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अलीगढ़ : 15 अगस्त 1947... घर-घर जले थे घी के दीये, मना था जश्न
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आजादी का अमृत महोत्सव के तहत रामघाट रोड तिरंगा यात्रा निकालते होमगार्ड कर्मी । अमर उजाला
- फोटो : CITY OFFICE
इकराम वारिस, अलीगढ़।
15 अगस्त 1947...अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति और खुले आसमां में सांस लेने का दिन था। हर तरफ उल्लास, उमंग और नई ऊर्जा का संचार हो रहा था। उस दिन एक नए और स्वतंत्र भारत का उदय हुआ था। अलीगढ़ समेत पूरा भारत आजादी के जश्न में डूबा रहा। यह कहना है 15 अगस्त 1947 के उस स्वर्णिम दिन को देख चुके अलीगढ़ शहर के बुजुर्गों का।
उन्होंने बताया कि अलीगढ़ में इस ऐतिहासिक दिन को बड़े ही अभूतपूर्व ढंग से मनाया गया। जगह जगह सजावट की गई थी। घर-घर घी के दीये जलाए गए थे। खादी के तिरंगे फहराए गए थे। स्कूल और कॉलेज में अलग ही उत्साह का संचार हो रहा था। एएमयू में भी माहौल बदला हुआ था।
हर तरफ बधाइयों का दौर चल रहा था। देश की आजादी के अगुवा रहे ठा. मलखान सिंह, ज्वाला प्रसाद जिज्ञासु, ठा. टोडर सिंह, नंद कुमार वशिष्ठ, ख्वाजा अब्दुल मजीद ने सभाओं को संबोधित किया। बुजुर्गों ने बताया कि वह भी आजादी के जश्न में हाथों में तिरंगा लेकर सड़कों पर खूब दौड़े थे।
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आजादी का दिन देखा, अब 75वां साल भी : उवैस
महानगर के पठान मोहल्ला निवासी उवैस मोहम्मद खान (84) बताते हैं कि आजादी से पहले की कहानी सुनकर दिल दुखता था। भारत की जनता पर अंग्रेजों ने बहुत जुल्म किए थे, लेकिन जब देश आजाद हुआ तो वह दृश्य अविस्मरणीय था। लोग उत्साह से भर गए थे। आंखों में आजादी की खुशी के आंसू थे।
लोग हाथों में तिरंगा लेकर घर से निकलते थे। उस वक्त काजीपाड़ा में स्थित एएमयू सिटी गर्ल्स स्कूल में बड़ा आयोजन किया गया था, जिसमें आजादी का जश्न मनाया गया था। उस वक्त उनकी उम्र कम थी, लेकिन उस जश्न के हिस्सा थे। यह उनका सौभाग्य है कि आजादी के 75 साल बाद देश भर में मनाए जा रहे जश्न के गवाह बनने जा रहे हैं।
उत्सव जैसे माहौल का बना था हिस्सा : धर्मेंद्र
महानगर के खिनीगेट निवासी धर्मेंद्र कुमार जैन (83) कहते हैं कि जब देश आजाद हुआ था, उस वक्त उनकी उम्र 8 साल की थी, वह हाथरस में रहते थे। देश की आजादी की लड़ाई की कहानी अपने पिताजी से सुना करते थे, लेकिन जब 15 अगस्त 1947 को देश अंग्रेजों से आजाद हुआ तो देश भर में जश्न का माहौल था।
अलीगढ़ जिले में भी जश्न था। सड़कों पर लोग हाथों में तिरंगा लेकर निकल पड़ थे। उन्हें उस वक्त यह तो नहीं पता था कि आजादी का मतलब क्या होता है, लेकिन उत्सव जैसे माहौल में वह भी उसका हिस्सा बने थे। आज भी वह दृश्य आंखों के सामने घूमने लगता है। उस वक्त न कोई हिंदू था, न मुसलमान था। सभी हिंदुस्तानी थे।
कई दिनों तक चला था आजादी का जश्न : नरेंद्र
महानगर के ज्ञान सरोवर निवासी नरेंद्र मोहन सक्सेना (86) ने बताया कि आजादी का जश्न आज भी याद है। 15 अगस्त 1947 को देश में एक तरफ खुशी का माहौल था तो दूसरी तरफ अराजकता का भी माहौल था। मुसलमान पाकिस्तान की तरफ भाग रहे थे तो हिंदू शरणार्थी बनकर हिंदुस्तान आ रहे थे, लेकिन आजादी का जश्न अपने पूरे जोश में था।
उस समय लोगों ने घरों में तिरंगे लगाए थे। वह भी सड़क पर झंडे लेकर दौड़े थे। सबके हाथों में तिरंगा था। आजादी के जश्न में पूरा हिंदुस्तान डूबा था। आजादी का जश्न केवल एक दिन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि कई दिनों तक चलता रहा है। उस वक्त सभी लोगों में अलग ही खुशी थी।
