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अतीत का अलीगढ़ 5: तालानगरी में ताले के अलावा बना करते थे लेटर बॉक्स, लालटेन, लैंप और कैंचियां

Mon, 30 Oct 2023 03:09 AM IST
चमन शर्मा कुमार अतुल, अमर उजाला, अलीगढ़
कुमार अतुल, अमर उजाला, अलीगढ़ Published by: चमन शर्मा Updated Mon, 30 Oct 2023 03:09 AM IST
सार

राज्य सरकार ने एक शासनादेश के जरिए प्रदेश के सभी जिलों के लिए नया जिला गजेटियर तैयार करने का आदेश दिया है। उसके लिए कमेटियों का गठन किया जा रहा है। अलीगढ़ का अंतिम गजेटियर 1909 में तैयार किया गया था। लगभग 400 पेजों की इस पुस्तक में लगभग 114 साल पुराने अलीगढ़ के भूगोल, नदियों, प्रशासनिक व्यवस्था, सिंचाई व ड्रेनेज सिस्टम, पुलिस व्यवस्था आदि के बारे में विस्तार से वर्णन है। इस संबंध में अतीत का अलीगढ़ नाम से एक समाचार श्रृंखला शुरू की जा रही है। उम्मीद है कि पुराने अलीगढ़ के बारे में जानकारी पाठकों को रुचिकर लगेगी। कृपया अपनी राय से हमें अवगत कराएं।

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Apart from locks, Aligarh used to make letter boxes, lanterns, lamps and scissors in Talanagari
अतीत का अलीगढ़ - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

जिला अलीगढ़ में धातुओं का काम अंग्रेजी शासनकाल में काफी अहम था। सन 1857 में धातुओं से संबंधित उत्पादों के कई कारखाने जिले में मौजूद थे। तालों के अतिरिक्त इनमें लेटर बॉक्स, लालटेन, लैंप और कैंचियां, बेल्ट, बैज, मोहरें आदि बना करते थे। ये उत्पाद पूरे भारत में भेजे जाते थे। इनके वितरण में डाक विभाग का बहुत बड़ा हाथ था। अलीगढ़ पोस्टल वर्कशाप की स्थापना सन 1842 में हुई थी।

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तत्कालीन पोस्ट मास्टर जनरल डॉक्टर पैटन अलीगढ़ शॉप नाम से एक व्यवस्था बनाई थी जिसके तहत वह बुग्गियों, बैलगाड़ियों से आने वाले सामानों को पार्सल बैग के रूप में तैयार करके पूरे भारत में भेजा करते थे। इस काम में लगभग दो हजार लोग लगे हुए थे। यह प्रयोग काफी सफल रहा था। लेकिन रेलवे के आगमन के साथ ही डाक विभाग से जुड़े कर्मचारियों की संख्या घटकर लगभग 400 तक रह गई।
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1907 में ताले के 27 कारखाने थे अलीगढ़ में
पहले से स्थापित बड़ी संख्या में वर्कशॉप ही अलीगढ़ में धातु उद्योगों का आधार बनीं। बड़ी मात्रा में लोहे और पीतल का उपयोग तालों के निर्माण में किया जाता था।  सन 1907 में अलीगढ़ में ताले के 27 कारखाने स्थापित थे। इसके अलावा कुछ कारखाने इगलास और हाथरस में भी थे। ताला निर्माता दो फर्मों में दो-दो सौ से ज्यादा कर्मचारी थे। इनमें एक का नाम पॉयोनियर लॉक वर्क्स एंड जनरल मेटर फाउंड्री था। इसे मेसर्स जॉन्सन एंड कंपनी संचालित करती थी।
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दूसरी का नाम स्पैलिंग लॉक वर्क्स था। इनमें निर्मित तालों की गुणवत्ता बेहद अच्छी थी। अलीगढ़ से ये पूरे भारत में भेजे जाते थे। दरअसल जिले को तालानगरी नाम इन्हीं कारखानों की बदौलत मिला था। दोनों कंपनियां विदेशी स्वामित्व वाली थीं। उस दौर में जो भारतीय ताला निर्माण में अग्रणी थे उनमें नबी बख्स, करीम इलाही, हाफिज इनायतुल्लाह, और अब्दुल्ला की फर्में थीं।

125 साल पहले अलीगढ़ में हर साल पांच लाख से ज्यादा ताले बनते थे

अलीगढ़ में लोहे और पीतल के अच्छे गुणवत्ता वाले तालों का निर्माण तो होता ही था, साथ में उत्पादन भी बड़े पैमाने पर होता था। 1900 के आसपास अलीगढ़ में सालाना लगभग पांच लाख तालों का निर्माण होता था। इनकी तात्कालिक कीमत 276000 रुपये थी, अर्थात एक ताला लगभग पचास पैसे से कुछ ज्यादा की कीमत का था। इसके अलावा इगलास के 11 कारखानों में भी तालों का निर्माण होता था। इनकी कीमत 30000 रुपये थी।

हाथरस में फ्लोर मिल और चूना फैक्टरी भी स्थापित थी
सन 1900 के आसपास यूरोपीय मिलों की तर्ज पर हाथरस में फ्लोर मिल और चूना फैक्टरी लगाई गई। इसके अतिरिक्त सिकंदराराऊ में शीरा रिफाइनरी भी लगाई गई। सिकंदराराऊ में ही एक शीशा फैक्टरी लगाई गई, पर बहुत जल्द वह पूंजी और कुशल मजदूरों की कमी की वजह से ठप हो गई। लेकिन छोटी इकाइयों में कच्चे शीशे का उत्पादन होता रहा। पुरदिल नगर और कुछ अन्य स्थानों पर कांच की चूड़ियां बनाई जाती थीं। 
जारी ...
स्रोतः अलीगढ़ का गजेटियर 1909

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