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अलीगढ़ : गांधी जी के असहयोग आंदोलन को अलीगढ़ में मिली धार
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महात्मा गांधी के साथ अब्दुल मजीद ख्वाजा।
- फोटो : CITY OFFICE
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इकराम वारिस, अलीगढ़।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन को अलीगढ़ में धार मिली। उस समय देश में असहयोग आंदोलन और खिलाफत मूवमेंट जैसे आंदोलन चल रहे थे, लेकिन दोनों आंदोलनों की गति काफी कम थी। इस पर महात्मा गांधी मोहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज (अब अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय) आए।
यहां पर उन्होंने छात्रों से समर्थन मांगा। इसके बाद एएमयू की जामा मस्जिद में देशभर के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की हुई बैठक में आंदोलन की रणनीति बनी। फिर आंदोलन ने देशभर में रफ्तार पकड़ ली। महात्मा गांधी तीन बार अलीगढ़ आए थे, उन्हें एएमयू छात्रसंघ ने आजीवन सदस्यता दी थी। आज महात्मा गांधी की पुण्यतिथि है। उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि देने के साथ उनसे जुड़ी स्मृतियां भी जीवंत हो उठीं।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के करीबी रहे शिक्षाविद् अब्दुल मजीद ख्वाजा के नाती तारिक हसन के अनुसार, देश की आजादी से पहले दो आंदोलन चल रहे थे। इनमें एक गांधी जी का असहयोग आंदोलन था तो दूसरा मौलाना मोहम्मद अली जौहर का खिलाफत मूवमेंट था, लेकिन दोनों आंदोलनों में जान नहीं थी।
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महात्मा गांधी ने लोगों से असहयोग आंदोलन में सहयोग करने की अपील की। इसमें विदेशी कपड़ों को आग के हवाले करना, शैक्षिक संस्थाओं को बंद करके आंदोलन में विद्यार्थी व शिक्षकों को बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेना, आभूषण भेंट करना शामिल है।
इसी कड़ी में गांधी जी बीएचयू गए, जहां उन्होंने समर्थन मांगा, लेकिन जवाब संतोषजनक नहीं मिला। इसके बाद वह 11 अक्तूबर 1920 को अलीगढ़ आए। यहां उनका जोरदार स्वागत किया गया। महात्मा गांधी ने 12 अक्तूबर 1920 को उन्होंने मोहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज (एएमयू) के विद्यार्थियों को संबोधित किया। उनसे आंदोलन में सहयोग मांगा।
जवाब में विद्यार्थियों ने कहा, वह उनके साथ हैं। यह सुनकर गांधी जी भाव विभोर हो गए। 28 अक्तूबर 1920 तक एएमयू की जामा मस्जिद में देशभर के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की बैठक हुई, जिसकी अध्यक्षता स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मौलाना महमूदुल हसन ने की। ये 17 दिन काफी अहम रहे। इसके बाद पूरे देश में आंदोलन ने गति पकड़ ली।
एएमयू में गांधी जी से जुड़ी वस्तुएं संरक्षित
एएमयू उर्दू एकेडमी के पूर्व निदेशक डॉ. राहत अबरार के मुताबिक, 1920 में एएमयू छात्रसंघ ने मुख्य अतिथि के रूप में गांधी जी को आमंत्रित किया था। उन्हें आजीवन सदस्यता दी गई। महात्मा गांधी उस समय राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय अब्दुल मजीद ख्वाजा के आवास पर भी गए थे।
मौजूदा समय में जो विश्वविद्यालय का एकेडमिक टीचर्स ट्रेनिंग सेंटर है, वह उस समय अब्दुल मजीद ख्वाजा का आवास हुआ करता था। यहां पर राष्ट्रीय आंदोलन के संबंध में कई महत्वपूर्ण फैसले लिए गए। राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े कई बड़े नेता भी महात्मा गांधी के साथ आए थे। महात्मा गांधी तीन बार अलीगढ़ आए थे। एएमयू में गांधी जी से जुड़ी कुछ वस्तुएं संरक्षित हैं।
