AMU: डिजिटल के दौर में उर्दू की मिठास बरकरार, आठ दिन में बिकीं 60 लाख की किताबें, कार्टून बुक्स भा रहीं
स्टॉलों पर ‘शेर-चूहा’, ‘कछुआ-खरगोश’, ‘मोगली’, ‘नन्हे-मुन्ने की सरकार’, ‘छोटी-छोटी बातें बड़ी काम’, ‘आख़िरी छोरी और दूसरी कहानियां’, ‘बांग-ए-दरा’, ‘बाल-ए-जिब्रील’, ‘आसमान के कैदी’ जैसी किताबों की खूब बिक्री हुई। बच्चों ने बड़े उत्साह के साथ अपने माता-पिता के साथ मिलकर किताबें चुनीं।
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भले ही दुनिया की हर जानकारी आज मोबाइल की स्क्रीन पर एक क्लिक में मिल जाती है और लोगों का समय लगातार डिजिटल स्क्रॉल में सिमट रहा है, लेकिन किताबों खासतौर से उर्दू किताबों की मिठास बरकरार है। इसका सबसे जीता-जागता प्रमाण अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) परिसर में लगे अलीगढ़ उर्दू पुस्तक मेले में मिला, जहां सिर्फ आठ दिनों में 60 लाख रुपये की किताबें बिक गईं।
मेले में उर्दू प्रेमियों ने जिस तरह दरियादिली दिखाई, उसने प्रकाशकों और आयोजकों दोनों को उत्साहित कर दिया। सबसे ज्यादा बाल साहित्य, शेरो-शायरी, नज्म और गजल की किताबें बिकी हैं। आधुनिक उर्दू साहित्य की पुस्तकों पर भी पाठकों ने खूब दिलचस्पी दिखाई। देशभर के प्रमुख प्रकाशकों ने मेले में 51 स्टॉल लगाए थे। दिल्ली, लखनऊ, बदायूं, संभल और कई अन्य शहरों से आए उर्दू के कद्रदानों ने बड़े शौक से अपनी मनपसंद किताबें खरीदीं। हर स्टॉल पर साहित्य प्रेमियों की उत्साहपूर्ण भीड़ बनी रही।
मेले में साहित्यिक गोष्ठी, मुशायरा और कई सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने इसे और यादगार बना दिया। यह मेला राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद और सीईएसी की ओर से लगाया गया है। मेले से जुड़े अमूद गुलजार ने बताया कि आठ दिनों में 60 लाख रुपये की पुस्तकें बिकी हैं, जबकि रविवार को समापन के दिन 8–9 लाख की अतिरिक्त बिक्री का अनुमान है। उनका कहना है कि यह बढ़ता रुझान उर्दू भाषा और साहित्य के उज्ज्वल भविष्य का संकेत है।
उर्दू की किताबों की दिलचस्पी आज भी कायम है। उर्दू पुस्तक मेले में दूसरे शहरों से आए लोगों, यूनिवर्सिटी के शिक्षकों और विद्यार्थियों ने किताबें खूब खरीदीं। इससे अंदाजा हो गया कि तकनीक कितनी भी बढ़ जाए, किताबों की खुशबू और शब्दों का असर आज भी दिलों में अठखेलियां करता है।-प्रो. शाफे किदवई, अध्यक्ष, सर सैयद एकेडमी, एएमयू
कार्टून की किताबों को लेकर बच्चों में जबरदस्त उत्साह
मेले में अपने माता-पिता के साथ आने वाले बच्चों का दिल कार्टून की किताबें देखकर मचलने लगता। उनमें कार्टून की किताबों को लेकर भारी उत्साह देखा जा रहा है। स्टॉलों पर ‘शेर-चूहा’, ‘कछुआ-खरगोश’, ‘मोगली’, ‘नन्हे-मुन्ने की सरकार’, ‘छोटी-छोटी बातें बड़ी काम’, ‘आख़िरी छोरी और दूसरी कहानियां’, ‘बांग-ए-दरा’, ‘बाल-ए-जिब्रील’, ‘आसमान के कैदी’ जैसी किताबों की खूब बिक्री हुई। बच्चों ने बड़े उत्साह के साथ अपने माता-पिता के साथ मिलकर किताबें चुनीं। डिजिटल युग के बावजूद किताबों के प्रति बच्चों की रुचि लगातार बढ़ रही है और पढ़ने की संस्कृति फिर से मजबूत हो रही है। 12 वर्षीय अली ने बताया कि मैंने कार्टून वाली किताबें खरीदी हैं। हफ्शा ने कहा कि हम लोगों के लिए भी यहां किताबें हैं।