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अलीगढ़ : मासूमों को दर्द दे रहा दिल, ऑपरेशन के लिए 855 कतार में
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कौशल कुमार ओझा
जेएन मेडिकल कॉलेज में जन्मजात हृदय रोग से पीड़ित 791 बच्चों के पिछले चार साल में ऑपरेशन किए गए, जबकि 855 मासूम कतार में हैं। आलम यह है कि इन बच्चों को दो से तीन महीने बाद ऑपरेशन की तारीख मिल रही है, जबकि सामान्य मरीजों की वेटिंग दो साल तक की है। दरअसल, यहां पर ऑपरेशन के लिए पूरे प्रदेश के साथ-साथ आसपास के राज्यों से भी बच्चे आते हैं। हालांकि, कोरोना काल में भी ऑपरेशन होते रहे, लेकिन पर्याप्त संसाधन न होेने के कारण मरीजों की कतार लंबी होती जा रही है। जेएन मेडिकल कॉलेज में बच्चों के दिल के औसतन 15 ऑपरेशन प्रति माह हो रहे हैं। ये ऑपरेशन राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत किए जा रहे हैं।
राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (आरबीएसके) के अंतर्गत उत्तर प्रदेश में जेएन मेडिकल कॉलेज के अतिरिक्त किंग जार्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी लखनऊ, एसजीपीजीआई लखनऊ और एसएसपीजीटीआई नोएडा में जन्मजात हृदय रोग से पीड़ित बच्चों के ऑपरेशन की सुविधा उपलब्ध है। लेकिन सबसे अधिक मरीज जेएन मेडिकल कॉलेज में आते हैं। यहां पर अलीगढ़ के अतिरिक्त हरदोई, पीलीभीत, जौनपुर, हाथरस, बुलंदशहर, आगरा, बदायूं, एटा, मथुरा, फिरोजाबाद, संभल, बाराबंकी, अमरोहा, बिजनौर, जालौन, लखीमपुर खीरी, बलरामपुर, बरेली, गोंडा, मैनपुरी, मऊ, मेरठ, शाहजहांपुर, रायबरेली आदि जनपदों से मरीज पहुंचते हैं। यही कारण है कि वर्तमान समय में यहां पर 855 से अधिक की वेटिंग है।
अब हार्ट ट्रांसप्लांट की तैयारी
राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम की टीम के सदस्यों का कहना है कि वाल्व रिपेयर सर्जरी जेएन मेडिकल कॉलेज को छोड़कर उत्तर भारत के किसी सरकारी अस्पताल में नहीं होती है। यहां पर एक दिन के बच्चे का भी ऑपरेशन होता है। मरीज का वजन जितना कम होता है, उसका ऑपरेशन उतना ही मुश्किल होता है। इसके अतिरिक्त स्विच ऑपरेशन, पल्मोनरी रूट ट्रांस लोकेशन, डबल स्विच ऑपरेशन भी होता है। सीआरआरटी मशीन एवं एक्सपर्ट उपलब्ध हैं। सर्जरी के बाद तीन से पांच प्रतिशत मरीजों की डायलिसिस की जरूरत पड़ती है। इस मशीन की वजह से मरीजों को दूसरी जगह नहीं भेजना पड़ता। कार्डियोथेरेसिक सर्जरी विभाग के अध्यक्ष प्रो. मोहम्मद आजम हसीन का कहना है कि अब हार्ट ट्रांसप्लांट की तैयारी की जा रही है। इससे संबंधित प्रक्रिया प्रारंभ कर दी गई है।
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61 लोगों की है टीम
