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‘लिफाफे’ से चलती है जीवन की गाड़ी  

Thu, 19 Jul 2018 01:50 AM IST
न्यूूज डेस्क, अमर उजाला, अलीगढ़।
न्यूूज डेस्क, अमर उजाला, अलीगढ़। Updated Thu, 19 Jul 2018 01:50 AM IST
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'Envelope' walks life car
‘लिफाफे’ से चलती है जीवन की गाड़ी   - फोटो : Rupesh
उत्तर प्रदेश में पॉलिथीन पर प्रतिबंध लगने से कागज के लिफाफे (कागज के छोटे-बड़े थैले) बनाने वाली महिलाओं की आमदनी में वृद्धि की उम्मीद है। खासकर थाना देहली गेट के पास स्थित कैलाश गली एवं उसके आसपास के खटीकन मोहल्ला की महिलाओं के चेहरे पर चमक दिखाई देने लगी है। इस मोहल्ले एवं आसपास के दर्जनों घरों में लिफाफे बनाने के कार्य होते है। इसकी कमान घर की महिलाओं के हाथ में है। बाजार में अचानक मांग बढ़ने के बाद ठेकेदार से लेकर दुकानदार तक इनके पास थैले के लिए पहुंचने लगे हैं। पहले तो सीमित संख्या में आर्डर आते थे। पॉलिथीन प्रतिबंधित होने के बाद उसका दायरा बढ़ने की उम्मीद है। अब सब्जी, फल, जनरल स्टोर, बेकरी, किराना स्टोर, आइसक्रीम पार्लर, रेस्टोरेंट, होटल एवं फूड कार्नर आदि में कैलाश गली में तैयार थैले जाने की उम्मीद है। जाहिर है काम बढ़ने से आमदनी भी बढ़ने की उम्मीद है। 
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पन्नी बंद होने से फायदा होगा
कैलाश गली के सामने स्थित खटिकान मोहल्ले की लक्ष्मी देवी पिछले तीस वर्ष से लिफाफा बनाकर परिवार की गाड़ी खींच रही है। इनके पांच बच्चे है। एक बेटी एवं दो बेटों की शादी कर चुकी है। दो बेटे दूसरी जगह काम कर रहे हैं। पति भी नहीं रहे। सीढ़ी से गिरने के कारण पैर टूट गया है। लेकिन बच्चों की परवरिश के लिए बिना आराम किये लिफाफा बनाने में जुटी रहती है। वह कहती है कि पैर ठीक था तो बाजार से पुराने अखबार खरीद कर लाती थी और लिफाफा बनाकर बेच देती थी। अब किसी से पुराने अखबार मंगाती हूं। उन्होंने बताया कि पन्नी बंद होने से लिफाफा की मांग बढ़ गई है। अब सोच रही हूं कि आर्डर पूरा करने के लिए दूसरों से मदद लू और लिफाफा बनवाऊं।
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मजदूरी पर लिफाफा बनाती है दुलारी
कैलाश गली की 75 वर्षीय दुलारी 60 वर्ष से अधिक समय से लिफाफा बना रही हैं। वर्तमान समय में वह मजदूरी पर लिफाफा बनाती हैं। ठेकेदार उन्हें कागज देकर जाते हैं। लेई बनाकर वह लिफाफा बनाती है। एक गड्डी (16 लिफाफा) बनाने पर उन्हें 50 पैसे मिलते हैं और 10 गड्डी बनाने पर 5 रुपये। बुजुर्ग दुलारी के दोनो आंखों में लेंस पड़े है। वह कहती है कि मजदूरी पर काम करने के कारण दूसरों की तुलना में उन्हें बहुत कम आमदनी होता है। दिन भर में मुश्किल से 25 से 30 रुपये तक कमाती है। आमदनी बढ़ाने के लिए उन्होंने अपने घर में ही छोटी-मोटी दुकान खोल रखी हैं। वह कहती है कि इस काम में बहुत मेहनत है। लेकिन जीने के लिए कुछ तो करना पड़ेगा। पन्नी बंद होने से बहुत लोगों को फायदा होगा।     
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