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ईद की सामूहिक नमाज नहीं तों 'नमाज ए चाश्त' पढ़ें सब लोग

Sat, 23 May 2020 01:06 AM IST
Aligarh Bureau अलीगढ़ ब्यूरो
Updated Sat, 23 May 2020 01:06 AM IST
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Everyone should follow social distancing during namaj.
छतारी कंपाउंड में जुमा अलविदा की नमाज अदा करते अकीकदमंद। - फोटो : CITY OFFICE
आशीष निगम
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शुक्रवार 22 मई का दिन पूरी दुनिया के इतिहास में दर्ज हो गया है। जब पहली बार जुमा अलविदा पर दुनिया भर में सन्नाटा छाया रहा। शहर में भी वो रौनक नहीं दिखी जो हर साल देखी जाती थी। लोगों को पूरे साल इस दिन का बेसब्री से इंतजार रहता है। जुमा, जुमा अल विदा, चांद रात और ईद के दिन-रात में शहर की रौनक देखने के लिए आसपास के शहरों से भी लोग दौड़े चले आते थे, लेकिन कोरोना संक्रमण काल ने सब कुछ बदल कर रख दिया है।
शुक्रवार को जुमा अल विदा की नमाज भी कुछ ऐेसे ही बदले हुए रूप में सन्नाटे के साथ गुजर गई। शहर मुफ्ती खालिद हमीद ने अपने ऊपरकोट स्थित घर पर परिजनों के साथ ही जुम अलविदा की नमाज अदा की। उन्होंने रोजेदारों और लाखों मुसलमानों से अपील की है कि वह हर हाल में फिलहाल घर पर ही नमाज पढ़े। ईद पर मुसाफा (मुसाफा यानी लोगों से हाथ मिलाना या गले मिलना) न करें। अबकी बार की ईद-उल-फितर पर Óनमाज ए चाश्तÓ पढ़ें। शहर मुफ्ती बोले कि जब जुमा, जुमा अलविदा या ईद की नमाज मस्जिद में न हो सके तो इस्लाम में इसके लिए अलग से इंतजाम है। ऐसा इसलिए है कि ईद और जुमे की की नमाज के लिए ईमाम के साथ कम से कम तीन लोग मौजूद रहने चाहिए, क्योंकि इसमें कु तबा (अलग से पढ़ी जाने वाली दुआ) पढ़ा जाता है। अगर ऐसा नहीं है तो 'नमाज ए चाश्तÓ पढ़ी जाती है। जिसमें एक अकीकदमंद नमाज के दो-दो रकते लगातार दो बार में पढ़ता है। चार रकते पूरे होने पर ईद की नमाज का पूरा शबाब मिलता है। इस बार इसी कायदे के तहत लोग घरों में ईद की नमाज करें। जिससे उनको पूरा शबाब मिलेगा।
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नमाज ए चाश्त पांच वक्त की नमाज से अलग है। रोजेदारों को इसके साथ ही पांच वक्त की रोजाना नमाज भी अदा करनी चाहिए। शहर मुफ्ती ने आगे फरमाया कि ईद की नमाज से पहले साहब ए निसाब (रसूखदार पैसे वाले लोग) और साहब ए हैसियत (जमीन जयदाद और पैसे से धनी लोग) अपनी हैसियत के अनुसार परिवार, खानदान, रिश्तेदार, पड़ोसी और आसपास के मोहल्लों में जकात दें, क्योंकि इस बार कोरोना काल में लोगों की कमाई बंद है। इसलिए दिल खोल कर जरूरतंदम की मदद करें, ताकि किसी गरीब का त्योहार फीका न पड़े। हर किसी का त्योहार मन सके। शहर मुफ्ती ने बृहस्पतिवार को ही जुमा अलविदा की नमाज घर से ही पढने की अपील की थी। जिसका व्यापक असर दिखा।
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शहर की तमाम मस्जिदों में लोग नहीं आए। सभी ने घर पर ही नमाज पढ़ी और रोजा पूरा किया। शाम को इफ्तार के वक्त परिवार, खानदान और पड़ोस के लोगों के साथ सोशल डिस्टेंशिंग के साथ रोजा इफ्तार हुआ। शहर मुफ्ती के करीबी समाजसेवी गुलजार ने बताया कि जामा मस्जिद के इमाम मेहमूद उल हसन ने वहां जुमा अल विदा की नमाज अदा कराई। जिसमें मस्जिद के खास लोग ही शामिल हो पाए। जामा मस्जिद में इनकी कुल तादाद पांच के आसपास रही। कमोबेश शहर की दूसरी मस्जिदों में भी ऐसा ही नजारा देखा गय।
जीवन का पहला रोजा
जमालपुर निवासी एएमयू एबीके हाईस्कूल में पढने वाले छात्र मोहम्मद वजीह सिद्दीकी ने अलविदा जुमे के दिन अपनी जिंदगी का पहला रोजा रखा। लॉकडाउन की वजह से रिश्तेदार और दोस्त नहीं आ सके, लेकिन घरवालों ने वजीह की हौसलाअफजाई की। वजीह के दादा ने सबको पैसे और मिठाई बांटी। हुमेरा पुत्री अलीजान निवासी शाहजमाल ने अपना पहला रोजा जुमा अलविदा पर रखा। घरवालों ने उसकी हौसला अफजाई की। बच्ची को पहला रोजा रखने के बाद सभी ने मुबारकबाद दी।

घर पर अदा की नमाज
मोहल्ला छतारी कंपाउंड रसल गंज में समाज सेवी हाजी ए समी खां के निवास स्थान समर विला में उनके परिवार के सदस्यों ने नमाज अदा की। नमाज जुनैद अमीन द्वारा पढ़ाई गई। पहले जुमा अलविदा का खुतबा हुआ और उसके बाद नमाज अदा हुई। नमाज के बाद मुल्क व कौम की सलामती और कोरोना बीमारी के खात्मे के लिए खुदा से दुआ मांगी गई। यहां पर मो. आदिल अख़्तर, मसूद अख़्तर, जीशान समी, इंतिखाब समी, फऱाज मसूद आदि मौजूद रहे।
पांच वक्त की नमाज
1-सुबह पांच से और सूर्य निकलने से पहले तक फ्रज।
2-दोपहर एक बजे से ढाई बजे तक जौहर।
3-शाम सवा पांच बजे से साढ़े पांच बजे असर।
4-शाम सात बजे और इफ्तार के बाद मगरिब।
5-रात आठ से साढ़े आठ बजे तक इशा।
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