कार्डियोथेरेसिक सर्जरी विभाग के अध्यक्ष प्रो. मोहम्मद आजम हसीन कहते हैं कि राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम के अंतर्गत यहां 61 लोगों की टीम है। कुछ डॉक्टर जेएन मेडिकल कॉलेज के हैं। इसके अतिरिक्त आरबीएसके के डॉक्टर व स्टाफ हैं। दरअसल ऑपरेशन का काम टीम वर्क है। सर्जरी टीम में डॉ. मोहम्मद आजम हसीन, डॉ. मयंक यादव, डॉ. शामयल रब्बानी एवं डॉ. सरताज गुरु हैं। पीडियाट्रिक कार्डियोलॉजी में डॉ. शाद अबकारी एवं डॉ. माज किदवई हैं। कार्डियक एनेस्थेटिक टीम में डॉ. सैयद शब्बीर अहमद, डॉ. दीप्ति चन्ना हैं। इसके अतिरिक्त डॉ. साबिर अली खान, इशाद कुरैशी, डॉ. फरोग एवं डॉ. आस्मा शामिल हैं।
राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम जन्मजात हृदय रोग से पीड़ित मासूमों के लिए वरदान है। 2018 से अब तक 791 बच्चों के हृदय का ऑपरेशन एवं छल्ले डाले गए हैं। कोविड के कारण ऑपरेशन एवं उपचार थोड़ा प्रभावित हुआ अन्यथा लाभार्थियों का आंकड़ा एक हजार से अधिक पहुंच गया होता। यदि मानव संसाधन व सुविधाएं बढ़ा दी जाएं तो वेटिंग काफी हद तक कम किया जा सकता है। टीम के सदस्य पूरी मेहनत से मरीजों की सेवा कर रहे हैं।
- प्रो. मोहम्मद आजम हसीन, कार्डियोथेरेसिक सर्जरी विभाग
राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत जेएन मेडिकल कॉलेज में पिछले चार साल में अलीगढ़ मंडल के 203 बच्चों के ऑपरेशन हुए हैं। इसके एवज में सवा दो करोड़ रुपये का भुगतान किया जा चुका है। करीब 80-90 लाख रुपये पेंडिंग है। इसी महीने उसका भी भुगतान कर दिया जाएगा। आरबीएसके के अंतर्गत हमलोग बच्चों का चयन कर ऑपरेशन के लिए भेजते हैं और बदले में जेएन मेडिकल कॉलेज को भुगतान करते हैं। जेएन मेडिकल कॉलेज पर दबाव अधिक है। कुछ नए मेडिकल कॉलेज को कार्यक्रम से जोड़ने पर यहां दबाव कम होगा। इसके लिए विभागीय स्तर पर प्रयास किया जाएगा।
- डॉ. एसके उपाध्याय, एडी हेल्थ, अलीगढ़
इनके ऑपरेशन होते हैं -
- दिल का छेद - एएसडी, वीएसडी
- शरीर नीला पड़ना - टीओएफ, डीओआरवी, टीजीए, टीएपीवीसी
- हार्ट वाल्व खराब होना - एमवीआर, एवीआर, डीवीआर, वाल्व रिपेयर
- खून की नसें सिकुड़ जाना - पल्मोनरी वॉल्व स्टेनोसिस
आरबीएसके की उपलब्धि
- हार्ट सर्जरी - 331 (फरवरी 2018 से फरवरी 2022 तक)
- दिल में छल्ले डाले गए - 460 (जनवरी 2018 से फरवरी 2022 तक)
- वेटिंग - 855 से ज्यादा
ये हैं केस
केस 1
लखनऊ के 19 महीने के आयत के दिल में छल्ले पड़े हैं। दिल का छेद छोटा होने पर छल्ला डाला गया है। आयत की मां हाशमी कहती हैं कि लखनऊ के चिकित्सकों ने जेएन मेडिकल कॉलेज में ऑपरेशन के लिए भेजा था।
केस 2
संभल जिले के बबराला निवासी 8 वर्षीय मुस्तफा का शरीर नीला पड़ जाता था। सांसें फूलने लगती थीं। चिकित्सकों ने सर्जरी कर ट्रेटालॉजी ऑफ फेलॉट (टॉफ रिपेयर) किया है। मुस्तफा की मुस्कुराहट देखकर परिवार खुश है।
केस 3
बदायूं के 14 साल के अमित बचपन से कई दिक्कतों का सामना कर रहे थे। दिल में छेद की वजह से चेहरा नीला पड़ जाता था। नसें फूल जाती थीं। भाई हरिकिशन कहते हैं कि ऑपरेशन के बाद अमित अच्छा महसूस कर रहा है।
केस 4
बलरामपुर के 8 वर्ष के रवि को वहां के जिला अस्पताल से जेएन मेडिकल कॉलेज रेफर किया गया था। दिल में छेद की वजह से शरीर नीला पड़ जाता था। खाना शरीर में लगता नहीं था। थोड़ा सा चलने फिरने पर हांफने लगता था।
