अतीत का अलीगढ़ 11: फसलों को चूहों से हुए नुकसान का मुआवजा भी देते थे अंग्रेज, ऐसे होता था लगान माफ
राज्य सरकार ने एक शासनादेश के जरिए प्रदेश के सभी जिलों के लिए नया जिला गजेटियर तैयार करने का आदेश दिया है। उसके लिए कमेटियों का गठन किया जा रहा है। अलीगढ़ का अंतिम गजेटियर 1909 में तैयार किया गया था। लगभग 400 पेजों की इस पुस्तक में लगभग 114 साल पुराने अलीगढ़ के भूगोल, नदियों, प्रशासनिक व्यवस्था, सिंचाई व ड्रेनेज सिस्टम, पुलिस व्यवस्था आदि के बारे में विस्तार से वर्णन है। इस संबंध में अतीत का अलीगढ़ नाम से एक समाचार श्रृंखला शुरू की जा रही है। उम्मीद है कि पुराने अलीगढ़ के बारे में जानकारी पाठकों को रुचिकर लगेगी। कृपया अपनी राय से हमें अवगत कराएं।
विस्तार
अंग्रेजों के निजाम में सबकुछ बुरा ही नहीं था। फसल बीमा की बात नए जमाने की लगती है। लेकिन आपको यह जानकर हैरानी होगी कि अंग्रेजी शासन किसानों को खेतों में चूहों से हुए नुकसान का मुआवजा भी देता था। यह मुआवजा लगान माफी के तौर पर हुआ करता था। 1806 में अलीगढ़ में अंग्रेजों ने स्थानीय किसानों को दो मद में मुआवजा दिया था। अंग्रेजी फौजों की रवानगी से खेतों को हुए नुकसान की भरपाई के लिए 188278 रुपये लगान के माफ किए गए थे। इसी तरह चूहों से खेतों की फसलों को हुए नुकसान के बदले 60980 रुपये किसानों को लगान माफी के रूप में राहत दी गई थी। लगभग दो सौ पंद्रह साल पहले इस राहत राशि को मौजूदा समय के रुपयों में आंकें तो यह आंकड़ा बहुत ज्यादा हो जाता है।
हाथरस के दयाराम को 20 हजार और मुरसान के भगवंत सिंह को 10 हजार रुपये सालाना का मुआवजा
अंग्रेजी शासनकाल से पहले स्थानीय जमींदार और ताल्लुकेदार स्थानीय लोगों का जमकर शोषण करते थे। अंग्रेजों ने कई प्रकार के करों को समाप्त करते हुए जमींदारों और ताल्लुकेदारों को किसानों, कारोबारियों से अतिरिक्त कर उगाही खत्म कर दी थी। इससे हुए नुकसान के लिए उन्होंने जमींदारों और ताल्लुकेदारों को अच्छा खासा मुआवजा भी देना पड़ा था। हाथरस के जमींदार दयाराम को 20 हजार रुपये का मुआवजा मिला था। उन्होंने 10 हजार रुपये अतिरिक्त मुआवजे की मांग की थी।
दयाराम ने यह मुआवजा एक किसान की हैसियत से मांगा था। दयाराम की खेती-बाड़ी का दायरा कितना विशाल था इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह 1802 ईस्वी में सालाना 3,30000 रुपये लगान देते थे। लेकिन अंग्रेजी शासन काल के दस्तावेज बताते हैं कि रसूखदार लोग, मुरसान के राजा अंग्रेजों की ओर से प्रतिबंधित किए जाने के बाद भी रियाया से अवैध वसूली किया करते थे।
1807 में अलीगढ़ में बोर्ड ऑफ कमिश्नर की बैठक
1807 के रेगुलेशन संख्या 10 के तहत तैनात बोर्ड ऑफ कमिश्नर की बैठक दिसंबर माह में अलीगढ़ में हुई। तत्कालीन कलक्टर ने लिखा कि युद्धों और खराब फसली सीजन की वजह से कुल कृषियोग्य भूमि के सिर्फ 60 फीसदी हिस्से में ही खेती हो सकी थी। हालांकि वह यह भी लिखता है कि इस दशा में सुधार हो जाने पर छह साल में राजस्व छह लाख रुपये सालाना हो जाएगा।
1803 और 1805 के रेगुलेशनों ने तहसील व्यवस्था को दिया जन्म
अंग्रेजों ने अपने द्वारा जीते गए क्षेत्रों में बंदोबस्त व्यवस्था लागू की थी। इसके लिए रेगुलेशन जारी किए गए थे। 1803 और 1805 के रेगुलेशनों ने तहसील व्यवस्था को जन्म दिया था। इससे पहले राजस्व वसूली करने वाले जमींदारों को कुल वसूली का 10 फीसदी कमीशन दिया जाता था। तहसील व्यवस्था में तहसीलदारों का वेतन तय कर दिया गया था। मथुरा और जिले के पूर्वी परगनों में नए बंदोबस्त किए गए। यह दयाराम, भगवंत सिंह और हरकिशन जमींदारों के साथ किए गए थे। मिस्टर ईलियट नाम के अंग्रेज अफसर की तैनाती दिसंबर 1808 में की गई थी जिसने जिले के अन्य क्षेत्रों में बंदोबस्त को अंजाम दिया था।
1810 में अलीगढ़ जिले से कुल 3103793 रुपये राजस्व की प्राप्ति हुई थी
1810-11 के राजस्व वर्ष में अलीगढ़ जिले से कुल राजस्व प्राप्ति 3103793 रुपये की थी। इसकी उगाही में 3324 लोग लगाए गए थे। 1833 में जॉन थार्नटन अलीगढ़ का डिप्टी कलक्टर बना। उसे 1833 में नवें रेगुलेशन के तहत हुए बंदोबस्त को खत्म करने का काम सौंपा गया। बतौर बंदोबस्त अधिकारी वह पांच साल तक रहा। इस दौरान उसने हाथरस, मुरसान, गोराई, हसनगढ़, खैर, चंडौस, सोमुआ, कोल, अतरौली, मुरथल, भमौरी और दतौली का बंदोबस्त किया। इसके अलावा टप्पल परगने का भी बंदोबस्त किया जो बेगम समरू की जागीर का एक हिस्सा रहा। इसके बाद उनकी जगह पर 1838 में एच रोज तैनात हुए। उन्होंने बचे परगनों का बंदोबस्त किया। इसमें सिकंदराराऊ, अकराबाद, जलाली और बरौली शामिल थे।
जारी...
स्रोतः अलीगढ़ का गजेटियर 1878-1909