फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Aligarh News ›   AMU Aligarh Nagar Nigam Land Dispute

जमीन विवाद: नगर निगम का दावा, एएमयू की 1941 की पंजीकृत डीड ही खोलती है उसके स्वामित्व की पोल

Thu, 24 Sep 2026 12:18 PM IST
Chaman Kumar Sharma अमर उजाला नेटवर्क, अलीगढ़
अमर उजाला नेटवर्क, अलीगढ़ Published by: Chaman Kumar Sharma Updated Thu, 24 Sep 2026 12:18 PM IST
सार

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और नगर निगम के बीच नगला पटवारी की 500 करोड़ की जमीन पर विवाद में नगर निगम ने एसडीएम कोल कोर्ट में प्रतिवेदन दिया। निगम का तर्क है कि 1941 की डीड के अनुसार 324.15 एकड़ में से सिर्फ 197.57 एकड़ एएमयू को दी गई थी, शेष 126.58 एकड़ मुक्त थी।

विज्ञापन
AMU Aligarh Nagar Nigam Land Dispute
एएमयू - फोटो : संवाद

विस्तार

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और नगर निगम के बीच नगला पटवारी स्थित करीब 500 करोड़ रुपये की जमीन के विवाद मामले में बुधवार को एसडीएम कोल न्यायालय में सुनवाई हुई। इसमें नगर निगम ने एएमयू की ओर प्रस्तुत की गई 1941 की पंजीकृत डीड के प्रावधानों में ही अपने स्वामित्व का दावा तलाश कर उसे पेश किया। नगर निगम की ओर से सहायक नगर आयुक्त तपस्या यादव ने एसडीएम न्यायालय में इस बाबत प्रतिवेदन दिया।

विज्ञापन


इनमें नगर निगम की ओर से तर्क दिया गया है कि एएमयू की ओर से प्रस्तुत किया गया 25 जनवरी 1941 का पंजीकृत विलेख (रजिस्टर्ड डीड) ही उनसे दावों की पोल खोलता है। 1925 की अधिसूचना के अनुसार विश्वविद्यालय निर्माण के लिए 324.15 एकड़ जमीन का प्रस्ताव था, जिसमें से मात्र 197.57 एकड़ जमीन (शिड्यूल-1) ही एएमयू को दी गई थी। बाकी बची 126.58 एकड़ जमीन (शिड्यूल-1ए) को अधिग्रहण से मुक्त कर दिया गया था। वाद से संबंधित गाटा इसी शिड्यूल-1ए में आते हैं इसलिए इस पर एएमयू का कोई मालिकाना हक नहीं है।
विज्ञापन


नगर निगम ने ये दलील भी दी कि राजस्व अभिलेखों (कलेक्ट्रेट अलीगढ़ के दस्तावेजों) के अनुसार, वर्ष 1356 फसली तथा आधार वर्ष 1359 फसली और उसके बाद से लगातार यह भूमि राजस्व अभिलेखों में ऊसर व अन्य बंजर के रूप में दर्ज चली आ रही है। चूंकि यह भूमि ग्राम सभा की संपत्ति रही है और समय के साथ यह क्षेत्र नगर निगम सीमा में आ गया इसलिए उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश एवं भूमि सुधार अधिनियम तथा नगर निगम अधिनियम के प्रावधानों के तहत यह स्वतः नगर निगम की निहित संपत्ति बन जाती है।

विज्ञापन
विज्ञापन

नगर निगम का दावा है कि विवादित भूमि पर मौके पर कोई निर्माण नहीं है। जमीन बिल्कुल खाली पड़ी है इसलिए एएमयू की ओर से उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता-2006 की धारा-38(2) के तहत खतौनी में संशोधन का वाद निरस्त किए जाने योग्य है।

नगर निगम ने अभिलेखों के मजबूत साक्ष्य और राजस्व दस्तावेजों के आधार पर अपना पक्ष एसडीएम कोल न्यायालय में रखा है। न्यायालय से अनुरोध किया है कि एएमयू की ओर से प्रस्तुत प्रार्थना पत्र को खारिज किया जाए। पूर्व में पारित स्थगन आदेश को समाप्त किया जाए और नगर निगम के पक्ष को स्वीकार किया जाए। -प्रेम प्रकाश मीणा, नगर आयुक्त, नगर निगम
हम अभी दस्तावेजों का अध्ययन कर रहे हैं। नगर निगम की ओर से जो प्रतिवेदन और साक्ष्य प्रस्तुत किए हैं उनके लिए हम अपनी ओर से अपने दस्तावेज देख रहे हैं। इस मामले की अगली सुनवाई 29 सितंबर को होगी। उसमें एएमयू की ओर से भी अपना प्रतिवेदन रखा जाएगा। - प्रो. मोहम्मद नवेद, प्रॉक्टर, एएमयू


एएमयू ने बताया है खुद को असली मालिक
दूसरी ओर, एएमयू प्रशासन ने रजिस्ट्रार के माध्यम से पूर्व में प्रार्थना पत्र देकर दावा किया था कि यह भूमि 1940-1941 में गवर्नर की ओर से पंजीकृत दस्तावेजों के जरिये अर्जित की गई थी। एएमयू का तर्क था कि इस पर जमींदारी विनाश अधिनियम लागू नहीं होता और वे इस भूमि के असली मालिक हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed