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सूखते ताल, घटते वन, कैसे हरा-भरा रहे धरती का मन

Fri, 22 Apr 2016 01:52 AM IST
अनुज शर्मा
अनुज शर्मा Updated Fri, 22 Apr 2016 01:52 AM IST
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Drying rhythm , decreasing forest , how are the green heart of the earth
पृथ्वी िदवस - फोटो : महीपाल ‌सिंह
पेड़ पानी की बगिया हैं। जहरीली गैस से बचाने वाले मॉस्क हैं। ग्लोबल वार्मिंग से बचाने वाली छतरी हैं। अपने जिले में पानी की बगिया ‘सूख’ रही है। मॉस्क फट रहा है। हीटअप से बचाने वाली छतरी की ‘तानें’ टूट रही हैं। अलीगढ़ में कंक्रीट का क्षेत्र बढ़ा है। इससे पौधरोपण के भी बाद वनों का क्षेत्र घट रहा है। ऐसे में अपने जिले की ‘पृथ्वी’ कैसे बचेगी? यह कोई नहीं सोच रहा है। कुआं से लेकर तालाब तक सूखे हैं। दोनों का अस्तित्व खतरे में है। सुप्रीम कोर्ट सख्त है। सरकार भी पैसा खूब दे रही है, बावजूद इसके जिले की जमीन हरियाली से दूर हो रही है। पारिस्थकीय चक्र इस तरह गड़बड़ा गया है कि वन क्षेत्र में भी पशु पक्षी प्यासे-भूखे हैं। पौध रोपण अभियान कागजों में ही सफल हो रहे हैं। अब तो स्थिति यह है कि जिले में जमीन तक कम पड़ गई है। जंगल के आसपास पानी के स्रोत नहीं। जंगली जानवरों के लिए जल स्रोत बंजर हो गए हैं।
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साहबों की सियासत में पेड़ बने डूंठ, हरियाली गई रूठ
अधिकारियों की आपसी ‘सियासत ’ पेड़ों को कैसे डूठ बनाती है, गुरुसिकरन इसका जीवंत उदाहरण है। वन विभाग को गुरु सिकरन वन क्षेत्र में नाबार्ड से 19950 पौधे रोपने थे। यह क्षेत्र शहर केे सबसे नजदीक का वन क्षेत्र है। यहां यह अभियान सफल हो जाता तो जिले का तापमान और पर्यावरण देानों में बड़ा बदलाव आता। मानसून के आरंभ में ही चार से छह फीट लंबे पौधे रोप दिए जाने थे। हुआ इसका उल्टा। पहले तो वन विभाग और पशु पालन विभाग में जमीन पर हक किसका है इसको लेकर जंग छिड़ी। मामला प्रशासन तक पहुंचा तो उसने दो बिल्लियों की लड़ाई में बंदर वाली भूमिका निभा दी। मानसून बीतने पर आया तब जाकर पौधे रोपे जा सके। सियासत यही नहीं रुकी पौधे बचे रहें इसकी चिंता से अधिक पौधे कितने लगाए इस पर पूरा ध्यान रहा। आज हाल यह है कि 115 अधिकारी और कर्मचारियों की जिस टीम ने एक -एक पौधा गिनकर 19 हजार पौधे जिंदा पाए थे उनमें से करीब 10 हजार पौधे डूठ में तब्दील हो गए या मरने के कगार पर पहुंच गए हैं। इनकी सिंचाई तक नहीं हो पा रही है। एक डीजल पंप सेट करीब दो हेक्टेयर क्षेत्र के ही पौधे जिन्दा रखने में सफल हो रहा है।
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जल स्रोत सूखे
गुरुसिकरन वन क्षेत्र के जंगली जीवों को पीने का पानी नहीं मिल रहा है। यहां की खाई सूखी पड़ी है। आसपास के सभी तालाब सूखे पड़े हैं। एक तालाब की तो सालों से देखरेख नहीं हुई। उसमे झाड़ियां और बबूल के पेड़ तक उग आए हैं। वहीं चार माह पहले जिस तालाब में पानी रहता था वह भी सूख गया है। तालाबों को देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा है कि कि उनको चुपके से खेत में तब्दील करने की साजिश रची जा रही हो। वन क्षेत्र के अंदर एक कुंआ नजर आता है वह भी मिट्टी से पटा है। अंदर के जल गड्ढे भी सूखे पड़े होने से नील गाय, जंगली सूअर, सियार  और पक्षी आदि प्यासे से दम तोड़ रहे हैं। आबादी क्षेत्र में भटक रहे हैं।
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10 साल में अलीगढ़ हो जाएगा बुंदेलखंड
आप जिस पानी को आंख मूंदकर फैला रहे हैं वह पानी खत्म होने के कगार पर है। एएमयू के भू गर्भ विज्ञान विभाग के प्रोफसर सादाब खुर्शीद का कहना है कि जमीन की पहली परत का पानी खत्म गया है। अब 100 से 200 फीट पर जो दूसरी परत है वह भी सूखती जा रही है। वॉटर क्वालिटी ठीक नहीं है। टीडीएस तेजी से बढ़ रहा है। पानी के नेचुरल रिचार्ज नहीं है। लाइसेंस व्यवस्था करनी होगी। रिजार्च जोन बनाने होंगे। पोखर तालाब गड्ढे में वर्षा का पानी रहे इसके लिए प्रभावी नहीं है वर्षा जल संचयन और रेन वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम को प्रभावी करना होगा। नहीं तो अलीगढ़ को बंदेलखंड होने में 10 साल ही लगेंगे।
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