Gambhira Kila: बचा लो धरोहर, नहीं तो किस्सों में ही सुना करेंगे... एक था गंभीरा किला
सहारनपुर से आए दो भाइयों डामर सिंह और विजयपाल सिंह ने 16वीं और 17 वीं शताब्दी के बीच किले और विजयगढ़ कस्बे का निर्माण कराया था। इस कस्बे को बसाने वाले राजा विजयपाल सिंह का किला बिस्मार हो गया।
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ऐतिहासिक धरोहर और 400 साल के इतिहास का अतीत समेटे गंभीरा किला उपेक्षा की गर्त में दब गया है। एक खेड़े के रूप में इसके जो अवशेष बचे भी हैं, वह धीरे-धीरे मिट रहे हैं। यहां कब्जे और खेती हो रही है। यही हाल रहा तो किस्से कहानियों में ही यह किला रह जाएगा।
वैद्यों की नगरी के रूप में विजयगढ़ की आज देशभर में पहचान है। इस कस्बे को बसाने वाले राजा विजयपाल सिंह का किला बिस्मार हो गया। साल 1909 में अलीगढ़ के तत्कालीन कलक्टर एचआर नेविल ने गजेटियर में इसका उल्लेख किया है और बताया है कि यह स्थान पहले गंभीरा था। यहां पलाश का जंगल हुआ करता था।
सहारनपुर से आए दो भाइयों डामर सिंह और विजयपाल सिंह ने 16वीं और 17 वीं शताब्दी के बीच किले और विजयगढ़ कस्बे का निर्माण कराया था। हिस्ट्रीकल सर्वे ऑफ अलीगढ़ डिस्ट्रिक्ट में भी एएमयू के इतिहासकार जमाल मोहम्मद सिद्दीकी ने लिखा है कि किले में पूरब और पश्चिमी दिशा में दो मजबूत दरवाजे थे। सुरक्षा के लिहाज से इसके चारों तरफ गहरी खाई थी।
किले की पश्चिमी दिशा में वीरेश्वर मंदिर का निर्माण कराया, पूर्वी द्वार पर गंभीरा देवी और किले के बीच में अपनी कुलदेवी नौ चौकियां के मंदिर का निर्माण कराया। मानिकपुर निवासी 80 वर्षीय बुजुर्ग कुंवरपाल सिंह कहते हैं कि बुजुर्गों से इसका इतिहास सुनते आए हैं, आज इसकी दुर्दशा देख दुख होता है। नीरज गोयल और श्यौप्रसाद भी इसे संरक्षित करने की मांग करते हैं।

पहले राजा के वंशजों ने किले की कुछ जमीन के पट्टे कर दिए, बाद में लेखपालों ने। कुछ कब्जे भी हुए हैं। नगर पंचायत की सीमा विस्तार का प्रस्ताव शासन को भेजा गया है, वह मंजूर हो जाता है तो किला नगर पंचायत क्षेत्र में आ जाएगा और इसे संरक्षित कराने का प्रयास किया जाएगा।-अनिल कुमार तिवारी, अध्यक्ष नगर पंचायत विजयगढ़
मंदिर में लगे हैं पाली भाषा के दो शिलालेख
किले का संरक्षण होना चाहिए, किले के पास स्थित वीरेश्वर मंदिर का जीर्णोद्धार हमने कराया है। मंदिर में दो पुराने शिलालेख भी लगे हैं। उनके फोटो दिल्ली विवि में भेजकर जानकारी कराई तो पता चला कि शिलालेख पाली भाषा में हैं और करीब 400 साल पुराने हैं। किले की खोदाई कराई जाए तो और बहुत सी जानकारी मिल सकती है।-वैद्य गोपाल शरण गर्ग
विजयगढ़ का किला भारतीय पुरातत्व विभाग के संरक्षण में नहीं है। इसके स्वामित्व के संबंध में तस्वीर साफ करने के लिए दस्तावेज निकलवाए गए हैं। किले का कितना भूभाग है, यह दस्तावेजों की जांच से पता चलेगा। अवैध कब्जे हैं तो जांच कर उन्हें हटवाया जाएगा।-दिग्विजय सिंह, एसडीएम कोल
भारी नुकसान उठाने के बाद अंग्रेजों ने फतह किया किला
18वीं शताब्दी में ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारतीय रियासतों और किलों पर कब्जा करना शुरू किया तो उनकी नजर से गंभीरा किला भी नहीं बचा। लड़ाई में उन्हें भारी नुकसान भी उठाना पड़ा था और उनकी सेना का एक कर्नल इस युद्ध में मारा गया था। इतिहासकारों की माने तो गंभीरा किले पर कब्जे के लिए पहला युद्ध 1756 ईसवी में हुआ था। तब भरतपुर के राजा सूरजमल ने मराठों के सहयोग से इस किले को जीत लिया और इसे मुरसान के राजा भगवंत सिंह को सौंप दिया था।
एक दिसंबर 1803 को ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना के कर्नल ब्लेयर ने सासनी किले को घेर लिया। तीन जनवरी को अंग्रेजी सेना के चीफ जनरल भी अपनी सेना के साथ ब्लेयर से मिल गए और 28 जनवरी को किले पर आक्रमण बोल दिया। राज भगवंत सिंह ने उनका डटकर मुकाबला किया। करीब दस दिन चली लड़ाई के बाद अंग्रेजों का सासनी किले पर कब्जा हो गया।
आठ फरवरी को उन्होंने विजयगढ़ पर हमला बोल दिया था और 14 फरवरी को इसे फतह कर लिया था। इस लड़ाई में कर्नल गोर्डन मारा गया था। किले के पश्चिम में उसकी कब्र बनवाई गई थी। विजयगढ़ किला जीतने के बाद 23 फरवरी को अंग्रेजों ने कचौरी किला भी फतेह कर लिया था। 1805 में राजा मानिक सिंह ने अंग्रेजों से इस किले को वापस ले लिया था। उनकी मृत्यु के बाद कोल के एक व्यापारी मानसिंह, नील व्यापारी ओजी सांडर्स के स्वामित्व में भी गया। बाद में फिर से विजयपाल सिंह के वंशजों के पास आ गया।