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अलीगढ़ : काजी सत्तार के उपन्यासों के दुनिया भर में हैं मुरीद

Tue, 08 Feb 2022 01:15 AM IST
Aligarh Bureau अलीगढ़ ब्यूरो
Updated Tue, 08 Feb 2022 01:15 AM IST
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Aligarh: The novels of Qazi Sattar have fans all over the world
काजी अब्दुल सत्तार। - फोटो : CITY OFFICE
इकराम वारिस, अलीगढ़।
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उर्दू के मशहूर उपन्यासकार काजी अब्दुल सत्तार की जयंती 8 फरवरी को है। उनके उपन्यासों के भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में जहां-जहां उर्दू बोली और समझी जाती है, वहां-वहां लोग उसके मुरीद हैं। शिकस्त की आवाज, मज्जू भैया, दारा शिकोह सहित कई बेहतरीन उपन्यास के लिए उन्हें 41 वर्ष की आयु में पद्मश्री सम्मान मिला था।
काजी अब्दुल सत्तार, भले ही दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके उपन्यास में उनकी जिंदादिली और बेबाक जिंदगी का अक्स दिखता है। काजी अब्दुल सत्तार का जन्म 8 फरवरी 1933 को सीतापुर जिले के गांव मछरेटा में जमींदार परिवार में हुआ था।
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उनके पिता काजी अब्दुल अली, माता आलिमा खातून के साथ उनके मामू और चाचा का भी उनकी परवरिश में योगदान था। वर्ष 1950 में सीतापुर से इंटर पास करके वह लखनऊ विश्वविद्यालय पहुंचे। लखनऊ विश्वविद्यालय से एमए करने के बाद अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में शोध करने पहुंचे।
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वर्ष 1957 में उन्होंने ‘उर्दू शायरी में कुनूतियत’ विषय पर शोध करके पीएचडी की डिग्री हासिल की। वह एएमयू के उर्दू विभाग में प्रवक्ता नियुक्त हो गए। 1967 में रीडर व 1981 में प्रोफेसर बनाए गए। 1987 में विभाग के चेयरमैन बने और 1992 में सेवानिवृत्त हुए।
काजी का इशारा समझते थे शब्द : प्रेम कुमार
साहित्यकार प्रेम कुमार बताते हैं कि ‘इनकी (काजी अब्दुल सत्तार) जन्मतिथि और किसी के माध्यम से उन्हें याद करते हैं, लेकिन मेरा कोई दिन शायद ही ऐसा जाता हो, जब उनकी याद न आती हो। उनके जाने के बाद अलीगढ़ मेें शून्य पैदा हुआ है। वो हमेशा परेशान करता है।
वे निश्चित रूप से वाणी के जादूगर थे। शब्द उनका इशारा समझकर उनके मन के भावों को प्रकट कर सकते थे। उन्हेें मालूम था कि कैसे और कब शब्दों को कितना नुकीला, मारक, हथियार बनाकर पेश किया जाए या फिर कैसे शब्दों से अपनत्व और भाईचारे का भाव पैदा किया जाए।
अवध का इतिहास, संस्कृति पर जिस अधिकार से उन्होंने लिखा, लोक भाषा में अपने पात्रों को जिस तरह से रचा-गढ़ा वो अद्भुत है। इतिहास पर लिखे उनके उपन्यास और उनके पात्र तथा उनमें आए युद्धों का वर्णन निसंदेह अनूठे हैं, नितांत मौलिक हैं।
दारा शिकोह को लेकर उनकी ख्याति का आलम यह है कि आज भी उसके अनुपलब्ध होने पर उसकी फोटोकॉपी कहीं न कहीं से प्राप्त कर लेने के लिए उनके प्रशंसक आतुर रहते हैं। मुझे उनका बेहद प्यार मिला है। साथ जिया है। निकटता से जिया है और 40 वर्षों तक जीवन और साहित्य को लेकर उनसे कितनी बातें हुई हैं।

वो मुझे एक दोस्त की तरह दूसरे से परिचय कराते थे, लेकिन मेरे मन में उनकी इज्जत हमेशा अभिभावक की तरह बनी रही। उनको पढ़ना, उनको सुनना एक अलग तरह का सुख रहा। उनकी योग्य और लेखक शिष्यों की अच्छी खासी एक लंबी परंपरा है। अपनी गद्य रूपक के लिए बेहद प्रसिद्ध थे’।
काजी के खाते में आए सम्मान
1973 : प्रथम गालिब पुरस्कार
1974 : पद्मश्री
1977 : मीर अवॉर्ड
1977 : यूपी उर्दू अकादमी पुरस्कार
1987 : अल्मी पुरस्कार
1987 : राष्ट्रीय पुरस्कार यूपी सरकार
1996 : निशान-ए-सर सैयद पुरस्कार
1998 : ज्ञानेंद्र पुरस्कार
2002 :बहादुर शाह जफर पुरस्कार
2005 : अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार दोहा (कतर)
2006 : राष्ट्रीय इकबाल पुरस्कार
2008 : आईएसटी विश्वविद्यालय उर्दू शिक्षक पुरस्कार
2011 : यूपी हिंदी संस्थान का प्रथम पुरस्कार
काजी के प्रमुख उपन्यास
-शब गजीदा
-दारा शिकोह
-सलाहुद्दीन अयूबी
-खालिद इब्ने वालीद
-हजरत जान
-मज्जू भैया
-पीतल का घंटा (कहानी)
-गालिब
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