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डालियों को तोड़कर नहीं, वट वृक्ष के नीचे करें पूजा
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कल वृहस्पतिवार को वट सावित्री व्रत अमावस्या है। इस दिन महिलाएं पति और परिवार की सुख समृद्धि के लिए वट वृक्ष की पूजा करती हैं। वहीं, विगत सालों से चलन में आए घर में पूजा करने की परंपरा से प्रकृति को नुकसान पहुंचता है। शहर के धर्माचार्यों का मानना है कि वट वृक्ष से डालियां तोड़कर घर में पूजा करने से बेहतर है कि वट वृक्ष के नीचे जाकर पूजा करें। इसके साथ ही जीवन में एक वट वृक्ष अथवा पीपल के पौधे को अवश्य रोपें, जो आने वाली पीढ़ी के लिए बहुत ही लाभकारी सिद्ध होंगे।
हिंदू धर्म दर्शन के अनुसार पीपल को विष्णु का प्रतीक माना गया है। जबकि बरगद को शिव का प्रतीक माना जाता है। यह प्रकृति के सृजन का प्रतीक है। बहुत लम्बे समय तक जीवित रहने पर इसे अक्षयवट भी कहा जाता है। धर्माचार्यों ने बताया कि बरगद के वृक्ष का वैज्ञानिक और अनोखा महत्व भी है। इसकी छाया सीधे मन पर असर डालती है और मन को शांत बनाये रखती है। अकाल में भी यह वृक्ष हरा भरा रहता है। इसकी छाल से औषधियां बनाई जाती हैं। जबकि हिंदू दर्शन के मुताबिक प्रत्येक वनस्पति में प्राण होते हैं। ऐसे में वट सावित्री अमावस्या पर पूजा के लिए वट की डाल तोड़कर उसे घर में लाया जाता है। कुछ लोग गमले में इसे रोपते हैं और पूजा करते हैं। कुछ दिनों के बाद डाली सूख जाती है। धर्माचार्यों का कहना है कि ऐसा नहीं होना चाहिए। आखिर जीवित वनस्पति को तोड़कर नहीं, बल्कि उसके पास बैठकर पूजना चाहिए।
भारतीय दर्शन में यह मान्यता है कि एक वृक्ष दस पुत्रों के बराबर होता है। ऐसे पूजा के दिन वट वृक्ष की डालियां तोड़कर लाना उचित नहीं माना जाता। प्रत्येक वनस्पति में भी प्राण होते हैं। भले ही वह बोल न पाए। लेकिन मनुष्य के भाव को समझते हैं। विज्ञान भी यही मानता है। कोरोना संक्रमण काल में जब ऑक्सीजन की त्राहि त्राहि हुई तो हमें हरे भरे पेड़ पौधों की सुध आई। इसलिए डालियों को तोड़कर नहीं, बल्कि वृक्ष के नीचे बैठकर पूजा करनी चाहिए। बल्कि हालातों को देखते हुए हमें संकल्प लेना चाहिए कि जीवन में कम से कम एक वटवृक्ष अथवा पीपल के पौधे का रोपण करेंगे।
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-सुनील कौशल महाराज, आध्यात्मिक गुरू।
वट सावित्री व्रत में वट यानि बरगद के वृक्ष के साथ-साथ सत्यवान-सावित्रि और यमराज की पूजा की जाती है। माना जाता है कि वटवृक्ष में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों देव वास करते हैं। इसीलिए वट वृक्ष के समक्ष बैठकर पूजा करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। न कि घर में डाली तोड़कर पूजा करने पर। प्रकृति को हम हरा भरा रखेंगे, तभी हम स्वस्थ रह सकते हैं। इसीलिए सभी लोग कम से कम एक वट वृक्ष अथवा पौधे का रोपण करें। जिससे प्रकृति को बचाया जा सके।
-पं. हृदय रंजन शर्मा, अध्यक्ष श्री गुरू ज्योतिष शोध संस्थान।
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हिंदू धर्म दर्शन के अनुसार पीपल को विष्णु का प्रतीक माना गया है। जबकि बरगद को शिव का प्रतीक माना जाता है। यह प्रकृति के सृजन का प्रतीक है। बहुत लम्बे समय तक जीवित रहने पर इसे अक्षयवट भी कहा जाता है। धर्माचार्यों ने बताया कि बरगद के वृक्ष का वैज्ञानिक और अनोखा महत्व भी है। इसकी छाया सीधे मन पर असर डालती है और मन को शांत बनाये रखती है। अकाल में भी यह वृक्ष हरा भरा रहता है। इसकी छाल से औषधियां बनाई जाती हैं। जबकि हिंदू दर्शन के मुताबिक प्रत्येक वनस्पति में प्राण होते हैं। ऐसे में वट सावित्री अमावस्या पर पूजा के लिए वट की डाल तोड़कर उसे घर में लाया जाता है। कुछ लोग गमले में इसे रोपते हैं और पूजा करते हैं। कुछ दिनों के बाद डाली सूख जाती है। धर्माचार्यों का कहना है कि ऐसा नहीं होना चाहिए। आखिर जीवित वनस्पति को तोड़कर नहीं, बल्कि उसके पास बैठकर पूजना चाहिए।
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भारतीय दर्शन में यह मान्यता है कि एक वृक्ष दस पुत्रों के बराबर होता है। ऐसे पूजा के दिन वट वृक्ष की डालियां तोड़कर लाना उचित नहीं माना जाता। प्रत्येक वनस्पति में भी प्राण होते हैं। भले ही वह बोल न पाए। लेकिन मनुष्य के भाव को समझते हैं। विज्ञान भी यही मानता है। कोरोना संक्रमण काल में जब ऑक्सीजन की त्राहि त्राहि हुई तो हमें हरे भरे पेड़ पौधों की सुध आई। इसलिए डालियों को तोड़कर नहीं, बल्कि वृक्ष के नीचे बैठकर पूजा करनी चाहिए। बल्कि हालातों को देखते हुए हमें संकल्प लेना चाहिए कि जीवन में कम से कम एक वटवृक्ष अथवा पीपल के पौधे का रोपण करेंगे।
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-सुनील कौशल महाराज, आध्यात्मिक गुरू।
वट सावित्री व्रत में वट यानि बरगद के वृक्ष के साथ-साथ सत्यवान-सावित्रि और यमराज की पूजा की जाती है। माना जाता है कि वटवृक्ष में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों देव वास करते हैं। इसीलिए वट वृक्ष के समक्ष बैठकर पूजा करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। न कि घर में डाली तोड़कर पूजा करने पर। प्रकृति को हम हरा भरा रखेंगे, तभी हम स्वस्थ रह सकते हैं। इसीलिए सभी लोग कम से कम एक वट वृक्ष अथवा पौधे का रोपण करें। जिससे प्रकृति को बचाया जा सके।
-पं. हृदय रंजन शर्मा, अध्यक्ष श्री गुरू ज्योतिष शोध संस्थान।