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Aligarh News: कमीशनखोरी से बोझिल हुआ बस्ता

Thu, 06 Apr 2023 12:51 AM IST
Aligarh Bureau अलीगढ़ ब्यूरो
Updated Thu, 06 Apr 2023 12:51 AM IST
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bag burdened by commission
कमीशन के बोझ से मासूम का बस्ता भारी हो गया है। निजी विद्यालयों ने अपने-अपने हिसाब से अलग-अलग कक्षाओं में किताबें लगा रही हैं। कक्षा पांच का पाठ्यक्रम 5500 रुपये में आ रहा है। वहीं, केंद्रीय विद्यालय में कक्षा पांच का पाठ्यक्रम करीब 350 रुपये में आ रहा है।
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केंद्रीय विद्यालय में एनसीईआरटी की पाठ्य पुस्तकें चलती हैं। इनकी कीमतें काफी हाेती है। निजी स्कूलों में संचालक अपने हिसाब से पाठ्यक्रम बनाते हैं। पुस्तक विक्रेताओं का कहना है कि पाठ्यक्रम के एवज में कमीशन भी देते हैं।
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कक्षा रुपये
प्ले ग्रुप 2300
नर्सरी 3400
केजी 3500
एक 5000
दो 5200
तीन 5500
चार 5700
पांच 5800
छह 5200
सात 5300
आठ 5500
नौ 3000
10 2800
नोट : पिछले वर्ष की अपेक्षा हर कक्षा में करीब 500 रुपये की वृद्धि। यूनिफॉर्म शामिल नहीं।



केंद्रीय विद्यालय के पाठ्यक्रम की कीमत
कक्षा रुपये
एक 150
दो 200
तीन 250
चार 300
पांच 350
--




नर्सरी से लेकर 12वीं तक में बार-बार पाठ्यक्रम बदलना अभिभावकों की जेब पर आर्थिक बोझ होने के साथ पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहे हैं। कागज वृक्ष से बनते हैं। पाठ्यक्रम न बदलने से बच्चे अपनी पुस्तकों को संरक्षित रखना सीखेंगे। जैसे पहले होता था। पांच साल में पाठ्यक्रम बदलना चाहिए। इससे अभिभावकों पर आर्थिक बोझ नहीं पड़ेगा।
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-प्रो. मुकेश कुमार भारद्वाज, प्राचार्य, डीएस कॉलेज, अलीगढ़



पाठ्यक्रम बदलने की बात अलग है। केवल लोगो लगाने के चलते यूनिफॉर्म बदल दिया जाता है। पाठ्यक्रम बदलने और छोटी कक्षाओं में कई किताबें लगाना सीधा अभिभावकों पर आर्थिक बोझ पड़ता है। नर्सरी, केजी में दो-तीन किताबें होनी चाहिए। मगर इन कक्षाओं में ढेर सारी किताबों का बोझ मासूम की पीठ पर रहता है।
-प्रो. सुनीता गुप्ता, विभागाध्यक्ष, चित्रकला विभाग, डीएस कॉलेज




अभिभावकों का कहना
मेरी बेटी कक्षा चार में पढ़ती है। उसके लिए पाठ्यक्रम खरीदा है, जो काफी महंगा है। दुकानदार कागज बढ़ने का हवाला दे रहे हैं। महंगाई का बढ़ जाना एक मध्यमवर्गीय व्यक्ति के लिए काफी दुखद है।

-आशीष सिंह, सुरेंद्र नगर




दोनों बेटियों के लिए पाठ्य पुस्तकें 15000 रुपये में खरीदी है। श्रमिक अगर किताबें में खरीदने में पूरे रुपये दे देगा तो महीने पर कैसे खाएंगे। हर साल किताबों की कीमतें बढ़ जाती हैं। दुकानदार कागज और महंगाई बताते हैं।

-रूप कुमार, छावनी
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