ख्वाजा शहीद होंगे तो नाचेंगे
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अब्दुल मजीद ख्वाजा के नाती तारिक हसन के मुताबिक, एक साक्षात्कार में अब्दुल मजीद के बेटे ‘रवींद्र ख्वाजा ने कहा था, गांधी जी के शहीद होने से तीन दिन पहले यानी 27 जनवरी 1948 को दिल्ली में उनके साथ अब्दुल मजीद ख्वाजा प्रवचन तख्त पर बैठे थे।
उस वक्त गांधीजी ने कहा था, अगर हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए अब्दुल मजीद शहीद होंगे तो वह नाचने लगेंगे। इस पर उन्हें भी खुशी होगी। उन्होंने कहा, ख्वाजा और बादशाह खान (अब्दुल गफ्फार खान) जैसे तीन-चार लोग मिल जाते तो देश का बंटवारा नहीं होता। तारिक हसन ने कहा, महात्मा गांधी के पार्थिव शरीर के समीप सर्वधर्म सभा का पाठ हुआ, जिसमें अब्दुल मजीद ख्वाजा ने कुरान का पाठ किया।
भस्मी पात्र देखने के लिए उमड़ी भीड़
अलीगढ़ रेलवे स्टेशन पर गांधी जी के भस्मी पात्र को देखने के लिए भीड़ उमड़ पड़ी। भस्मी पात्र, दिल्ली से इलाहाबाद (प्रयागराज) ले जाया जा रहा था। लेफ्टिनेंट चिंतामणि ने अपनी किताब में उल्लेख किया है कि रेलवे ने पटरी की दोनों ओर बैरिकेडिंग लगाई थी। ट्रेन रुकते ही लोगों ने पुष्प वर्षा कर उन्हें अंतिम विदाई दी।
गांधी जी के आह्वान पर आंदोलन में कूदे ठा. नवाब सिंह
गांधी जी के आह्वान पर वर्ष 1930 में ठा. नवाब सिंह राष्ट्रीय आंदोलन में कूद पड़े थे, वह उस समय छात्र थे। उन्हें विद्यालय से निष्कासित कर दिया गया था। वह मलखान सिंह, तोताराम राठी व टोडर सिंह आदि के साथ जेल गए।
19 अक्तूबर 1940 को सत्याग्रह किया, जिसमें छेदालाल मूढ़, ठा. साहब सिंह, फारूक अहमद के साथ गिरफ्तारी दी। 22 अगस्त 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन में ठा. मलखान सिंह अन्य साथियों के साथ गिरफ्तारी दी। ठा. नवाब सिंह के बेटे योगेंद्र चौहान ने बताया कि पिताजी ने वर्ष 1939, 1941, 1942 के स्वतंत्रता आंदोलन में भी जेल काटी।
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राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन को अलीगढ़ में धार मिली। उस समय देश में असहयोग आंदोलन और खिलाफत मूवमेंट जैसे आंदोलन चल रहे थे, लेकिन दोनों आंदोलनों की गति काफी कम थी। इस पर महात्मा गांधी मोहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज (अब अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय) आए।
यहां पर उन्होंने छात्रों से समर्थन मांगा। इसके बाद एएमयू की जामा मस्जिद में देशभर के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की हुई बैठक में आंदोलन की रणनीति बनी। फिर आंदोलन ने देशभर में रफ्तार पकड़ ली। महात्मा गांधी तीन बार अलीगढ़ आए थे, उन्हें एएमयू छात्रसंघ ने आजीवन सदस्यता दी थी। आज महात्मा गांधी की पुण्यतिथि है। उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि देने के साथ उनसे जुड़ी स्मृतियां भी जीवंत हो उठीं।
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राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के करीबी रहे शिक्षाविद् अब्दुल मजीद ख्वाजा के नाती तारिक हसन के अनुसार, देश की आजादी से पहले दो आंदोलन चल रहे थे। इनमें एक गांधी जी का असहयोग आंदोलन था तो दूसरा मौलाना मोहम्मद अली जौहर का खिलाफत मूवमेंट था, लेकिन दोनों आंदोलनों में जान नहीं थी।
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महात्मा गांधी ने लोगों से असहयोग आंदोलन में सहयोग करने की अपील की। इसमें विदेशी कपड़ों को आग के हवाले करना, शैक्षिक संस्थाओं को बंद करके आंदोलन में विद्यार्थी व शिक्षकों को बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेना, आभूषण भेंट करना शामिल है।
