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शिक्षाविद् बोले खुलकर: सत्संग, उर्स जैसे धार्मिक आयोजनों के लिए सरकार बनाए गाइडलाइन
Fri, 05 Jul 2024 03:08 PM IST
चमन शर्मा
अमर उजाला नेटवर्क, अलीगढ़
अमर उजाला नेटवर्क, अलीगढ़
Published by: चमन शर्मा
Updated Fri, 05 Jul 2024 03:08 PM IST
सार
अलीगढ़ के शिक्षाविदों ने धार्मिक अनुष्ठान पर सरकार को गाइडलाइन बनाने की बात कही। उन्होंने कहा कि अध्यात्म के नाम पर मूर्ख बनाने का खेल चल रहा है। ऐसे आयोजनों में ज्यादा भीड़ नहीं जुटने देनी चाहिए।
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साकार हरि के सत्संग में अनुयायी
- फोटो : संवाद
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विस्तार
सत्संग, उर्स, मजार हो या अन्य धार्मिक अनुष्ठान। इसके लिए सरकार को मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) तय करना चाहिए। अध्यात्म के नाम पर मूर्ख बनाने का खेल चल रहा है। ऐसे आयोजनों में ज्यादा भीड़ नहीं जुटने देनी चाहिए। यह कहना है शहर के शिक्षाविदों का।
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उर्स को मेला बनाकर रख दिया गया है। यह खेल-तमाशा देखने और खरीदारी के लिए नहीं बल्कि साहिब-ए-मजार की जियारत के लिए जाना चाहिए। जहां हुल्लड़ बाजार होगा, वहां कानून व्यवस्था खराब होगी। ऐसे आयोजनों को लोगों ने धंधा बना लिया है। - डॉ. अहमद मुज्तबा सिद्दीकी, असिस्टेंट प्रोफेसर, भूगोल विभाग, एएमयू
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अंधविश्वास इसलिए बढ़ रहा रहा है, क्योंकि लोगों को सच्चाई की जानकारी नहीं है। लोग हर काम चमत्कार से करना चाहते हैं। उनकी सोच होती है कि फलां व्यक्ति के पास चले जाएंगे तो उनका काम जल्दी हो जाएगा। बीमारी ठीक हो जाएगी। हर व्यक्ति अपने स्वार्थ में लिप्त है। - डॉ. रक्षपाल सिंह, शिक्षाविद्
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ऐसे कार्यक्रमों में भीड़ होती है, लेकिन इंतजाम नहीं होता है। जो शातिर दिमाग के होते हैं, वे लोगों को गुमराह करके अपनी ताकत और चमक-दमक दिखाने के लिए इस तरह का आडंबर बनाते हैं। मौलवियों के ताबीज के चक्कर में पड़ना भी गलत है। - हाफिज चौधरी इफराहीम हुसैन, राष्ट्रीय अध्यक्ष, भारतीय समाजसेवक संगठन
उर्स में दीनी हिदायत के लिए कोई जाता है, जाए। कोई भी व्यक्ति खुद को ईश्वर का अवतार या खुदा तक पहुंच रखने की बात करे तो वह झूठ बोल रहा है। ऐसे लोगों का बहिष्कार करना चाहिए। कोई सदाचार सिखाने की बात करता है, तो उस कार्यक्रम में जाना चाहिए। - प्रो. मुफ्ती मोहम्मद जाहिद, पूर्व अध्यक्ष, सुन्नी थियोलॉजी, एएमयू
अपनी समस्या के निराकरण के मकसद से जो सत्संग में पहुंचते हैं उनका अवसाद कैसे कम हो, इस पर वह काफी चिंतित दिखते हैं। सत्संग में भीड़चाल भी देखी जा सकती है। फलां जा रहा है तो वह भी चलेंगे। संत या बाबा को भी यह सोचना होगा कि जितनी जगह है, उतने लोगों को बुलाएं। - प्रो. सपना सिंह, समाजशास्त्री
सत्संग में व्यक्ति अपनी आत्मिक संतुष्टि के लिए जाता है। जो बातें संत या बाबा कहते हैं, लोग उनकी बातों से अपने आपको जोड़ लेते हैं। जब वह जुड़ जाते हैं तो सोचते हैं उनके साथ बेहतर होगा। ऐसा वह विश्वास बना लेते हैं कि उनके दुखों का हरण हो जाएगा। - प्रो. मंजू सिंह, मनोविज्ञानी