{"_id":"5b2570244f1c1bf67a8b595f","slug":"amy-s-condition-from-jinna-property","type":"story","status":"publish","title_hn":"जिन्ना की संपत्ति से एएमयू का तौबा","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
जिन्ना की संपत्ति से एएमयू का तौबा
न्यूूज डेस्क, अमर उजाला, अलीगढ़।
Updated Sun, 17 Jun 2018 01:46 AM IST
विज्ञापन
जिन्ना और नेहरू
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
अलीगढ़ आने के एक साल बाद मोहम्मद अली जिन्ना ने अपनी मुंबई की संपत्ति का एक तिहाई हिस्सा अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के नाम कर दिया था। हालांकि यह अलग बात है कि एएमयू ने आज तक जिन्ना की संपत्ति पर दावा नहीं किया। टू नेशन थ्योरी के जनक मोहम्मद अली जिन्ना को देश के विभाजन के बाद एएमयू ने कभी पसंद नहीं किया।
एएमयू छात्र संघ द्वारा 1938 में ऑल इंडिया मुस्लिम लीग के तत्कालीन अध्यक्ष मोहम्मद अली जिन्ना को आजीवन मानद सदस्यता दी गई थी। उस समय वह एएमयू में आए थे। एएमयू यूनियन हॉल में आज भी उनकी तस्वीर लगी है और विजिटर रजिस्टर पर उनके हस्ताक्षर हैं। पिछले महीने उनकी तस्वीर को लेकर काफी हंगामा भी हुआ था।
यहां से जाने के एक साल बाद मोहम्मद अली जिन्ना ने अपनी मुंबई की संपत्ति को तीन भागों में बांट दिया और उसका एक तिहाई हिस्सा एएमयू के नाम कर दिया। अन्य दो हिस्से क्रमश: सिंघ मदरसा करांची एवं मदरसा इस्लामिया, पेशावर के नाम किया था। यह उस समय की बात है जब भारत का विभाजन नहीं हुआ था। एएमयू पीआरओ आफिस के एमआईसी प्रो. शाफे किदवई कहते हैं कि चूंकि जिन्ना टू नेशन थ्योरी (द्विराष्ट्र सिद्धांत) के जनक थे, इसलिए एएमयू ने कभी उनकी संपत्ति पर दावा नहीं किया। न ही उनके देश बांटने की प्रवृति या विचार को कभी कबूल किया।
विज्ञापन
विज्ञापन
एएमयू छात्र संघ द्वारा 1938 में ऑल इंडिया मुस्लिम लीग के तत्कालीन अध्यक्ष मोहम्मद अली जिन्ना को आजीवन मानद सदस्यता दी गई थी। उस समय वह एएमयू में आए थे। एएमयू यूनियन हॉल में आज भी उनकी तस्वीर लगी है और विजिटर रजिस्टर पर उनके हस्ताक्षर हैं। पिछले महीने उनकी तस्वीर को लेकर काफी हंगामा भी हुआ था।
विज्ञापन
यहां से जाने के एक साल बाद मोहम्मद अली जिन्ना ने अपनी मुंबई की संपत्ति को तीन भागों में बांट दिया और उसका एक तिहाई हिस्सा एएमयू के नाम कर दिया। अन्य दो हिस्से क्रमश: सिंघ मदरसा करांची एवं मदरसा इस्लामिया, पेशावर के नाम किया था। यह उस समय की बात है जब भारत का विभाजन नहीं हुआ था। एएमयू पीआरओ आफिस के एमआईसी प्रो. शाफे किदवई कहते हैं कि चूंकि जिन्ना टू नेशन थ्योरी (द्विराष्ट्र सिद्धांत) के जनक थे, इसलिए एएमयू ने कभी उनकी संपत्ति पर दावा नहीं किया। न ही उनके देश बांटने की प्रवृति या विचार को कभी कबूल किया।
विज्ञापन