{"_id":"62e83519a4cea80f832bec2e","slug":"aligarh-news-aligarh-news-ali297313165","type":"story","status":"publish","title_hn":"कुछ ने संगीनों के आगे ताना सीना तो कुछ ने फांसी का फंदा चूमा","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
कुछ ने संगीनों के आगे ताना सीना तो कुछ ने फांसी का फंदा चूमा
विज्ञापन
मदार गेट पुलिस चौकी पर लगा यह वही पेड़ है जहां आजादी के मतवालों को फांसी दी गई थी।
- फोटो : CITY OFFICE
इकराम वारिस
जंग-ए-आजादी का दीपक शहीदों की शहादत से रौशन हुआ। अंग्रेजों की बर्बरता भयानक थी। उनकी हुकूमत के खिलाफ आवाज उठाने वाले को मौत की सजा देने में देर नहीं लगाते थे। इसकी परवाह किए बगैर आजादी के मतवालों ने सरफरोशी की तमन्ना अपने अंदर पाले रखा। जंग-ए-आजादी के कई पुरोधाओं ने संगीनों के आगे अपना सीना अड़ा दिया तो कई फांसी के तख्ते को हंस कर चूमा। अंग्रेजों की बर्बरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देशभक्तों को फांसी के फंदे पर उन्हीं के अपनों के सामने लटका देते थे। जिले में कुछ ऐसे ही स्वतंत्रता संग्राम के तीर्थ स्थल हैं, जहां देशभक्तों की यादें हैं।
जामा मस्जिद में 73 शहीदों की कब्रें
जामा मस्जिद में 1857 के गदर में 73 शहीदों की कब्रें हैं। मस्जिद परिसर में शहीदों की कब्र के चलते इसे गंज-ए-शहीदान (शहीदों की बस्ती) भी कहते हैं। यह मस्जिद 294 साल पुरानी है।
सराफा बाजार में फांसीघर
महानगर में सराफा बाजार जो फूल चौराहा के पास है। इस बाजार में अंग्रेजों के शासनकाल में फांसीघर था, जो फांसी कुंआ के नाम से मशहूर है। इस फांसीघर में 30 से ज्यादा देश भक्तों को अंग्रेज अफसरों ने फांसी के फंदे पर लटका दिया था। उस वक्त इस कुंआ का काफी खौफ था। इसके आसपास से गुजरने से लोग बचते थे। वहीं, मदार गेट पुलिस चौकी में भी देशभक्त को फांसी पर लटकाया गया था।
विज्ञापन
शहीदों के तीर्थ स्थल
-अकराबाद में छह अक्तूबर 1857 को कर्नल ग्रीथेड ने मंगल सिंह व महताब सिंह के किले को ध्वस्त करके उन्हें फांसी के फंदे पर लटका दिया।
-अतरौली में 23 अगस्त 1942 को पुलिस की गोली से देश भक्त बनारसी दास शहीद हो गए थे।
-खैर में 1 जून 1857 को देशभक्त राव भोपाल सिंह ने जनरल वाटसन ने करवन नदी के किनारे ले जाकर पीपल के पेड़ पर फांसी के फंदे पर लटका दिया था।
-टप्पल के गांव शादीपुर में शहीद भगत सिंह ने 18 महीने समय गुजारा। इस दौरान उन्होंने बच्चों को पढ़ाया भी।
डीएस कॉलेज के इतिहास विभाग के अध्यक्ष डॉ. राजेश कुमार ने बताया कि 1999-2000 में रिसर्च करने के दौरान दिल्ली गए थे, जहां आर्काइव सेंटर दिल्ली में अलीगढ़ में देशभक्तों को फांसी देने की पत्रावली थी। उन्होंने कहा कि एक बार अलीगढ़ आजाद हिंद फौज की महिला रेजीमेंट की पहली कैप्टन डॉ. लक्ष्मी सहगल आई थीं। बातचीत में उन्होंने कहा था ऊपरकोट की तंग गलियों से होकर एक मैदान पड़ता था, जहां देशभक्तों को देशवासियों के सामने अंग्रेज फांसी के फंदे पर लटका देते थे।
विज्ञापन
जंग-ए-आजादी का दीपक शहीदों की शहादत से रौशन हुआ। अंग्रेजों की बर्बरता भयानक थी। उनकी हुकूमत के खिलाफ आवाज उठाने वाले को मौत की सजा देने में देर नहीं लगाते थे। इसकी परवाह किए बगैर आजादी के मतवालों ने सरफरोशी की तमन्ना अपने अंदर पाले रखा। जंग-ए-आजादी के कई पुरोधाओं ने संगीनों के आगे अपना सीना अड़ा दिया तो कई फांसी के तख्ते को हंस कर चूमा। अंग्रेजों की बर्बरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देशभक्तों को फांसी के फंदे पर उन्हीं के अपनों के सामने लटका देते थे। जिले में कुछ ऐसे ही स्वतंत्रता संग्राम के तीर्थ स्थल हैं, जहां देशभक्तों की यादें हैं।
जामा मस्जिद में 73 शहीदों की कब्रें
जामा मस्जिद में 1857 के गदर में 73 शहीदों की कब्रें हैं। मस्जिद परिसर में शहीदों की कब्र के चलते इसे गंज-ए-शहीदान (शहीदों की बस्ती) भी कहते हैं। यह मस्जिद 294 साल पुरानी है।
विज्ञापन
सराफा बाजार में फांसीघर
महानगर में सराफा बाजार जो फूल चौराहा के पास है। इस बाजार में अंग्रेजों के शासनकाल में फांसीघर था, जो फांसी कुंआ के नाम से मशहूर है। इस फांसीघर में 30 से ज्यादा देश भक्तों को अंग्रेज अफसरों ने फांसी के फंदे पर लटका दिया था। उस वक्त इस कुंआ का काफी खौफ था। इसके आसपास से गुजरने से लोग बचते थे। वहीं, मदार गेट पुलिस चौकी में भी देशभक्त को फांसी पर लटकाया गया था।
विज्ञापन
शहीदों के तीर्थ स्थल
-अकराबाद में छह अक्तूबर 1857 को कर्नल ग्रीथेड ने मंगल सिंह व महताब सिंह के किले को ध्वस्त करके उन्हें फांसी के फंदे पर लटका दिया।
-अतरौली में 23 अगस्त 1942 को पुलिस की गोली से देश भक्त बनारसी दास शहीद हो गए थे।
-खैर में 1 जून 1857 को देशभक्त राव भोपाल सिंह ने जनरल वाटसन ने करवन नदी के किनारे ले जाकर पीपल के पेड़ पर फांसी के फंदे पर लटका दिया था।
-टप्पल के गांव शादीपुर में शहीद भगत सिंह ने 18 महीने समय गुजारा। इस दौरान उन्होंने बच्चों को पढ़ाया भी।
डीएस कॉलेज के इतिहास विभाग के अध्यक्ष डॉ. राजेश कुमार ने बताया कि 1999-2000 में रिसर्च करने के दौरान दिल्ली गए थे, जहां आर्काइव सेंटर दिल्ली में अलीगढ़ में देशभक्तों को फांसी देने की पत्रावली थी। उन्होंने कहा कि एक बार अलीगढ़ आजाद हिंद फौज की महिला रेजीमेंट की पहली कैप्टन डॉ. लक्ष्मी सहगल आई थीं। बातचीत में उन्होंने कहा था ऊपरकोट की तंग गलियों से होकर एक मैदान पड़ता था, जहां देशभक्तों को देशवासियों के सामने अंग्रेज फांसी के फंदे पर लटका देते थे।