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त्रिकोणीय मुकाबले में अपने-अपने समीकरणों के आधार पर तीनों कर रहे जीत का दावा
Mon, 15 Apr 2019 07:01 AM IST
vivek shukla
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, अलीगढ़
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Published by: vivek shukla
Updated Mon, 15 Apr 2019 07:01 AM IST
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भाजपा ने 2014 की मोदी लहर में ढाई लाख मतों से जीते मौजूदा सांसद सतीश गौतम को फिर उम्मीदवार बनाया है। भाजपा को राष्ट्रवाद और मोदी मैजिक का भरोसा है। कांग्रेस ने जिले के दिग्गज जाट नेता और तीन बार विधायक व 2004 में सांसद रह चुके चौधरी बिजेंद्र सिंह को मैदान में उतारा है। गठबंधन ने नए चेहरे पेशे से बिल्डर, जाट समाज से आने वाले डॉ. अजीत बालियान पर दांव खेला है। गठबंधन को तीनों पार्टियों का जातिगत समीकरण अपने पक्ष में नजर आ रहा है। प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया) भी पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष तेजवीर सिंह गुड्डू के बेटे दीपक चौधरी को टिकट देकर जाट वोटों में सेंध लगाने की कोशिश में है। तीन जाट उम्मीदवार होने के कारण माना जा रहा है कि उनके वोटों में बिखराव होगा। असमंजस मुस्लिम वोट को लेकर भी है कि वह किस ओर जाएगा।
समीकरण साधने के लिए सीएम ने की अतरौली में रैली: कल्याण के गढ़ में कड़ी चुनौती और लोधी-राजपतूत वोट बैंक में सेंधमारी की आशंका को देखते हुए सीएम योगी आदित्यनाथ को अतरौली में अलग से जनसभा करनी पड़ी।
गठबंधन के लिए प्रतिष्ठा का सवाल: अलीगढ़ में 2009 में सूबे के तत्कालीन मंत्री ठा.जयवीर सिंह की पत्नी राजकुमारी चौहान बसपा के टिकट पर जीती थीं। जयवीर अब भाजपा में हैं। रालोद विधायक ठा. दलवीर सिंह भी भाजपा में आ गए और विधायक हैं। विस चुनाव में हार के बाद मेयर का चुनाव जीतने से बसपा का आत्मविश्वास लौटा है। ऐसे में गठबंधन के लिए यह सीट प्रतिष्ठा की बन गई है।
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कांग्रेस रुतबा वापस पाने की जुगत में: छह बार यह लोकसभा सीट जीत चुकी कांग्रेस को आखिरी बार 2004 में यहां जीत नसीब हुई थी। तब चौधरी बिजेंद्र सिंह जीते थे।
सीट का इतिहास
यह सीट 1952 से 57 तक कांग्रेस के पास रही। 1962 में आरपीआई के खाते में गई। 1967 से 71 तक बीकेडी का कब्जा रहा। 1977 में भारतीय लोकदल और 1980 में जनता पार्टी ने जीती। 1984 में कांग्रेस की वापसी हुई। 1989 में जनता दल ने जीती। 1991 से 1999 तक चार बार भाजपा जीती। फिर 2004 में कांग्रेस लौटी। 2009 में बसपा ने और 2014 में भाजपा ने यह सीट जीती।
भाजपा उम्मीदवार का विरोध, आचार संहिता में उलझे कल्याण
भाजपा उम्मीदवार सतीश गौतम को टिकट मिलने के बाद कल्याण सिंह खेमा नाराज हुआ था। इसके चलते उनके आवास पर समर्थकों ने उग्र प्रदर्शन किया था और टिकट पाए मौजूदा सांसद के विरोध में जमकर नारेबाजी की थी। समर्थकों को समझाने के प्रयास में कल्याण सिंह ने पीएम मोदी को फिर से जिताने का आह्वान कर दिया था। यह आचार संहिता उल्लंघन का मामला बना और शिकायत राष्ट्रपति तक पहुंच गई है।
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समीकरण साधने के लिए सीएम ने की अतरौली में रैली: कल्याण के गढ़ में कड़ी चुनौती और लोधी-राजपतूत वोट बैंक में सेंधमारी की आशंका को देखते हुए सीएम योगी आदित्यनाथ को अतरौली में अलग से जनसभा करनी पड़ी।
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गठबंधन के लिए प्रतिष्ठा का सवाल: अलीगढ़ में 2009 में सूबे के तत्कालीन मंत्री ठा.जयवीर सिंह की पत्नी राजकुमारी चौहान बसपा के टिकट पर जीती थीं। जयवीर अब भाजपा में हैं। रालोद विधायक ठा. दलवीर सिंह भी भाजपा में आ गए और विधायक हैं। विस चुनाव में हार के बाद मेयर का चुनाव जीतने से बसपा का आत्मविश्वास लौटा है। ऐसे में गठबंधन के लिए यह सीट प्रतिष्ठा की बन गई है।
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कांग्रेस रुतबा वापस पाने की जुगत में: छह बार यह लोकसभा सीट जीत चुकी कांग्रेस को आखिरी बार 2004 में यहां जीत नसीब हुई थी। तब चौधरी बिजेंद्र सिंह जीते थे।
सीट का इतिहास
यह सीट 1952 से 57 तक कांग्रेस के पास रही। 1962 में आरपीआई के खाते में गई। 1967 से 71 तक बीकेडी का कब्जा रहा। 1977 में भारतीय लोकदल और 1980 में जनता पार्टी ने जीती। 1984 में कांग्रेस की वापसी हुई। 1989 में जनता दल ने जीती। 1991 से 1999 तक चार बार भाजपा जीती। फिर 2004 में कांग्रेस लौटी। 2009 में बसपा ने और 2014 में भाजपा ने यह सीट जीती।
भाजपा उम्मीदवार का विरोध, आचार संहिता में उलझे कल्याण
भाजपा उम्मीदवार सतीश गौतम को टिकट मिलने के बाद कल्याण सिंह खेमा नाराज हुआ था। इसके चलते उनके आवास पर समर्थकों ने उग्र प्रदर्शन किया था और टिकट पाए मौजूदा सांसद के विरोध में जमकर नारेबाजी की थी। समर्थकों को समझाने के प्रयास में कल्याण सिंह ने पीएम मोदी को फिर से जिताने का आह्वान कर दिया था। यह आचार संहिता उल्लंघन का मामला बना और शिकायत राष्ट्रपति तक पहुंच गई है।