इसी कड़ी में गांधी जी बीएचयू गए, जहां उन्होंने समर्थन मांगा, लेकिन जवाब संतोषजनक नहीं मिला। इसके बाद वह 11 अक्तूबर 1920 को अलीगढ़ आए। यहां उनका जोरदार स्वागत किया गया। महात्मा गांधी ने 12 अक्तूबर 1920 को उन्होंने मोहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज (एएमयू) के विद्यार्थियों को संबोधित किया। उनसे आंदोलन में सहयोग मांगा।
जवाब में विद्यार्थियों ने कहा, वह उनके साथ हैं। यह सुनकर गांधी जी भाव विभोर हो गए। 28 अक्तूबर 1920 तक एएमयू की जामा मस्जिद में देशभर के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की बैठक हुई, जिसकी अध्यक्षता स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मौलाना महमूदुल हसन ने की। ये 17 दिन काफी अहम रहे। इसके बाद पूरे देश में आंदोलन ने गति पकड़ ली।
एएमयू में गांधी जी से जुड़ी वस्तुएं संरक्षित
एएमयू उर्दू एकेडमी के पूर्व निदेशक डॉ. राहत अबरार के मुताबिक, 1920 में एएमयू छात्रसंघ ने मुख्य अतिथि के रूप में गांधी जी को आमंत्रित किया था। उन्हें आजीवन सदस्यता दी गई। महात्मा गांधी उस समय राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय अब्दुल मजीद ख्वाजा के आवास पर भी गए थे।
मौजूदा समय में जो विश्वविद्यालय का एकेडमिक टीचर्स ट्रेनिंग सेंटर है, वह उस समय अब्दुल मजीद ख्वाजा का आवास हुआ करता था। यहां पर राष्ट्रीय आंदोलन के संबंध में कई महत्वपूर्ण फैसले लिए गए। राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े कई बड़े नेता भी महात्मा गांधी के साथ आए थे। महात्मा गांधी तीन बार अलीगढ़ आए थे। एएमयू में गांधी जी से जुड़ी कुछ वस्तुएं संरक्षित हैं।
ख्वाजा शहीद होंगे तो नाचेंगे
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अब्दुल मजीद ख्वाजा के नाती तारिक हसन के मुताबिक, एक साक्षात्कार में अब्दुल मजीद के बेटे ‘रवींद्र ख्वाजा ने कहा था, गांधी जी के शहीद होने से तीन दिन पहले यानी 27 जनवरी 1948 को दिल्ली में उनके साथ अब्दुल मजीद ख्वाजा प्रवचन तख्त पर बैठे थे।
उस वक्त गांधीजी ने कहा था, अगर हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए अब्दुल मजीद शहीद होंगे तो वह नाचने लगेंगे। इस पर उन्हें भी खुशी होगी। उन्होंने कहा, ख्वाजा और बादशाह खान (अब्दुल गफ्फार खान) जैसे तीन-चार लोग मिल जाते तो देश का बंटवारा नहीं होता। तारिक हसन ने कहा, महात्मा गांधी के पार्थिव शरीर के समीप सर्वधर्म सभा का पाठ हुआ, जिसमें अब्दुल मजीद ख्वाजा ने कुरान का पाठ किया।
भस्मी पात्र देखने के लिए उमड़ी भीड़
अलीगढ़ रेलवे स्टेशन पर गांधी जी के भस्मी पात्र को देखने के लिए भीड़ उमड़ पड़ी। भस्मी पात्र, दिल्ली से इलाहाबाद (प्रयागराज) ले जाया जा रहा था। लेफ्टिनेंट चिंतामणि ने अपनी किताब में उल्लेख किया है कि रेलवे ने पटरी की दोनों ओर बैरिकेडिंग लगाई थी। ट्रेन रुकते ही लोगों ने पुष्प वर्षा कर उन्हें अंतिम विदाई दी।
गांधी जी के आह्वान पर आंदोलन में कूदे ठा. नवाब सिंह
गांधी जी के आह्वान पर वर्ष 1930 में ठा. नवाब सिंह राष्ट्रीय आंदोलन में कूद पड़े थे, वह उस समय छात्र थे। उन्हें विद्यालय से निष्कासित कर दिया गया था। वह मलखान सिंह, तोताराम राठी व टोडर सिंह आदि के साथ जेल गए।
19 अक्तूबर 1940 को सत्याग्रह किया, जिसमें छेदालाल मूढ़, ठा. साहब सिंह, फारूक अहमद के साथ गिरफ्तारी दी। 22 अगस्त 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन में ठा. मलखान सिंह अन्य साथियों के साथ गिरफ्तारी दी। ठा. नवाब सिंह के बेटे योगेंद्र चौहान ने बताया कि पिताजी ने वर्ष 1939, 1941, 1942 के स्वतंत्रता आंदोलन में भी जेल काटी।