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रासायनिक खाद: जागरूकता पर हर साल हो रहा करोड़ों खर्च, पर नतीजा सिफर

Thu, 10 Sep 2020 02:15 AM IST
Aligarh Bureau अलीगढ़ ब्यूरो
Updated Thu, 10 Sep 2020 02:15 AM IST
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Chemical fertilizers: Millions spent every year on awareness, but the result is cipher
आशीष श्रीवास्तव
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रासायनिक खादों के प्रयोग से भूमि की घटती उर्वरा शक्ति और इन रसायनों के मानव स्वास्थ्य पर कुप्रभाव को लेकर जागरूकता कार्यक्रमों पर लाखों रुपये पानी की तरह बहाये जा रहे हैं। परंतु नतीजा सिफर ही है। हर साल बढ़ रही यूरिया समेत अन्य खादों की डिमांड इसका स्पष्ट उदाहरण है। ज्यादा मुनाफे के लालच में किसान जम कर रासायनिक खादों का प्रयोग कर रहे हैं। इससे जमीन की उर्वरा शक्ति पर विपरीत असर पड़ ही रहा है तो मानव स्वास्थ्य भी खतरे में है।
प्रधानमंत्री मोदी की अपील बेअसर
खेती में रासायनिक खादों के प्रयोग से घटती भूमि की उर्वरा शक्ति से चिंतित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले साल 15 अगस्त को किसान व वैज्ञानिकों से फसलों में रासायनिक खादों का प्रयोग कम करने और जैविक खाद का प्रयोग कर जैव विविधता लाने की अपील की थी, लेकिन यह बेअसर रही।
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मात्र दस प्रतिशत उत्पादन बढ़ने का लालच
रासायनिक खादों के प्रयोग से फसल में जीवाश्म खाद की तुलना में उत्पादन में 5 से 10 फीसदी तक वृद्धि होती है। जिला कृषि रक्षा अधिकारी राजेश कुमार ने बताया कि यही वृद्धि किसानों को रासायनिक खादों का मोह नहीं छोड़ने दे रही है।
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पिछले साल जागरूकता कार्यक्रमों पर खर्च
- किसान पाठशाला-कुल 244, खर्चा-6.50 लाख
- आत्मा योजना-ग्राम पंचायत, ब्लॉक व तहसील स्तरीय गोष्ठियां-150, खर्च-53.99 लाख
नोट-इस साल कोरोना महामारी के चलते जागरूकता कार्यक्रम के लिए बजट नहीं आया है।
खरीफ फसलों में यूरिया के बढ़ते प्रयोग के आंकड़े
-वर्ष 2019-20 -
जुलाई-32450 मीट्रिक टन
अगस्त-43903 मीट्रिक टन
-वर्ष 2020-21
जुलाई-48730 मीट्रिक टन
अगस्त-67240 मीट्रिक टन
जिले में बोई जाने वाली धान, बाजरा व मक्का की फसल में कुल 42 हजार मीट्रिक टन यूरिया पर्याप्त है, लेकिन इस साल 67 हजार मीट्रिक टन से ज्यादा यूरिया का प्रयोग हुआ है। किसान रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग में 30 फीसदी कमी लाएं। एनपीके की कमी गोबर अथवा जीवाश्म खाद से पूरी करें।
- विनोद कुमार, जिला कृषि अधिकारी
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