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15 अगस्त 1947...अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति और खुले आसमां में सांस लेने का दिन था। हर तरफ उल्लास, उमंग और नई ऊर्जा का संचार हो रहा था। उस दिन एक नए और स्वतंत्र भारत का उदय हुआ था। अलीगढ़ समेत पूरा भारत आजादी के जश्न में डूबा रहा। यह कहना है 15 अगस्त 1947 के उस स्वर्णिम दिन को देख चुके अलीगढ़ शहर के बुजुर्गों का।
उन्होंने बताया कि अलीगढ़ में इस ऐतिहासिक दिन को बड़े ही अभूतपूर्व ढंग से मनाया गया। जगह जगह सजावट की गई थी। घर-घर घी के दीये जलाए गए थे। खादी के तिरंगे फहराए गए थे। स्कूल और कॉलेज में अलग ही उत्साह का संचार हो रहा था। एएमयू में भी माहौल बदला हुआ था।
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हर तरफ बधाइयों का दौर चल रहा था। देश की आजादी के अगुवा रहे ठा. मलखान सिंह, ज्वाला प्रसाद जिज्ञासु, ठा. टोडर सिंह, नंद कुमार वशिष्ठ, ख्वाजा अब्दुल मजीद ने सभाओं को संबोधित किया। बुजुर्गों ने बताया कि वह भी आजादी के जश्न में हाथों में तिरंगा लेकर सड़कों पर खूब दौड़े थे।
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आजादी का दिन देखा, अब 75वां साल भी : उवैस
महानगर के पठान मोहल्ला निवासी उवैस मोहम्मद खान (84) बताते हैं कि आजादी से पहले की कहानी सुनकर दिल दुखता था। भारत की जनता पर अंग्रेजों ने बहुत जुल्म किए थे, लेकिन जब देश आजाद हुआ तो वह दृश्य अविस्मरणीय था। लोग उत्साह से भर गए थे। आंखों में आजादी की खुशी के आंसू थे।
लोग हाथों में तिरंगा लेकर घर से निकलते थे। उस वक्त काजीपाड़ा में स्थित एएमयू सिटी गर्ल्स स्कूल में बड़ा आयोजन किया गया था, जिसमें आजादी का जश्न मनाया गया था। उस वक्त उनकी उम्र कम थी, लेकिन उस जश्न के हिस्सा थे। यह उनका सौभाग्य है कि आजादी के 75 साल बाद देश भर में मनाए जा रहे जश्न के गवाह बनने जा रहे हैं।
उत्सव जैसे माहौल का बना था हिस्सा : धर्मेंद्र
महानगर के खिनीगेट निवासी धर्मेंद्र कुमार जैन (83) कहते हैं कि जब देश आजाद हुआ था, उस वक्त उनकी उम्र 8 साल की थी, वह हाथरस में रहते थे। देश की आजादी की लड़ाई की कहानी अपने पिताजी से सुना करते थे, लेकिन जब 15 अगस्त 1947 को देश अंग्रेजों से आजाद हुआ तो देश भर में जश्न का माहौल था।
अलीगढ़ जिले में भी जश्न था। सड़कों पर लोग हाथों में तिरंगा लेकर निकल पड़ थे। उन्हें उस वक्त यह तो नहीं पता था कि आजादी का मतलब क्या होता है, लेकिन उत्सव जैसे माहौल में वह भी उसका हिस्सा बने थे। आज भी वह दृश्य आंखों के सामने घूमने लगता है। उस वक्त न कोई हिंदू था, न मुसलमान था। सभी हिंदुस्तानी थे।
कई दिनों तक चला था आजादी का जश्न : नरेंद्र
महानगर के ज्ञान सरोवर निवासी नरेंद्र मोहन सक्सेना (86) ने बताया कि आजादी का जश्न आज भी याद है। 15 अगस्त 1947 को देश में एक तरफ खुशी का माहौल था तो दूसरी तरफ अराजकता का भी माहौल था। मुसलमान पाकिस्तान की तरफ भाग रहे थे तो हिंदू शरणार्थी बनकर हिंदुस्तान आ रहे थे, लेकिन आजादी का जश्न अपने पूरे जोश में था।
उस समय लोगों ने घरों में तिरंगे लगाए थे। वह भी सड़क पर झंडे लेकर दौड़े थे। सबके हाथों में तिरंगा था। आजादी के जश्न में पूरा हिंदुस्तान डूबा था। आजादी का जश्न केवल एक दिन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि कई दिनों तक चलता रहा है। उस वक्त सभी लोगों में अलग ही खुशी थी।