{"_id":"587699dd4f1c1bc156ba884a","slug":"around-the-city-which-provided-a-positive-development","type":"story","status":"publish","title_hn":"शहर की है आस,ऐसा विधायक जो कराए विकास","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
शहर की है आस,ऐसा विधायक जो कराए विकास
अभिषेक शर्मा
Updated Thu, 12 Jan 2017 02:24 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
शहर विधानसभा के वोटरों ने तकरार के बीच ताला और तरकीब से अपनी किस्मत को संवारा है। हिंदू मुस्लिम तकरार के लिए कुख्यात रहे इस इलाके में छिटपुट घटनाएं अब भी अमनपसंद लोगों को परेशान जरूर करती हैं, लेकिन गुजरे दस साल से कोई बड़ा तनाव नहीं हुआ है, जिससे कर्फ्यू जैसे हालात बने हों। इस विधानसभा में ही ताले के सबसे ज्यादा कारखाने हैं, जहां से देश विदेश के लिए अत्याधुनिक तालों की सप्लाई होती है।
यहां के मेहनतकश लोगों ने इसी ताले पर आधुनिकता की तरकीब लगा कर खुद को दुनिया भर में स्थापित किया है। अब चुनावों में भी इसी तरकीब का इस्तेमाल हो रहा है, ताकि ऐसे ‘नुमाइंदे’ की तलाश पूरी हो..। जो शहर के विकास की भूख को पूरा कर सके। खैर, भाजपा इस विधानसभा को जीतने के कई दावे जरूर पेश कर रही है लेकिन हकीकत में यहां पर भाजपा और सपा दोनों तीन तीन बार जीती हैं। इसलिए आंकड़ा बराबरी का है। इससे ठीक उलट अधिकांश चुनावों में कांग्रेस उम्मीदवार यहां से जीते।
जिसमें नफीसुल हसन, अनंतराम वर्मा, अहमद लूथ खां, कैप्टन बल्देव सिंह कई विधायक शामिल हैं। अतीत में झांके तो आजादी के बाद वर्ष 1951 में अलीगढ़ जनपद में हुए पहले विधानसभा चुनाव में कुल आठ विधानसभा सीटें थीं। शहर की सीट कोल सेंट्रल सीट के नाम से थी, जिसका नंबर 85 था। नफीसुल हसन पहले विधायक बनेे। इन्होंने निर्दलीय अमर सिंह को 16 हजार 989 वोटों से हराया था। 1957 के चुनाव में इस विधानसभा को 96 नंबर देकर अलीगढ़ नाम दिया गया। कांग्रेस के अनंतराम वर्मा यहां से जीते।
विज्ञापन
1962 में हुए परिसीमन में ये सीट 381 नंबर हो गई और जिले की विधानसभाएं बढ़ कर दस तक पहुंच गई। आरईपी से अब्दुल बशीर खां विधायक बने। 1967 के विस चुनाव में फिर इसका नंबर बदल कर 376 हो गया और भारतीय जन संघ के इंद्रपाल सिंह विधायक बने। 1969 में अहमद लूथ खां इंडियन नेशनल कांग्रेस से विधायक बने। 1974 में फिर से नंबर बदल कर 373 हुआ। इंद्रपाल सिंह ने भारतीय जन संघ से लड़कर इंडियन नेशनल कांग्रेस के अहमद लूथ खां को हरा दिया। 1977 में हुए चुनाव में मौअजिज अली बेग जनता पार्टी से विधायक बने।
1980 के चुनाव में पूर्व कबीना मंत्री ख्वाजा हलीम यहां से जेएनपी से विधायक बन गए। 1985 के चुनाव में इंडियन नेशनल कांग्रेस से कैप्टन बलदेव सिंह एमएलए बने। 1989 में पहली बार भाजपा के केके नवमान विधायक बने और 1991 तथा 1993 में लगातार तीन बार जीते। 1996 में सपा के अब्दुल खालिक ने खाता खोला और विधानसभा पहुंचे। इसके बाद 2002 के चुनाव में कांग्रेस के विवेक बंसल विधायक बने। इसके बाद 2007 में सपा से हाजी जमीरउल्लाह और 2012 में सपा के जफर आलम ने विजय जारी रखी।
विज्ञापन
यहां के मेहनतकश लोगों ने इसी ताले पर आधुनिकता की तरकीब लगा कर खुद को दुनिया भर में स्थापित किया है। अब चुनावों में भी इसी तरकीब का इस्तेमाल हो रहा है, ताकि ऐसे ‘नुमाइंदे’ की तलाश पूरी हो..। जो शहर के विकास की भूख को पूरा कर सके। खैर, भाजपा इस विधानसभा को जीतने के कई दावे जरूर पेश कर रही है लेकिन हकीकत में यहां पर भाजपा और सपा दोनों तीन तीन बार जीती हैं। इसलिए आंकड़ा बराबरी का है। इससे ठीक उलट अधिकांश चुनावों में कांग्रेस उम्मीदवार यहां से जीते।
विज्ञापन
जिसमें नफीसुल हसन, अनंतराम वर्मा, अहमद लूथ खां, कैप्टन बल्देव सिंह कई विधायक शामिल हैं। अतीत में झांके तो आजादी के बाद वर्ष 1951 में अलीगढ़ जनपद में हुए पहले विधानसभा चुनाव में कुल आठ विधानसभा सीटें थीं। शहर की सीट कोल सेंट्रल सीट के नाम से थी, जिसका नंबर 85 था। नफीसुल हसन पहले विधायक बनेे। इन्होंने निर्दलीय अमर सिंह को 16 हजार 989 वोटों से हराया था। 1957 के चुनाव में इस विधानसभा को 96 नंबर देकर अलीगढ़ नाम दिया गया। कांग्रेस के अनंतराम वर्मा यहां से जीते।
विज्ञापन
1962 में हुए परिसीमन में ये सीट 381 नंबर हो गई और जिले की विधानसभाएं बढ़ कर दस तक पहुंच गई। आरईपी से अब्दुल बशीर खां विधायक बने। 1967 के विस चुनाव में फिर इसका नंबर बदल कर 376 हो गया और भारतीय जन संघ के इंद्रपाल सिंह विधायक बने। 1969 में अहमद लूथ खां इंडियन नेशनल कांग्रेस से विधायक बने। 1974 में फिर से नंबर बदल कर 373 हुआ। इंद्रपाल सिंह ने भारतीय जन संघ से लड़कर इंडियन नेशनल कांग्रेस के अहमद लूथ खां को हरा दिया। 1977 में हुए चुनाव में मौअजिज अली बेग जनता पार्टी से विधायक बने।
1980 के चुनाव में पूर्व कबीना मंत्री ख्वाजा हलीम यहां से जेएनपी से विधायक बन गए। 1985 के चुनाव में इंडियन नेशनल कांग्रेस से कैप्टन बलदेव सिंह एमएलए बने। 1989 में पहली बार भाजपा के केके नवमान विधायक बने और 1991 तथा 1993 में लगातार तीन बार जीते। 1996 में सपा के अब्दुल खालिक ने खाता खोला और विधानसभा पहुंचे। इसके बाद 2002 के चुनाव में कांग्रेस के विवेक बंसल विधायक बने। इसके बाद 2007 में सपा से हाजी जमीरउल्लाह और 2012 में सपा के जफर आलम ने विजय जारी रखी।