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जेएन मेडिकल कॉलेज में जन्मजात हृदय रोग से पीड़ित 791 बच्चों के पिछले चार साल में ऑपरेशन किए गए, जबकि 855 मासूम कतार में हैं। आलम यह है कि इन बच्चों को दो से तीन महीने बाद ऑपरेशन की तारीख मिल रही है, जबकि सामान्य मरीजों की वेटिंग दो साल तक की है। दरअसल, यहां पर ऑपरेशन के लिए पूरे प्रदेश के साथ-साथ आसपास के राज्यों से भी बच्चे आते हैं। हालांकि, कोरोना काल में भी ऑपरेशन होते रहे, लेकिन पर्याप्त संसाधन न होेने के कारण मरीजों की कतार लंबी होती जा रही है। जेएन मेडिकल कॉलेज में बच्चों के दिल के औसतन 15 ऑपरेशन प्रति माह हो रहे हैं। ये ऑपरेशन राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत किए जा रहे हैं।
राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (आरबीएसके) के अंतर्गत उत्तर प्रदेश में जेएन मेडिकल कॉलेज के अतिरिक्त किंग जार्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी लखनऊ, एसजीपीजीआई लखनऊ और एसएसपीजीटीआई नोएडा में जन्मजात हृदय रोग से पीड़ित बच्चों के ऑपरेशन की सुविधा उपलब्ध है। लेकिन सबसे अधिक मरीज जेएन मेडिकल कॉलेज में आते हैं। यहां पर अलीगढ़ के अतिरिक्त हरदोई, पीलीभीत, जौनपुर, हाथरस, बुलंदशहर, आगरा, बदायूं, एटा, मथुरा, फिरोजाबाद, संभल, बाराबंकी, अमरोहा, बिजनौर, जालौन, लखीमपुर खीरी, बलरामपुर, बरेली, गोंडा, मैनपुरी, मऊ, मेरठ, शाहजहांपुर, रायबरेली आदि जनपदों से मरीज पहुंचते हैं। यही कारण है कि वर्तमान समय में यहां पर 855 से अधिक की वेटिंग है।
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अब हार्ट ट्रांसप्लांट की तैयारी
राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम की टीम के सदस्यों का कहना है कि वाल्व रिपेयर सर्जरी जेएन मेडिकल कॉलेज को छोड़कर उत्तर भारत के किसी सरकारी अस्पताल में नहीं होती है। यहां पर एक दिन के बच्चे का भी ऑपरेशन होता है। मरीज का वजन जितना कम होता है, उसका ऑपरेशन उतना ही मुश्किल होता है। इसके अतिरिक्त स्विच ऑपरेशन, पल्मोनरी रूट ट्रांस लोकेशन, डबल स्विच ऑपरेशन भी होता है। सीआरआरटी मशीन एवं एक्सपर्ट उपलब्ध हैं। सर्जरी के बाद तीन से पांच प्रतिशत मरीजों की डायलिसिस की जरूरत पड़ती है। इस मशीन की वजह से मरीजों को दूसरी जगह नहीं भेजना पड़ता। कार्डियोथेरेसिक सर्जरी विभाग के अध्यक्ष प्रो. मोहम्मद आजम हसीन का कहना है कि अब हार्ट ट्रांसप्लांट की तैयारी की जा रही है। इससे संबंधित प्रक्रिया प्रारंभ कर दी गई है।
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कार्डियोथेरेसिक सर्जरी विभाग के अध्यक्ष प्रो. मोहम्मद आजम हसीन कहते हैं कि राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम के अंतर्गत यहां 61 लोगों की टीम है। कुछ डॉक्टर जेएन मेडिकल कॉलेज के हैं। इसके अतिरिक्त आरबीएसके के डॉक्टर व स्टाफ हैं। दरअसल ऑपरेशन का काम टीम वर्क है। सर्जरी टीम में डॉ. मोहम्मद आजम हसीन, डॉ. मयंक यादव, डॉ. शामयल रब्बानी एवं डॉ. सरताज गुरु हैं। पीडियाट्रिक कार्डियोलॉजी में डॉ. शाद अबकारी एवं डॉ. माज किदवई हैं। कार्डियक एनेस्थेटिक टीम में डॉ. सैयद शब्बीर अहमद, डॉ. दीप्ति चन्ना हैं। इसके अतिरिक्त डॉ. साबिर अली खान, इशाद कुरैशी, डॉ. फरोग एवं डॉ. आस्मा शामिल हैं।
राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम जन्मजात हृदय रोग से पीड़ित मासूमों के लिए वरदान है। 2018 से अब तक 791 बच्चों के हृदय का ऑपरेशन एवं छल्ले डाले गए हैं। कोविड के कारण ऑपरेशन एवं उपचार थोड़ा प्रभावित हुआ अन्यथा लाभार्थियों का आंकड़ा एक हजार से अधिक पहुंच गया होता। यदि मानव संसाधन व सुविधाएं बढ़ा दी जाएं तो वेटिंग काफी हद तक कम किया जा सकता है। टीम के सदस्य पूरी मेहनत से मरीजों की सेवा कर रहे हैं।
- प्रो. मोहम्मद आजम हसीन, कार्डियोथेरेसिक सर्जरी विभाग
राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत जेएन मेडिकल कॉलेज में पिछले चार साल में अलीगढ़ मंडल के 203 बच्चों के ऑपरेशन हुए हैं। इसके एवज में सवा दो करोड़ रुपये का भुगतान किया जा चुका है। करीब 80-90 लाख रुपये पेंडिंग है। इसी महीने उसका भी भुगतान कर दिया जाएगा। आरबीएसके के अंतर्गत हमलोग बच्चों का चयन कर ऑपरेशन के लिए भेजते हैं और बदले में जेएन मेडिकल कॉलेज को भुगतान करते हैं। जेएन मेडिकल कॉलेज पर दबाव अधिक है। कुछ नए मेडिकल कॉलेज को कार्यक्रम से जोड़ने पर यहां दबाव कम होगा। इसके लिए विभागीय स्तर पर प्रयास किया जाएगा।
- डॉ. एसके उपाध्याय, एडी हेल्थ, अलीगढ़
इनके ऑपरेशन होते हैं -
- दिल का छेद - एएसडी, वीएसडी
- शरीर नीला पड़ना - टीओएफ, डीओआरवी, टीजीए, टीएपीवीसी
- हार्ट वाल्व खराब होना - एमवीआर, एवीआर, डीवीआर, वाल्व रिपेयर
- खून की नसें सिकुड़ जाना - पल्मोनरी वॉल्व स्टेनोसिस
आरबीएसके की उपलब्धि
- हार्ट सर्जरी - 331 (फरवरी 2018 से फरवरी 2022 तक)
- दिल में छल्ले डाले गए - 460 (जनवरी 2018 से फरवरी 2022 तक)
- वेटिंग - 855 से ज्यादा
ये हैं केस
केस 1
लखनऊ के 19 महीने के आयत के दिल में छल्ले पड़े हैं। दिल का छेद छोटा होने पर छल्ला डाला गया है। आयत की मां हाशमी कहती हैं कि लखनऊ के चिकित्सकों ने जेएन मेडिकल कॉलेज में ऑपरेशन के लिए भेजा था।
केस 2
संभल जिले के बबराला निवासी 8 वर्षीय मुस्तफा का शरीर नीला पड़ जाता था। सांसें फूलने लगती थीं। चिकित्सकों ने सर्जरी कर ट्रेटालॉजी ऑफ फेलॉट (टॉफ रिपेयर) किया है। मुस्तफा की मुस्कुराहट देखकर परिवार खुश है।
केस 3
बदायूं के 14 साल के अमित बचपन से कई दिक्कतों का सामना कर रहे थे। दिल में छेद की वजह से चेहरा नीला पड़ जाता था। नसें फूल जाती थीं। भाई हरिकिशन कहते हैं कि ऑपरेशन के बाद अमित अच्छा महसूस कर रहा है।
केस 4
बलरामपुर के 8 वर्ष के रवि को वहां के जिला अस्पताल से जेएन मेडिकल कॉलेज रेफर किया गया था। दिल में छेद की वजह से शरीर नीला पड़ जाता था। खाना शरीर में लगता नहीं था। थोड़ा सा चलने फिरने पर हांफने लगता था।

मुस्तफा।- फोटो : CITY OFFICE

8 वर्षीय रवि।- फोटो : CITY OFFICE