवर में अपने हाथों छला गया,
मानवता का महासिन्धु पतवार छोड़ कर चला गया,
सबके पापों का बोझ उठा , अपने मस्तक जो चलता था,
छाती छेदी हमने उसकी, यसुदा का मोहन चला गया।
प्रायश्चित का इक अवसर दे, हे मानवता के प्रखर ज्वाल,
अपने शोणित से सींचेंगे बापू तेरी कीर्ति विशाल,
जो मूर्ख धर्म का करते हैं व्यवसाय स्वार्थ सिद्धि के हित,
दिखलाना है उनको जीवित है भारत की उजली मशाल।
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