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परिवार से पहले चुना फर्ज: माता-पिता की मौत का दर्द, फिर भी नहीं रुके कदम; मानवता की मिसाल हैं ये चिकित्सक

Wed, 19 Aug 2026 11:46 AM IST
Dhirendra Singh अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा
अमर उजाला न्यूज नेटवर्क, आगरा Published by: Dhirendra Singh Updated Wed, 19 Aug 2026 11:46 AM IST
सार

विश्व मानवतावादी दिवस पर आगरा के डॉक्टरों की ऐसी कहानियां सामने आई हैं, जिन्होंने पारिवारिक संकट के बीच भी मरीजों की सेवा को प्राथमिकता दी। कोविड में माता-पिता के भर्ती होने, पिता के कैंसर और मां की गंभीर चोट के बावजूद डॉक्टरों ने अपने कर्तव्य से मुंह नहीं मोड़ा।

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World Humanitarian Day: Agra Doctors Put Duty Before Personal Pain Serving Patients Despite Family Crises
चिकित्सक। - फोटो : freepic

विस्तार

क्या आपके जेहन में कभी ये सवाल आया है कि डाक्टरों को धरती पर भगवान का दर्जा क्यों दिया गया है। क्या केवल दवाइयां लिख देना और पर्चा बना देना ही एक चिकित्सक को भगवान बना देता है? शायद नहीं। असली भगवान वो हैं जो अपने घर की दहलीज पर अपनी पीड़ा और आंसुओं को छोड़कर, अस्पताल के गलियारों में इंसानियत की मिसाल बनकर पहुंचते हैं। दरअसल हमारे आसपास ऐसे तमाम उदाहरण हैं जिनमें पारिवारिक संकट और मुश्किलों को भुलाकर यही चिकित्सक मरीज की निस्वार्थ भाव से सेवा कर मानवता की मिसाल पेश कर रहे हैं।
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19 अगस्त को मनाए जाने वाले विश्व मानवतावादी दिवस के अवसर पर हमने बात की एसएन मेडिकल कॉलेज और लेडी लॉयल अस्पताल के चिकित्सकों से और जाना कैसे इन कर्मवीरों ने साबित किया कि जब बात इंसानियत की हो तो व्यक्तिगत दुख और पारिवारिक संकट भी बौने साबित हो जाते हैं
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माता-पिता कोविड वार्ड में भर्ती थे फिर भी डटे रहे।


एसएन मेडिकल कॉलेज में बीते 12 वर्षों से सेवाएं दे रहे डॉ. अजीत चाहर ने महामारी के दौरान परिवार से पहले इंसानियत को मुकाम बनाया। कोविड काल में जब उनके माता-पिता दोनों संक्रमित होकर अस्पताल में भर्ती थे, तब भी उन्होंने डिग्री लेते समय ली गई शपथ को नहीं बिसराया। उन्होंने परिजन से बढ़कर अस्पताल में भर्ती मरीजों को प्राथमिकता दी। उनका मानना था कि परिजन को देखने के लिए घर में और भी सदस्य हैं लेकिन मरीज को सिर्फ डॉक्टर से आस रहती है।
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कैंसरग्रस्त पिता के इलाज के दौरान भी नहीं छोड़ा इंसानियत का साथ
सरोजनी नायडू मेडिकल कॉलेज के मेडिसिन विभाग में पिछले तीन वर्षों से सेवारत लखीमपुर खीरी निवासी डॉ. गौरव गुप्ता के पिता को पिछले वर्ष कैंसर का पता चला। इस कठिन समय में पिता के साथ मरीजों की सेवा करना डॉ. गुप्ता ने नहीं छोड़ा या तक कि अक्तूबर में पिता के निधन के कठिन दौर में भी वह कर्तव्य पथ पर डटे रहे। उनका कहना था कि पिता की देखभाल के लिए पूरा परिवार साथ था लेकिन मरीजों की जिम्मेदारी एक डॉक्टर पर होती है।


दिन में मरीज तो रात में बीमार मां की करते रहे सेवा
लेडी लॉयल अस्पताल में तैनात वरिष्ठ रेडियोलॉजिस्ट डॉ. एके सियाल की मां की रीढ़ की हड्डी में 2025 में फ्रैक्चर हो गया था। तब भी उन्होंने कर्तव्य का साथ नहीं छोड़ा। हर दिन सैकड़ों गर्भवती महिलाओं की जांच करते और रात में मां की देखभाल में जुट जाते। कहते हैं महिलाओं के लिए गर्भावस्था का वक्त मुश्किल भरा होता है, ऐसे में अगर मैं छुट्टी ले लेता तो गर्भवतियों का इंतजार थोड़ा और लंबा हो जाता। इसलिए पेशा और परिवार दोनों की जिम्मेदारी साथ-साथ निभाई।
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