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विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस: कोरोना फोबिया ने बिगाड़ी लोगों की 'दिमागी सेहत', चिकित्सकों ने बताए स्वस्थ्य रहने के उपाय

Sun, 10 Oct 2021 03:00 PM IST
Abhishek Saxena न्यूज डेस्क अमर उजाला, आगरा
न्यूज डेस्क अमर उजाला, आगरा Published by: Abhishek Saxena Updated Sun, 10 Oct 2021 03:00 PM IST
सार

वरिष्ठ मानसिक रोग विशेषज्ञ डॉ. यूसी गर्ग ने बताया कि कोरोना महामारी में नौकरी छूट जाने, आधा वेतन कर देने, लॉकडाउन में उधारी न मिलने, व्यापार न चलने या फिर दोबारा संक्रमण बढ़ने, फिर से लॉकडाउन की आशंका से व्यापारी और नौकरीपेशा तनाव और अवसाद के शिकार हुए। इनमें युवा और उद्यमियों की संख्या 60 फीसदी तक रही।

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World Mental Health Day 2021: Mental Stress Patients Increasing In Corona Virus Pandemic
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock

विस्तार

कोरोना फोबिया ने लोगों की दिमागी सेहत बिगाड़ दी। महामारी के 18 महीने में ताजनगरी में पांच फीसदी मानसिक रोगी बढ़ गए। इनमें से 1.5 फीसदी तो अभी रोग से उबरे भी नहीं। इनकी हालत यह है कि कोरोना वायरस सुनते ही हाथ-पैरों में कंपन, घबराहट और गला सूखने लगता है।

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मानसिक स्वास्थ्य संस्थान एवं चिकित्सालय के प्रमुख अधीक्षक डॉ. दिनेश राठौर ने बताया कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार भारत में सात फीसदी आबादी मानसिक विकार से पीड़ित है। इनमें से तीन फीसदी को भर्ती करने की जरूरत पड़ती है। कोरोना महामारी के दौर में मानसिक रोगियों की संख्या तेजी से बढ़ी। कोरोना काल से पहले सामान्य ओपीडी में करीब 180-200 मरीज आते थे। कोरोना काल में 190-210 तक मरीजों ने परामर्श लिया और उपचार कराया।
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डॉ. राठौर ने बताया कि अप्रैल-मई में कोरोना में अपने माता-पिता या फिर अन्य परिजनों की मौत से लोगों की दिमागी सेहत ज्यादा बिगड़ी। तनाव-अवसाद के शिकार हो गए। इनमें 15 से 30 साल की उम्र के अधिक मरीज हैं। जब भी यह मरीज कोरोना वायरस का नाम सुनते हैं तो इनकी धड़कन तेज हो जाती है, घबराहट, जल्दी-जल्दी सांस लेना, हाथ-पैरों में कंपन होने लगता है। ऐसे मरीजों की काउंसिलिंग भी की जा रही है। इनको नियमित इलाज लेने पर ठीक होने में छह से आठ महीने लग सकते हैं।

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भविष्य की चिंता में युवा हो रहे बीमार: डॉ. यूसी गर्ग
वरिष्ठ मानसिक रोग विशेषज्ञ डॉ. यूसी गर्ग ने बताया कि कोरोना महामारी में नौकरी छूट जाने, आधा वेतन कर देने, लॉकडाउन में उधारी न मिलने, व्यापार न चलने या फिर दोबारा संक्रमण बढ़ने, फिर से लॉकडाउन की आशंका से व्यापारी और नौकरीपेशा तनाव और अवसाद के शिकार हुए। इनमें युवा और उद्यमियों की संख्या 60 फीसदी तक रही। कोरोना से संक्रमित होने, अपनों की मौत देखने वाले लोग कोरोना फोबिया के अभी भी शिकार हैं। टीवी पर समाचार देखने, अखबार पढ़ने तक से बचते हैं।
कोरोना शब्द सुनते ही बैचेन हो जाता है
केस-1
जयपुर हाउस निवासी 27 साल के युवक ने कोरोना महामारी में अपने माता-पिता को 48 घंटे के अंदर खो दिया। इससे अवसाद का शिकार हो गया। डॉक्टरों ने बताया कि उपचार चलने से हालत में सुधार हुआ है लेकिन कोरोना फोबिया इस कदर है कि नाम सुनने भर से वह बेचैन होने लगता है।

अखबार-टीवी देखने से बचते हैं अभी
केस-2
दयालबाग निवासी 39 साल के युवक के घर में लोग कोरोना से संक्रमित हुए। अस्पताल में भर्ती होना पड़ा, इनमें से भाई और पिता की मौत हो गई। खुद की जान बची लेकिन मानसिक रूप से बीमार हो गए। नौकरी भी नहीं करने गए। उपचार से अभी पूरी तरह से सामान्य हालत में नहीं हैं। अखबार-टीवी तक से भी बचते हैं।
 

ये हैं लक्षण
- हाथ-पैर कांपना, घबराहट, दम घुटने जैसा महसूस करना। 
- लगातार उदास रहना, अकेले में रहना पसंद करना। 
- गुमसुम होकर रोने लगना, किसी काम में रुचि नहीं लेना।
- जीवन को बेकार बताना, दुनिया का क्रूर लगना।
- जीवन से निराश होना और नींद का नहीं आना।

स्वस्थ रहने के सात उपाय
1- गहरे दोस्त से अपनी समस्या को बांटना।
2- बागवानी, पेंटिंग, गायन-लेखन समेत नए शौक पूरा करें।
3- 30-40 मिनट तक योग और ध्यान लगाएं। 
4- सोने-जागने का समय तय करें। दिनचर्या सुधारें। 
6- कार्यस्थल पर खुशनुमा माहौल बनाए रखें। 
7- लगातार कार्य के बीच पांच-10 मिनट का अंतराल लें।
(जैसा कि वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. केसी गुरनानी ने बताया)
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