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नक्काशी व बनावट से नजरें खींच लेतीं हैं एएमयू की इमारतें
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एएमयू स्थित जामा मस्जिद। अमर उजाला
- फोटो : CITY OFFICE
इकराम वारिस
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) में कई इमारतें ऐसी हैं, जिनकी नक्काशी और बनावट पर हर किसी की नजरें टिक जाती हैं। हर इमारत अपने अंदर एक इतिहास समेटे है। स्ट्रेची हॉल हो या जामा मस्जिद, जो उसे देखता है देखता ही रह जाता है। इंग्लैंड की इमारत की तर्ज पर स्ट्रेची हॉल बनाया गया है, जबकि आगरा के ताज महल व एएमयू जामा मस्जिद का शिला लेख का लेखक एक ही शख्स है। यूं तो यूनिवर्सिटी की शुरुआत मदरसे से हुई, जो बाद में कॉलेज फिर एएमयू की शक्ल में वजूद में आया, जिसका अब्र (पानी) सारे जहां में बरस रहा है। इस इदारे के विद्यार्थी दुनिया के हर कोने में हैं। प्रस्तुत कर रहे हैं एएमयू की ऐतिहासिक इमारतों पर पहली कड़ी।
एएमयू जामा मस्जिद को बनने में लगे 33 साल
एएमयू जामा मस्जिद को बनने में 33 साल लगे थे। मस्जिद की बुनियाद में वर्ष 1879 में जस्टिस सैयद महमूद ने पत्थर रखा था, जो वर्ष 1912 में बनकर तैयार हुई। नमाज पढ़ने के लिए 1 फरवरी 1915 खोला गया। एएमयू इतिहास के जानकार व एएमयू उर्दू एकेडमी के पूर्व निदेशक डॉ. राहत अबरार ने बताया कि लंदन में सर सैयद ने काफी वक्त बिताया था। वह इंस्टीट्यूट में चर्च थे। लिहाजा, सर सैयद अहमद खां भी अलीगढ़ में संस्था बनाना चाहते थे, जहां एक मस्जिद हो। सर सैयद जामा मस्जिद दिल्ली के आसपास रहने वाले थे। वह नमाज पढ़ने दिल्ली जामा मस्जिद जाते थे। मस्जिद के महराब पर अरबी भाषा में शिला लेख था, उससे वह प्रभावित थे। 1857 गदर में अंग्रेजों ने दिल्ली की अकबरी मस्जिद शहीद कर दी। इसका शिला लेख 102 रुपये में खरीद लिया और उसे जामा मस्जिद में लगा दिया। ताज महल व एएमयू जामा मस्जिद के शिला लेख का लेखक काजी इस्मतुल्लाह याकूत रकम थे।
वायसराय लॉर्ड स्ट्रेची के नाम रखा स्ट्रेची हॉल
एएमयू की शुरुआत मदरसातुल उलूम के रूप में थी। अलीगढ़ के कलेक्टर हेनरी जार्ज लारेंस ने 74 एकड़ जमीन दी थी। डॉ. राहत अबरार ने बताया कि जमीन दिलाने में वायसराय लॉर्ड स्ट्रेची की अहम भूमिका थी। 8 जनवरी 1877 को लॉर्ड लेटन ने आधार शिला रखी। वह पटियाला से अलीगढ़ तक ट्रेन से आए थे। उनकी आवभगत के लिए काशी के नरेश शंभू नारायण डेरा, तंबू व बर्तन लाए थे। स्ट्रेची हॉल की बनावट इंग्लैंड की इमारतों जैसी है, क्योंकि सर सैयद इंग्लैंड में 17 महीने रहे थे। जमीन को लेकर अंग्रेज अधिकारी मुखालफत कर रहे थे, इसलिए उन्होेंने हॉल का नाम वायसराय लॉर्ड स्ट्रेची के नाम से रखा।
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अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) में कई इमारतें ऐसी हैं, जिनकी नक्काशी और बनावट पर हर किसी की नजरें टिक जाती हैं। हर इमारत अपने अंदर एक इतिहास समेटे है। स्ट्रेची हॉल हो या जामा मस्जिद, जो उसे देखता है देखता ही रह जाता है। इंग्लैंड की इमारत की तर्ज पर स्ट्रेची हॉल बनाया गया है, जबकि आगरा के ताज महल व एएमयू जामा मस्जिद का शिला लेख का लेखक एक ही शख्स है। यूं तो यूनिवर्सिटी की शुरुआत मदरसे से हुई, जो बाद में कॉलेज फिर एएमयू की शक्ल में वजूद में आया, जिसका अब्र (पानी) सारे जहां में बरस रहा है। इस इदारे के विद्यार्थी दुनिया के हर कोने में हैं। प्रस्तुत कर रहे हैं एएमयू की ऐतिहासिक इमारतों पर पहली कड़ी।
एएमयू जामा मस्जिद को बनने में लगे 33 साल
एएमयू जामा मस्जिद को बनने में 33 साल लगे थे। मस्जिद की बुनियाद में वर्ष 1879 में जस्टिस सैयद महमूद ने पत्थर रखा था, जो वर्ष 1912 में बनकर तैयार हुई। नमाज पढ़ने के लिए 1 फरवरी 1915 खोला गया। एएमयू इतिहास के जानकार व एएमयू उर्दू एकेडमी के पूर्व निदेशक डॉ. राहत अबरार ने बताया कि लंदन में सर सैयद ने काफी वक्त बिताया था। वह इंस्टीट्यूट में चर्च थे। लिहाजा, सर सैयद अहमद खां भी अलीगढ़ में संस्था बनाना चाहते थे, जहां एक मस्जिद हो। सर सैयद जामा मस्जिद दिल्ली के आसपास रहने वाले थे। वह नमाज पढ़ने दिल्ली जामा मस्जिद जाते थे। मस्जिद के महराब पर अरबी भाषा में शिला लेख था, उससे वह प्रभावित थे। 1857 गदर में अंग्रेजों ने दिल्ली की अकबरी मस्जिद शहीद कर दी। इसका शिला लेख 102 रुपये में खरीद लिया और उसे जामा मस्जिद में लगा दिया। ताज महल व एएमयू जामा मस्जिद के शिला लेख का लेखक काजी इस्मतुल्लाह याकूत रकम थे।
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वायसराय लॉर्ड स्ट्रेची के नाम रखा स्ट्रेची हॉल
एएमयू की शुरुआत मदरसातुल उलूम के रूप में थी। अलीगढ़ के कलेक्टर हेनरी जार्ज लारेंस ने 74 एकड़ जमीन दी थी। डॉ. राहत अबरार ने बताया कि जमीन दिलाने में वायसराय लॉर्ड स्ट्रेची की अहम भूमिका थी। 8 जनवरी 1877 को लॉर्ड लेटन ने आधार शिला रखी। वह पटियाला से अलीगढ़ तक ट्रेन से आए थे। उनकी आवभगत के लिए काशी के नरेश शंभू नारायण डेरा, तंबू व बर्तन लाए थे। स्ट्रेची हॉल की बनावट इंग्लैंड की इमारतों जैसी है, क्योंकि सर सैयद इंग्लैंड में 17 महीने रहे थे। जमीन को लेकर अंग्रेज अधिकारी मुखालफत कर रहे थे, इसलिए उन्होेंने हॉल का नाम वायसराय लॉर्ड स्ट्रेची के नाम से रखा।

स्ट्रेची हॉल। अमर उजाला- फोटो : CITY OFFICE
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