अतीत का अलीगढ़ 19: 1878 में अलीगढ़ में गठित हुआ भारतवर्षीय नेशनल एसोसिएशन, हाथरस में लेखन का यह है इतिहास
राज्य सरकार ने एक शासनादेश के जरिए प्रदेश के सभी जिलों के लिए नया जिला गजेटियर तैयार करने का आदेश दिया है। उसके लिए कमेटियों का गठन किया जा रहा है। अलीगढ़ का अंतिम गजेटियर 1909 में तैयार किया गया था। लगभग 400 पेजों की इस पुस्तक में लगभग 114 साल पुराने अलीगढ़ के भूगोल, नदियों, प्रशासनिक व्यवस्था, सिंचाई व ड्रेनेज सिस्टम, पुलिस व्यवस्था आदि के बारे में विस्तार से वर्णन है। इस संबंध में अतीत का अलीगढ़ नाम से एक समाचार श्रृंखला शुरू की जा रही है। उम्मीद है कि पुराने अलीगढ़ के बारे में जानकारी पाठकों को रुचिकर लगेगी। कृपया अपनी राय से हमें अवगत कराएं।
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विस्तार
देश भर में हाल के दिनों में इंडिया बनाम भारत की बहस बड़ी तेजी से चली है। कम लोगों को ज्ञात होगा कि भारतवर्षीय नेशनल एसोसिएशन नाम की संस्था का गठन अलीगढ़ में 1878 ईस्वी में हुआ था। यह भी उल्लेखनीय है कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना इसके सात साल बाद 1885 में हुई थी। इस संस्था से तत्कालीन भारत की कई बड़ी हस्तियां जुड़ी थीं। इनमें मुरसान के राजा, लखनऊ के मुंशी नवल किशोर, राजा जय किशन दास और अन्य लोग शामिल थे।
इस संस्था का उद्देश्य पुरुषों और स्त्रियों का शैक्षिक स्तर सुधारना और स्थानीय बोलियों, भाषाओं को मजबूत बनाना। इनमें उपयोगी साहित्य का प्रकाशन। इस संस्था ने राजा लक्ष्मण सिंह की अध्यक्षता में भाषा संवर्धन सभा नाम से एक उप समिति का गठन किया। इस समिति ने हिंदी की कुछ महत्वपूर्ण किताबों के संग्रह के साथ एक छोटा सा पुस्तकालय स्थापित किया। यही पुस्तकालय कालांतर में लॉयल लाइब्रेरी के रूप में सामने आया।
अलीगढ़ में पढ़ने-लिखने के शौकीन लोगों के लिए सार्वजनिक पुस्तकालय स्थापित करने की योजना 1882 में बनी। तत्कालीन गवर्नर जनरल सर अल्फ्रेड लॉयल के नाम पर इसे लॉयल लाइब्रेरी की संज्ञा दी गई। सरकार की ओर से अनुमति मिलने पर 1884 में इसका नींव पत्थर मिस्टर हीथ ने पुराने टेलीग्राफ दफ्तर के परिसर में रखा था। इसकी पहली मंजिल 1889 में बनकर तैयार हुई। इसी साल आम पाठक के लिए लाइब्रेरी और अध्ययन कक्ष खोला गया। दो मंजिली लाइब्रेरी के निर्माण की लागत 39886 रुपये थी। इसका एक तिहाई हिस्सा लखनऊ के मुंशी नवल किशोर और उनके बेटे पराग नारायण ने वहन किया था।
हाथरस में लेखन का इतिहास अलीगढ़ से पुराना
अलीगढ़ के पड़ोसी जिले बरेली, बदायूं, बुलंदशहर, एटा, मैनपुरी, मथुरा और आगरा थे। इन जिलों में भाषा के तौर पर ब्रज बोली के रूप में पश्चिमी हिंदी प्रयुक्त होती थी। स्वाभाविक तौर पर अलीगढ़ के भी ज्यादातर बाशिंदे ब्रज ही बोला करते थे। सिर्फ 7.77 फीसदी ही उर्दूभाषी थे। इस क्षेत्र में ब्रज और उर्दू के अलावा अन्य भाषाएं उल्लेखनीय नहीं थीं। हां, मारवाड़ी, गुजराती, बांग्ला, पंजाबी और अंग्रेजी भाषा भी चंद लोग बोला करते थे। एक रोचक बात यह थी कि जनगणना में 49 लोगों ने अपनी भाषा जिप्सी बताई थी जिसे बोलने वाले अलीगढ़ के अलावा सिर्फ मिर्जापुर में थे। मुगल शासन काल में तमाम लेखकों की सक्रियता के बाद भी अलीगढ़ के इतिहास के शुरुआती दौर में किसी भी लेखक का नाम सामने नहीं आता है। अलीगढ़ के ही समकालीन स्थापित जिले बदायूं को प्रबुद्ध लोगों की धरती माना जाता था।
इस क्षेत्र में हाथरस के राजा दया राम को किसी हद तक साहित्य के संरक्षक के तौर पर माना जाता है। हाथरस को प्रसिद्ध फकीर बख्तावर की जन्मस्थली माना जाता है। बख्तावर ने हिंदी ग्रंथ सुनिसार की रचना की थी। इसके अलावा 1846 में जन्मे दल देवदास ने भी कृष्ण खंड के नाम से एक ग्रंथ की रचना की थी। बाद में अलीगढ़ में सर सैयद अहमद और उनके द्वारा स्थापित मोहम्मडन एंग्लो ओरियंटल कॉलेज के असर से लेखकों और बौद्धिक लोगों की बड़ी जमात सामने आई। सर सैयद ने 1864 में अलीगढ़ इंस्टीट्यूट एंड साइंटिफिक सोसायटी की स्थापना की थी। इसमें एक पुस्तकालय और एक प्रेस भी था। सोसायटी एक जर्नल प्रकाशित करती थी जिसका नाम अलीगढ़ इंस्टीट्यूट गजट था। बाद में सोसायटी बंद हो गई थी।
लाइब्रेरी और प्रेस कॉलेज को स्थानांतरित कर दिए गए थे। कॉलेज सोसायटी की ओर से एक और पत्रिका अलीगढ़ मंथली प्रकाशित की जाती थी। अंग्रेजी में इसे कानपुर और उर्दू में अलीगढ़ से छापा जाता था। इसमें स्थानीय समाचारों के अलावा शिक्षा और धर्म से संबंधित लेख प्रकाशित हुआ करते थे। इसी दौर में फैज-ए-आम प्रेस से खातून नामक एक अहम पत्रिका का प्रकाशन शुरू हुआ जिसका मकसद महिलाओं में शिक्षा और साहित्य समझ में इजाफा करना था। इसके अलावा अहमद प्रेस से बच्चों की उर्दू में पत्रिका रफीकुल-अतफुल भी प्रकाशित होती थी। इसका प्रकाशन पाक्षिक था। इसके अलावा 1905 में आलमगीर नाम की पत्रिका भी शुरू की गई थी जिसमें धार्मिक लेख प्रकाशित किए जाते थे। इस वक्त कट्टर इस्लामिक लेखों के लिए उर्दू-ए-मौला भी उल्लेखनीय था।
जारी...
स्रोतः अलीगढ़ का गजट 1909।